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यदि मेरी बेटी उस दिन मेरा भ्रम न तोड़ती, तो शायद मैं उसी के तले जीती रहती कि माध्यमिक कक्षाओं तक हिन्दी माध्यम में पढ़ने के बाद भी मेरा अँगरेजी ज्ञान इतना अच्छा तो है ही कि चार लोगों में बैठ मैं शान से सिर ऊँचा कर सकूँ और इसका श्रेय मैं अपने शिक्षकों को और पालकों को देते न अघाती थी।

एक दिन बेटी को कहा, बेटा मुझे दो 'एनव्हलप' ला देना बेटी चौंकी, मम्मा फिर प्रोनाउंस करो तो.. मैंने जोर देकर कहा 'एनव्हलप' ला देना.. बिटिया हँसकर बोली, मम्मा, नई अँगरेजी सीखो - एनव्हलप नहीं, 'ऑनव्होलोप' बोला जाएगा अब मैं चकराई भाषा में भी 'नया-पुराना' पर ये तो शुरुआत थी फिर तो धीरे-धीरे मेरे सारे उच्चारण गलत सिद्ध होते गए शैड्‍यूल का स्कैड्‍यूल हुआ, 'एजुकेशन' 'एडुकेशन' बन गया, 'रिसीप्ट' को 'रिसीट' कर दिया गया... मैं तो इतनी घबराई कि हौले-हौले अँगरेजी से किनारा करने की ठान ली।

धीरे से एक दिन बेटी से पूछा, 'बेटा यदि सही उच्चारण ये है तो क्या हमारे शिक्षकों ने हमें गलत पढ़ाया था? बिटिया हँसकर बोली मम्मा, पहले वे ब्रिटिश अँगरेजी सिखाते थे क्योंकि हम अँगरेजों के गुलाम थे, अब हम अमेरिका को इम्प्रैस कर रहे हैं, इसलिए हम अमेरिकन इंग्लिश बोलते हैं।

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मैं भौंचक थी, क्या भाषा भी इस तरह अपनाई जाती है? अपनी सुकोमल मातृभाषा को छोड़कर विदेशी भाषा अपनाना, वो भी इस तरह? अँगरेजी भाषा की बात की जाए तो मेरे विचार से यह सर्वत्र ‍अवैज्ञानिक भाषा है, जिसमें न तो उच्चारण संबंधी कोई नियम लागू होता है, न ही स्पेलिंग से संबंधित इसकी तुलना में हिन्दी में वर्तनी के सारे नियम पूर्णत: वैज्ञानिक एवं स्थिर है जो स्मृतिबद्ध करने में आसान होते हैं।

अँगरेजी लिखने व बोलने में भारी अंतर होता है। मगर हिन्दी जिस प्रकार बोली जाती है, उसी तरह लिखी जाती है। हिन्दी मातृभाषा होने के नाते बोलने-समझने में आसान होती है, वहीं अँगरेजी पढ़ते समय बच्चा पहले उसे मातृभाषा में ट्रांसलेट करके फिर आत्मसात करता है हमारी प्राथमिक शिक्षा का स्तर गिरने, शिक्षण की 'कॉस्ट' बढ़ने और सरकारी स्कूलों की साख घटाने का मुख्य कारण अँगरेजी का वर्चस्व बढ़ना ही है।

अँगरेजी के नाम पर पब्लिक स्कूलों का बढ़ता तामझाम, पहाड़-सी फीस और चमक-दमक ने भले ही 'तोता रटंत' कराके 'टॉपर्स' की संख्‍या में इजाफा कर दिया हो मगर ये पौध तैयार की जाती है विदेशों में बोली लगाने के लिए।

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इनका देश से, भाषा से, नैतिक मूल्यों से कोई सरोकार होना प्रतीत नहीं होता। साथ ही इन बच्चों में विषय की समझ व तार्किकता का अभाव बना ही रहता है।

क्या ही अच्छा होता, यदि स्पेन, जर्मनी, जापान, चीन आदि की तरह भारत में भी सारी शिक्षा सारे विषय केवल मातृभाषा/राष्ट्रभाषा में ही पढ़ाए जाते और अँगरेजी को द्वितीय अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाने पर ही जोर दिया जाता। यदि अँगरेजी के बिना वे सारे देश भी तरक्की कर सकते हैं, वह भी अपनी मातृभाषा के बल पर... तो क्या भाषा की इतनी समृद्ध और उत्कृष्ट धरोहर पास होने पर भी हम भारतीयों का पंगु होकर किसी विदेशी भाषा के अधीन रहना तर्कसंगत है?

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