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सौ बार सोचना...

जीवन के रंगमंच से...

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सौ बार सोचना...
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सौ बार सोचना! आज के इस रंगमंच का यह शीर्षक इसलिए दिया गया है कि आपाधापी वाले इस युग में रोजमर्रा के जीवन में हर आदमी के सामने बहुत सारी परे‍शानियाँ, तनाव चलता ही रहता है। और ऐसे समय में आदमी जब ज्यादा तनावग्रस्त, मुसीबत में होता है तो उसके दिमाग में हर समय एक ही ख्याल गूँजता रहता है कि वह करे तो क्या करे!

इन परेशानियों से उबरने का कोई हल नहीं है। ऐसे समय में मर जाना ही अच्छा है। इससे सबकी परेशानी दूर हो जाएगी। ऐसा विचार निरंतर उसके मन में चलता रहता है, चलता ही रहता है। रोजाना सोते-बैठते, खाते-पीते, किसी भी काम में कितना भी मशगूल होने के बाद भी उसके सोचने की यही प्रक्रिया निरंतर चालू रहती हैं। यह कभी थमने का नाम ही नहीं लेती।

रोजाना हर आदमी के जीवन में बहुत कुछ घटित होता है, घटता रहता है 'कभी कोई माँ-बाप के कारण परेशान है, तो कोई प्रेमी-प्रेमिका के कारण, कोई भाई अपनी बहन के कारण तो घर में होने वाले सास-बहू या जेठानी-देवरानी के झगड़े के कारण' हर आदमी निरंतर इसी तरह की अनेक परेशानियों से जूझता हुआ यही सोचता रहता है। आखिरकार उसके सोचने के पीछे कोई न कोई वजह जरूर होती है। और वह वजह होती है उसकी कमजोर मानसिकता।

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मैं यह नहीं कहती कि मैं खुद भी कमजोर मानसिकता वाली नहीं हूँ। क्योंकि इसी‍ तरह के हजारों सवाल मेरे जेहन में रोजाना उठते रहते हैं। जीवन की‍ सच्चाइयों से जब आम आदमी का आमना-सामना होता है तो कुछ इस तरह के सवाल जीवन में रोज ही उसके मन में आते रहते हैं।

लेकिन कुछ भ‍ी करने से पहले सौ बार उस वजह से होने वाले लाभ-हानि और नुकसान के बारे में जरूर सोचना चाहिए क्योंकि कभी-कभी तेज आवेश या गुस्से में आकर आदमी ऐसा अनसोचा कदम उठा लेता है जिसके बारे सोचकर ही शरीर में कंपन आने लगती है।

आदमी सोचने लगता है 'चलो यार, अब तो घर की रोज-रोज की किटकिट से तंग आ गए हैं। एक बार कुछ खा-पीकर या फाँसी लगाकर मर जाते हैं। सारी बातों से अपने आप ही अपना‍ पिंड छूट जाएगा।' बाजारों में आसानी से मिलने वाली उन कुछ जहरीली वस्तुओं के कारण आज मरना-मारना बहुत आसान हो गया। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है...

परिवार के किसी भी सदस्य के मरने से या आत्महत्या अथवा आत्मदाह कर लेने से आज तक कभी ‍भी, किसी भी परिवार का भला नहीं हुआ है और न कभी होगा। हाँ, उससे होता यह जरूर है कि एक इंसान के मरने बाद बाकी बचे परिवारवालों को अनेक परेशानियों से जूझना पड़ता है। उनके सामने आने वाली रोजमर्रा की परेशानियों की वजह से घर के बचे वे लोग दिन में सौ-सौ बार मर कर जीते हैं क्योंकि वे जीने के लिए मजबूर होते हैं।

घर के एक सदस्य ने पहले ही उनके लिए इतनी कुछ परेशानियाँ, जिम्मेदारियाँ छोड़ दी होती हैं कि उनको ढोते-ढोते बाकी के लोग परेशानी में अपना जीवन ढोने को मजबूर होते हैं। इसलिए बेचारे वे सोचकर भी मर नहीं पाते, अपनी जिम्मे‍दारियों से मुँह मोड़ नहीं पाते।

दुनिया के हर आदमी को इस तरह का कोई भी कदम उठाने से पहले सौ-सौ बार तो कहना कम ही होगा, बल्कि हजारों बार, करोड़ों बार इस बारे में सोच-विचारकर फिर फैसला लेना चाहिए क्योंकि आपका एक अच्छा फैसला कई लोगों को अच्छा जीवन दे सकता है। कई लोगों के चेहरे पर हँसी दे सकता है। अगर आप किसी को हँसाना नहीं चाहते तो किसी को दु:ख देने का, परेशानियों में डालने का भी आपको कोई हक, कोई अधिकार नहीं है क्योंकि भगवान की बनाई इस दुनिया में सभी लोग अच्छे होते हैं। जरूर‍‍त है तो बस एक अच्छे नजरिए की...

तो देर किस बात की है, आज ही अपना नजरिया बदलिए और सभी के जीवन को खुशहाल बनाइए। क्योंकि यही भगवान के द्वारा रची गई इस दुनिया की खासियत है। तो आज के बाद जब भी कोई फैसला लेना हो उस पर सौ-सौ बार अवश्‍य सोचें। क्यों सोचेंगे ना आप...!

हमारा यह सौ-सौ बार सोचने का प्रयास आपको कैसा लगा, हमें अवश्‍य लिख भेजें। हमें आपके जवाब की प्रतीक्षा रहेगी। पढ़ें, सोचें और फिर लिख भेजें हमें...।

तो फिर सोचो सौ-सौ बार...

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