- रविशंकर कुमार
प्रश्न पत्र पढ़ते ही मेरा कलेजा धक् से रह गया। पलभर के लिए आँखों के सामने छाए अंधकार में सबकुछ ओझिल होता-सा प्रतीत हुआ। भय, व्याकुलता, बेबसी, बेचैनी और न जाने कितने भाव हृदय को तार-तार कर गए। बस जी चाहा, फूट-फूटकर रो पड़ूँ।
सवालों के क्रमबद्ध श्रृंखला की ओर अब देखने की हिम्मत न होती थी। जब-जब कोशिश करता अश्रुपूरित नेत्रों से द्वंद कर, अपने विश्वास के टूटने की तकलीफ की परवाह किए बगैर, सांत्वना देते माता-पिताजी का रूआँसा-सा चेहरा बार-बार आँखों के आगे कौंध जाता।
'क्यों नहीं मैंने अपने दिल की बात सुनी...? तीन पाठ तैयार करने में मुझे बमुश्किल छह घंटे लगते। छह घंटे तो मेरे पास थे ही। क्यों सो गया मैं...?' यह अफसोसपूर्ण प्रश्न मुझे सैकड़ों विष बुझे तीरों की भाँति बींध रहा था। ऐसा लग रहा था, मानों मैं एक कंटीले झाड़ में फँसा हूँ और जंगली कुत्तों का झुंड मेरी तरफ दौड़ा चला आ रहा है। जहाँ मैं कुछ नहीं, बस इंतजार भर कर सकता था, घटना के घटित होने का जिसके परिणाम से मैं भली-भाँति अवगत था।
आखिर जैसे-तैसे प्रश्न-पत्र का उत्तर देकर मैं परीक्षा भवन से बाहर आ गया।
मुझे अब केवल अपने विरोधियों के कहकहे, 'बहुत होशियार समझता था, अपने आपको... निकल गई सारी हेकड़ी...' ठहाकों और उलाहनों की गूँज सुनाई पड़ रही थी। इस भीषण शोर के बीच मुझे बार-बार अपने अभिभावकों का चेहरा दिख जाता, जिनका मुझसे एक ही प्रश्न था- 'इस महत्वपूर्ण वर्ष को इतना हल्का क्यों लिया...? थोड़ी-सी मेहनत और कर लेते तो क्या हो जाता...? अब अपने भविष्य के बारे में सोचा- क्या करोगे...? कैसे जीवन निर्वाह होगा...? प्रश्नों की इस अनुगूंज, उलाहनों और ठहाकों के शोर में मुझे ऐसा लगा मानो मेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। मैं चीत्कार कर उठा और पसीने से लथपथ पलंग पर धड़ से उठ बैठा।
... क्या वास्तव में यह एक दुःस्वप्न था...? या अभी मैं जो देख रहा हूँ, वह एक स्वप्न है? हृदय के किसी कोने में उठे इस सूक्ष्मतम प्रश्न पर मैं चिंतन नहीं कर पाया। साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो धड़कनें अब बंद हुई या तब। कुछ पलों बाद जब सचमुच यह अहसास हुआ कि अब तक जो कुछ भी मैंने देखा, वह एक सपना था। मेरी आँखों में खुशी के आँसू छलछला आए।
कलाई पर बँधी घड़ी देखी- रेडियम युक्त काँटे तीन बजने का संकेत दे रहे थे। घड़ी की सुइयों ने मानों नया जीवन दे दिया। वातावरण में व्याप्त पूर्ण स्तब्धता की परवाह किए बगैर, मैंने उठकर लाइट जलाई और दृढ़ निश्चय के साथ अपने तीनों शेष पाठों को स्मरण करने में इस प्रकार मग्न हुआ कि मुझे समय का होश ही नहीं रहा। यकायक एक तीव्र शोर से मेरे अध्ययन की तंद्रा टूटी। उठकर माँ के कमरे में जाकर अलार्म बंद करने को ही था कि वो कमरे में दाखिल हुई और उन्होंने आँख मलते हुए पूछा- 'रातभर जगे हो क्या...?' मैंने स्वीकृति मैं सिर हिलाया और कहा- 'मुझे 9 बजे तक डिस्टर्ब मत कीजिएगा।'
बिस्तर पर पुस्तकों के ढेर और मेरे बिखरे हुए बाल देखकर माँ ने केवल इतना कहा- '9 बजे तक पूरा कर लेना, एक घंटा तैयार होने में भी तो लगेगा।' कहकर वे चली गईं। 9 कब बज गए, पता ही नहीं चला। शेष पाठ पूरे हो चुके थे। हृदय की अनिश्चितता और धड़कनें थम चुकी थीं। नहा-धोकर तैयार होकर मैं अपने कमरे में आखिरी बार पुस्तकों को सरसरी निगाह से देख ही रहा था कि माँ थाली में ईश्वर का प्रसाद और एक ग्लास जूस लेकर आई। ग्लास आगे बढ़ाकर उन्होंने कहा- पी लो, रातभर के जगे हो, थोड़ा हल्का महसूस करोगे।' माँ की इस ममता और स्नेह की छाया तले ईश्वर का प्रसाद लेकर, उनके चरण स्पर्श कर मैं परीक्षा भवन चल पड़ा।
प्रश्न-पत्र पढ़कर मैं शब्द और विचार शून्य था। अधिकतम प्रश्न उन्हीं तीन पाठों से थे, जिन्हें मैंने आज सुबह तैयार किया था। मन को अत्यंत आह्लादित करने वाले इस अवर्णनीय क्षण पर अब केवल एक प्रश्न हावी था- किसे धन्यवाद दूँ? .... अपनी मेहनत.... या फिर .... 'शेष पाठ।'