Publish Date: Sat, 07 Jun 2008 (11:08 IST)
Updated Date: Sat, 07 Jun 2008 (11:07 IST)
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विवेक हिरदेयौवन यदि ऊर्जा का सर्वाधिक स्फूर्तिकाल है तो प्रौढ़ता अतिरिक्त ऊर्जा के क्षय को धैर्य से रोके रखती है। इस ढलती दोपहर में यदि चिरकाल से बंद पड़े प्रेम झरोखों को स्नेहिल स्पर्शों से प्यार-अनुराग की शीतल बयार खोलकर आपको पुलकित करना चाहती हो तो उठकर विश्वास के साथ उन झरोखों को खोलने में आप भी शामिल हो जाइए।
प्रेम भी किसी के दिलो-दिमाग पर छा जाने हेतु उचित अवसर खोजता है, दो युवा हृदय धड़कते हैं। पहले मौन आँखों का वार्तालाप होता है, फिर शब्दों के हकदार मुख का। भाव-भंगिमाओं की थिरकन, वाणी का माधुर्य और दैहिक तरंगों का स्पंदन मिलकर ईश्वर से जन्मजातमिले प्रेम बीजों को सींचने में अद्भुत भूमिका निभाते हैं। यहीं से प्रेम का अंकुरण होता है।सदियों से कविता, शायरी, गीत, गजल, कहानी, नाटक, चलचित्र आदि अपनी विषयवस्तु में दो जवाँ दिलों की दास्तान का बयान करते आए हैं। तरुणाई का प्रेम, कैशोर्य का प्रेम, जवाँ उमंगों की मौज पर कभी महकता, चहकता तो कभी फफकता, सिसकता प्रेम। ये अवस्था लड़कपन के कच्चे घड़ों में सिकाई के तत्काल बाद की अवस्था है। घड़े अभी-अभी ही परिपक्व हुए हैं, कुछ नाजुक हैं। खुशनसीब हैं वे जिनका प्रेम सफल होता है। ईश्वर के न्याय को आत्मसात करके पुनः सामान्य होने का प्रयत्न करते सहानुभूति के पात्र हैं वे जो प्रेम में असफल रहे हैं। अवसर जब हौले से आकर दरवाजा खटखटाता हो, तब जरूरी नहीं है कि सभी उस समय मुक्त हों, बँधे हुए नहीं हों, या अवसर को पलकों पर बिठाए नाज के साथ उसका स्वागत करने योग्य फुर्सत में हों। कुछ उन लोगों की चर्चा कर लेना भी जरूरी है जिन्हें शायद प्रेम करने की ही फुर्सत नहीं है। चाहत का बीज जब अपने अनुकूल बयार को देखकर फड़फड़ाता भी हो तो ये फड़फड़ाहट जिम्मेदारियों के भारी बोझ तले दब सी जाती है।हृदय बसंत में जब सहसा किसी मुग्ध मयूर का पदार्पण होने ही वाला हो उसी समय अन्य प्राथमिकताओं का एक तीव्र तूफान तेजी से हृदय पटल बंद कर देता है। स्नेहिल भावपूर्ण आकर्षण की चाशनी की कुछ बूँदें अंतःस्थल पर टप-टप सी टपकती हैं और इसके पहले कि कोई उस ओर देखे सहसा जीवन के विपरीत अनुभवों की कसैली बाढ़ बहकर उसे अदृश्य कर देती है। किसी-किसी के जीवन में तो संभवतः प्रेम का इतना अल्प, इतना सूक्ष्म परिचय देते क्षण भी शायद नहीं आते हों। उनका दायित्वों के प्रति जबरदस्त समर्पण और कर्तव्यों के प्रति संपूर्ण झुकाव इतना अधिक होता है कि प्रेम की परिभाषा गढ़ने में उन्हें लंबा वक्त लग जाता है। |
| इस ढलती दोपहर में यदि चिरकाल से बंद पड़े प्रेम झरोखों को स्नेहिल स्पर्शों से प्यार-अनुराग की शीतल बयार खोलकर आपको पुलकित करना चाहती हो तो उठकर विश्वास के साथ उन झरोखों को खोलने में आप भी शामिल हो जाइए। |
