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प्यार को खिलने दो...

साहस के पर मत काटो

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प्यार
ओशो कहते हैं कि प्यार के लिए किसी भी प्रकार की रोक टोक नहीं होनी चाहिए। प्यार में जब कोई गिरेगा नहीं तब तक सम्भलने का मजा भी नहीं। दिल लगाना और दिल का टूटना दोनों ही अच्छी स्थिति है।

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ओशो कहते हैं कि प्यार में उठो, गिरो मत। प्रेम शब्द से न चिढ़ो। यह हो सकता है कि तुमने जो प्रेम समझा था वह प्रेम ही नहीं था। उससे ही तुम जले बैठे हो। और यह भी मैं जानता हूँ कि दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीने लगता है।

पश्चिमी लोग प्रेम में हमसे आगे निकलते जा रहे हैं और हम अभी यह तय करने में ही लगे हैं कि लवर्स पार्क बनना चाहिए या नहीं। वल्गर्स चीजे कुछ समय तक ही चलती है धीरे-धीरे ही उसमें मैच्योरिटी आती है।

  सच्चे प्रेम की तलाश एक भ्रम हैं, क्योंकि आप अपने प्रेमी से अनेक किस्म की आशाएँ कर लेते हैं और जब वे पूरी नहीं होती तो कहते हैं कि जीवन में सच्चा प्रेम नहीं मिला।       
प्यार पर जितनी पाबंदियाँ लगाएँगे उतना यह विकृत और भीरु होता जाएगा। जरूरत इस बात की है कि हम स्कूल और कॉलेजों में प्रेम की भी पाठशाला लगाएँ। जब सेक्स की शिक्षा ‍दी जा सकती है तो प्रेम की क्यों नहीं।

ओशो कहते हैं कि जब तक आप प्रेम में डूबोगे नहीं तब तक कैसे जान पाओगे कि असली तल कहाँ है। सच्चे प्रेम की तलाश एक भ्रम हैं, क्योंकि आप अपने प्रेमी से अनेक किस्म की आशाएँ कर लेते हैं और जब वे पूरी नहीं होती तो कहते हैं कि जीवन में सच्चा प्रेम नहीं मिला।

किस-दर्जा दिलशिकन थे
मुहब्बत के हादिसे
हम जिंदगी में फिर कोई
अरमाँ न कर सके।

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, दुनिया में दो ही दुख हैं- एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए। और दूसरा दुख मैं कहता हूँ कि पहले से बड़ा है।...इसलिए मुहब्बत में हदिसे ही लगेंगे।

जहाँ तक सवाल भारतीय और पश्चिमी संस्कृति के द्वंद्व का है तो पश्चिम में प्रेम के खिलने की अब शुरुआत हो चुकी है। हम जिसे पश्चिमी संस्कृति कहते हैं दरअसल वह आधुनिक होने की होड़ है। आप उसे पश्चिमी न कहें। भारतीय संस्कृति का ढींढोरा पीटने वाले नहीं जानते कि कृष्ण और बौद्ध काल में प्रेम की क्या स्थिति थी।

ऐसा समझ सकते हैं कि बॉलीवुड से कहीं ज्यादा प्रेम का अच्छा चित्रण हॉलीवुड में हो रहा है। भारतीय समाज बदल रहा है। भारतीय संस्कृति के नाम पर इस बदलाव को रोका गया तो हम दुनिया के सर्वाधिक विकृत समाज होते चले जाएँगे।
- शतायु

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