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बेचारा उल्लू!

-निर्मला भुराड़िया

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बेचारा उल्लू
जीवन के रंगमंच से

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घर के बाहर खड़े बिल्वपत्र के एक शानदार पेड़ पर कुछ समय पहले उल्लुओं का एक जोड़ा रहने आ गया था। हल्के भूरे रंग के ये सलोने उल्लू फर के गोलों की तरह लगते थे। पेड़ के नीचे खड़े होकर उन्हें देखो तो ऐसा प्रतीत होता था मानो वे नीचे हमारी तरफ ही देख रहे हों- ऊपर देखने के प्रत्युत्तर में! सुबह-शाम कभी बालकनी से, कभी बरामदे से, कभी पेड़ की तलहटी से इस खुशनुमा जोड़े को देखकर उल्लासित होना मानो शगल बन गया।

मगर 6-8 महीने पेड़ पर रहने के बाद तकरीबन पिछली दीपावली के आसपास पहले एक उल्लू फिर कुछ अंतर से दूसरा उल्लू गायब हो गया! इनके गायब होने का जो कारण जानकारों ने बताया उसे सुनकर दुख हुआ कि कदाचित दीपावली पर किसी ने उनकी तांत्रिक बलि दे दी हो!

हमारे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पिछले दिनों यह खेद व्यक्त किया कि हैरी पॉटर की लोकप्रियता ने उल्लुओं का नाश किया है। कुछ हद तक यह बात सही है थीम पार्टियों में यदि हैरी पॉटर थीम है तो बच्चे हैरी के पालतू उल्लू हैडविग की तर्ज पर अपने साथ उल्लू ले जाना चाहते हैं। हैरी पॉटर से प्रभावित कुछ बच्चे उल्लू पालने की जिद भी करते हैं! मगर उल्लू की बढ़ती दुर्गति का महज यही कारण नहीं है। हमारे बहुत से देशी कारण भी हैं।

भारतीय पौराणिकता में उल्लू चूँकि लक्ष्मी का वाहन माना गया है, अतः कई लालची लोग यह सोचते हैं कि उल्लू के संग तंत्र पूजा से लक्ष्मी उनके पास आएगी। या तांत्रिकगण उन्हें ऐसा समझा देते हैं और उल्लू के रक्त से स्नान जैसी वीभत्स प्रक्रियाएँ भी दीपावली की रात संपन्न करवाई जाती हैं। इसके अलावा ओझा लोग उल्लू की आँख, उल्लू की हड्डी, उल्लू का पंजा, उल्लू का सुखाया हुआ मांस आदि अवयवों का उपयोग इंसानी रोगों के तथाकथित इलाज के लिए करते हैं।

जिन पिछड़े इलाकों में आधुनिक चिकित्सा का ज्ञान नहीं पहुँचा है वहाँ तो लोग उल्लू के अवयवों को दवा के रूप में इस्तेमाल करते ही हैं, कई अंधविश्वासी, अतार्किक अगड़े (?) या यूँ कहें शहरी पढ़े-लिखे भी अक्सर इस फेर में पड़ जाते हैं। यही नहीं उल्लू के अवयवों का उपयोग तथाकथित वशीकरण के लिए भी किया जाता है।

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उल्लू के अवयव बेचने वाले खुलेआम घोषणा करते हैं कि उल्लू के फलाने अवयव से प्रेमिका पट जाएगी तो फलाने पार्ट से दुश्मन का खात्मा, फलानी हड्डी या आँख से आदमी आपका गुलाम हो जाएगा। अशिक्षा, अंधविश्वास एवं रूढ़ियाँ और भी तरह से उल्लुओं की दुश्मन हैं। जैसे कि दक्षिण के कई इलाकों में उल्लू की आवाज को मौत का पैगाम माना जाता है, अतः लोग ढूँढकर उल्लू को मार डालते हैं। कई लोग उल्लू को अपशगुन मानते हैं और इनका खात्मा करने पर तुल जाते हैं।

पर्यावरण-मित्र, लेखक अनिल यादव कहते हैं, 'पता नहीं क्यों लोग इस कृषक मित्र पक्षी को मनहूस और बेवकूफ मानते हैं।' उनका कहना है उल्लू की एक प्रजाति फिश आऊल को हिन्दी में मुआ कहते हैं। एक और उल्लू प्रजाति है 'खूसट'। ये दोनों ही शब्द गालियों और तानों की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं। उल्लू को बेवकूफ का पर्याय और उल्लू का पट्ठा को महामूर्ख के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

दरअसल उल्लू तो लक्ष्मी का वाहन इसलिए होना चाहिए कि फूड चेन के अंतर्गत इसका सबसे बड़ा काम चूहों और कृषि को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों का खात्मा करना है। इस तरह उल्लू फसल को बचाता है और धन-धान्य में वृद्धि करता है। अतः उल्लू तो इंसान के आदर का पात्र है और इसे अभिरक्षा चाहिए।

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