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एक समय आता है, जब दायित्वों पर पूर्ण विराम लग जाता है, परंतु जीवन पर अभी अल्प विराम ही लगा है। तारुण्य सरक-सरक कर प्रौढ़ता की फिसलपट्टी पर आकर टिका है। या तो फिसलकर वृद्धावस्था का आलिंगन कर लें या फिर ईश्वर द्वारा प्रदत्त उसी शुष्क प्रेमातुर बीज को पनपने का अवसर दें। स्वयं को थोड़ा पीछे खींच लें तरुणाई की ओर। यह कतई आत्मप्रवंचना नहीं होगी। कुछ वर्षों पूर्व एक स्वच्छ विचारोत्तेजक फिल्म प्रदर्शित हुई थी, 'तपस्या'। फिल्म की नायिका के पास भाई-बहनों की पढ़ाई और विवाह की जिम्मेदारियाँ हैं।
माँ-बाप नहीं हैं, वह स्वयं ही भाई-बहनों की एकमात्र पालक है। सभी जिम्मेदारियाँ कष्ट सहते हुए भी बखूबी निभाती है। एक हमदर्द मिलता है जो उसे चाहता है लेकिन वह उस चाहत की उपेक्षा कर अपने कर्तव्यों में लीन रहती है। एक अरसा गुजर जाता है। माथे की मद्धिम लकीरें उसके तपते इतिहास की व्याख्या करती हैं। इन्हीं लकीरों पर कहीं से श्वेत केशों का एक छोटा सा गुच्छ भी मँडराता है।
ऐसे में उसका हमदर्द फिर लौट आता है। उसे प्रेम डोर द्वारा विवाह बंधन में बँधने का पुनः स्नेहिल आमंत्रण देता है। वर्षों से संचित भावनाओं के सैलाब को मजबूती सेथामे हुए आत्म संयम के बाँध में सुराख हो जाता है। चिर-संचित वेदनाएँ अविरल बह-बहकर नायिका को रिक्त कर देती हैं। और तत्क्षण हमदर्द का संपूर्ण प्रेम, आवेग से उस रिक्तता से उभरे शून्य को भर देता है। इस परिपक्व, तपे हुए, तलख अनुभवों से भींचे हुए गरिमामय शालीन प्रेम की वैवाहिक यात्रा कितनी अद्भुत होगी सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
यौवन यदि ज्वलंत धमनियों का अविरत स्पंदन है, जो प्रौढ़ावस्था उन स्पंदनों का नियमन कर शक्ति केंद्रित करने का मुख्य कारक हो सकती है। यौवन यदि प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत्त श्रेष्ठ उपहार है तो प्रौढ़ता उसे सहेजकर सर्वश्रेष्ठ बनाती है। यौवन यदि ऊर्जा का सर्वाधिक स्फूर्तिकाल है तो प्रौढ़ता अतिरिक्त ऊर्जा के क्षय को धैर्य से रोके रखती है। इस ढलती दोपहर में यदि चिरकाल से बंद पड़े प्रेम झरोखों को स्नेहिल स्पर्शों से प्यार-अनुराग की शीतल बयार खोलकर आपको पुलकित करना चाहती हो तो उठकर विश्वास के साथ उन झरोखों को खोलने में आप भी शामिल हो जाइए।
अविवाहित प्रौढ़ों की ही बात नहीं है। यदि कोई तलाकशुदा, विधुर या विधवा है तो उसे भी इस उम्र में एक मित्र, एक हमसफर, एक साथी की जरूरत होती है। पर समाज इस बात को समझने के बजाए हँसी उड़ाता है या ताने कसता है।
समाज आप को बहुत कुछ देता है तो छीनता भी है। 'अब इस उम्र में प्यार' या 'बुढ़ापे में शादी?' जैसी आवाजों को अनसुना कर दें। जमाना क्या कहेगा इस शंका या भय को संपूर्ण शक्ति से दूर भगा दें। सकारात्मक परिस्थिति में सफल हुए किसी युवा के प्रेम से कहीं अधिक सम्माननीय, नकारात्मक परिस्थितियों के कारण विलंब से पनपा आपका प्रेम है। क्योंकि इसे सींचने के लिए अब आपके पास अनुभवों की उपयोगी खाद, धैर्य का दिव्य प्रकाश और विलक्षण परिपक्वता का बहुमूल्य जल मौजूद है।