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वो तेरे प्यार का गम - 2

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जनकसिंह झाला

(गतांक से जारी)

एक पल के लिए तो अपने सामने राजीव को देखकर रीटा हैरान ही रह गई लेकिन बाद में अपने आपको सँभालते हुए सिर्फ फॉर्मलिटी के लिए उसने न चाहते हुए भी कहा 'हैलो राजीव कैसे हो?'

जिंदा हूँ। राजीव ने कड़वे लहजे में जवाब दिया। उसके जेहन में पिछले कई सालों से जो सवाल एक शूल की भाँति चुभ रहा था वह आज बाहर निकल ही गया 'रीटा तुम बिना बताए कहाँ चली गई थीं? मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा।

रीटा ने राजीव की इस बात का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा और अपने बेटे के पास जाकर कहा' सोहम, बेटा यह राजीव अंकल हैं उन्हें हैलो कहो। सोहम ने मीठी मुस्कान के साथ राजीव को हैलो कहा। उसकी मुस्कान को देखकर राजीव अपनी कड़वाहट और गुस्सा भूल गया, उसने गुब्बारे वाले से एक बड़ा गुब्बारा खरीदकर उसके हाथ में थमा दिया।

रीटा सोहम की अँगुली पकड़कर अब सड़क के दूसरे छोर पर चलने लगी। सामने के मल्टी में ही उसका फ्लैट था। राजीव ने सोहम का दूसरा हाथ पकड़ लिया। राजीव बार-बार एक ही बात रट रहा था जिससे परेशान होकर आखिर में रीटा भड़क गई।

'देखो राजीव अब हमारे बीच में ऎसा कुछ भी नहीं रहा, जैसा तुम चाहते थे। कहीं मेरे पति ने तुम्हें मेरे साथ देख लिया तो मेरी गृहस्थी बर्बाद हो जाएगी। भगवान के लिए यहाँ से चले जाओ। प्लीस राजीव यहाँ से चले जाओ।' रीटा ने मुँह फेरते हुए कहा।

आज रीटा पूरी तरह बदल चुकी थी। यह वही रीटा थी जो कभी राजीव के लिए अपनी जान देने के लिए भी तैयार हो जाती थी लेकिन अचानक उसे क्या हो गया। आधी अधूरी बातों से राजीव को यह तो मालूम हो गया कि रीटा ने लंदन के एक बड़े उद्योगपति मोहन अग्रवाल से उसी समय शादी कर ली थी जब वह मुंबई में था। यह रिश्ता रीटा के चाचाजी लाए थे। उस वक्त रीटा असमंज में थी कि वह किसे चुने एक तरफ राजीव था तो और दूसरी और मोहन।

मोहन के सामने राजीव की औकात फूटी कौड़ी की भी नहीं थी। उसके पास पुरखों की जायदाद और एक बड़ा कारोबार था। घर में दस-दस नौकर थे, वह रीटा के वो सभी सपने पूरे कर सकता था जिसे वह दिन-रात देखा करती थी। जबकि दूसरी और राजीव के पास उस व्यक्त रहने के लिए खुद का एक कमरा भी नहीं था। काफी सोच विचारकर अंत में रीटा ने प्यार के बदले पैसे देखकर मोहन से शादी कर ली और उसका पूरा परिवार दिल्ली छोड़ लंडन जा बसा।

बेचारा राजीव आखिर तक यह बात नहीं जान पाया कि वह सालों से जिस लड़की की प्रतिक्षा कर रहा था, वह आज एक लड़के की माँ बन चुकी है और मुंबई में अपने एक रिश्तेदार की शादी के लिए आई है।

राजीव अब तुम वापस चले जाओ। मेरे परिचितों का घर आ गया है। वो हम दोनों को जानते हैं। प्लीज चले जाओ' रीटा ने सामने वाली बिल्डिंग की और इशारा करते हुए कहा।

'लेकिन रीटा मेरी बात तो सुनो' राजीव अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया और रीटा अपने पति का विजिटिंग कार्ड देकर मल्टी के भीतर चली गई कार्ड में लिखा था। मि.मोहन कुमार अग्रवाल, एमडी फोर्च्युन प्राइवेट लि. लंदन।

उस मल्टी में दो-तीन तक शादी का माहौल रहा। शादी खत्म होने के बाद जब रीटा अपने परिवार के साथ लंदजाने के लिए रवाना हो रही थी तभी मल्टी के चौकीदार ने उसे एक लेटर दिया और कहा कि मैडम यह एक साहब आपके लिए छोड़कर चले गए हैं। यह वही लेटर था जो रीटा आज पढ़ रही थी। उसने उसका दूसरा पन्ना खोला जिसे पढ़ने का कष्ट रीटा ने आज से पहले कभी नहीं किया था। जिसमें राजीव ने एक बड़ी बात लिखी थी।

'रीटा मालूम नहीं क्यों मैं चाहकर भी तुमसे नफरत नहीं कर पाया। तुम्हारे जाने के बाद भी मुझे हमेशा ऎसा लगा कि तुम मेरे साथ हो रीटा तुम नहीं हो फिर भी हमेशा ऎसा लगता कि तुम मेरे साथ हो, जब भी कोई बात होती है तब लोगों से मैं तुम्हारी बात छेड़ देता हूँ। तुम्हीं मेरी वो आँखें हो जो मुझे सूनी और तन्हा राहों में रास्ता दिखाती है। तुम्हारे मुस्कान को याद करके में दुनियाभर का गम भूल जाता हूँ। मैं तुम्हें कल भी प्यार करता था, आज भी करता हूँ और हमेशा करता रहूँगा। हो सके तो अगले जन्म में जरूर मिलना। सदा तुम्हें प्यार करने वाला राजीव!

रीटा ने लेटर के नीचे देखा जिसमें उसी कंपनी का पता लिखा था जिसमें रीटा के पति काम करते थे। दूसरे दिन सुबह-सुबह रीटा ने अपने पति से पूछा 'क्या आप राजीव शर्मा को जानते हैं?

क्यों नहीं भला एक नौकर अपने बॉस को कैसे भूल सकता है। वह हमारी कंपनी के सीईओ हैं। फिलहाल वह मुंबई में हैं। मोहन ने बिना रीटा को देखे एक हाथ में चाय का कप और दूसरे हाथ में अखबार रखते हुए कहा।

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