- सुरेंद्र कुमार 'सुमन'
ये कैसा नजारा आज है उभरा
हिम कणों के श्वेत आवरण में धरा
मृदु मृदु श्वेत कण आच्छादित वन
देख ठिठुरता सिहरता सिसकता मन
प्रकृति ने ये कैसा नजारा है बिखेरा
हिम कणों के श्वेत आवरण में धरा
चीड़ के नंग सीधे तरू खड़े
पथों को बाँट कुछ औंधे पड़े
जमी जमी सर्द बर्फ दे पहरा
ढँक गया धरा का हर रंग गहरा।
हिम कणों के श्वेत आवरण में धरा
समुज्ज्वल शीतल श्वेत कण कण
हिम कणों पे बिखरती रश्मि विलक्षण
छिटकी चाँदनी विमल-सा क्षीर बिखेरा
मधु की प्रिय निशा में हल्का सवेरा।
हिमकणों के श्वेत आवरण में धरा
रूह से सफेद कोमल हिम कण पड़े
परों पे चिड़ियों के कुछ छोटे कुछ बड़े
चुनते नीड़ों से अपने बच्चों का नखरा
चहकने लगा मन था कुछ दुःख से भरा
हिम कणों के श्वेत आवरणमें धरा।