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शैफाली शर्मा
मैं अपने ही जीवन की मूक दर्शक
अक्सर देखती हूँ
समय को अपने पास से गुज़रते हुए
और जाते हुए एक और दिन को
उसी तरह नीरस और निर्जीव
जैसे तुम अक्सर निकल जाते हो
मेरे करीब से
और मैं खड़ी रह जाती हूँ
उस पल की प्रतीक्षा में
जो जीवित कर जाए
उम्र के उस हिस्से को
जो निर्जीव
हो चुका है
मेरे हृदय की तरह..