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भाजपा पर भारी विधायक

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चुनाव 2008
- राजेश सिरोठिया
मालवा और महाराष्ट्र से सटे मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल में भाजपा के लिए पाँच साल पहले वाली स्थिति को कायम रख पाना बड़ा सवाल बन गया है। पिछले चुनाव में 17 में से 13 सीटें जीतकर पंजे को तीन सीटों पर समेट देने वाली भाजपा के लिए उसके आधा दर्जन से अधिक विधायक बोझ बन गए हैं। कुछ स्थानों पर जनशक्ति ने उसके लिए खाई खोद दी है। खंडवा, बुरहानपुर, बड़वानी और खरगोन जिले में भाजपा ने गुटबाजी के नए कीर्तिमान रचे हैं और इस मामले में कांग्रेस को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा यदि दस सीट भी यहाँ से जीत ले, तो वह उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी।

खंडवा जिले में निमाड़खेड़ी की जगह बनी मांधाता सीट मौजूदा कांग्रेसी विधायक राजनारायण सिंह पूर्णी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। कांग्रेस के लिए यह खतरा थोड़ा घटा है, तो इसकी बड़ी वजह राणा रघुराजसिंह की जनशक्ति के रूप में उम्मीदवारी है। भाजश के कारण ही कांग्रेस को भाजपा पर दो फीसदी की बढ़त मिल रही है। यहाँ से भाजपा के सर्वे से प्रत्याशी के रूप में जिलाध्यक्ष लोकेंद्रसिंह तोमर और दूसरे स्थान पर पूर्व मंडी अध्यक्ष नरेंद्रसिंह तोमर का नाम उभरा है। सांसद नंदकुमारसिंह चौहान के प्रभाव वाली इस सीट पर बसपा से रमेशचंद्र नांदिया को टिकट दिया गया है। नांदिया गुर्जर समाज के हैं और इससे कांग्रेस का सीधा नुकसान हो रहा है। कुल मिलाकर मांधाता सीट पर दिलचस्प मुकाबला है

हरसूद में शाह को मुश्किल : आदिवासियों की आरक्षित हरसूद विधानसभा सीट को बचाने के लिए वन एवं आदिम जाति कल्याण मंत्री कुंवर विजय शाह को जमीन- आसमान एक करना पड़ेगा। 33 फीसदी कोरकू और 19 फीसदी गौंड आदिवासी वाले इस इलाके में विजय शाह हरसूद शहर के विस्थापन का खामियाजा भुगत रहे हैं। पुनर्वास से उपजे असंतोष की खराश हरसूद-छनेरा व खालवा सेक्टर में कायम है। यहाँ का वोटर बिजली कटौती से आहत है।

उनका मानना है कि प्रदेश में रोशनी की खातिर अपनी घर-जमीन के बलिदान के बावजूद इलाके में बिजली की किल्लत है। हालाँकि विजय शाह की उम्मीदें कायम है, क्योंकि कांग्रेस में उनके खिलाफ सर्वमान्य प्रत्याशी नहीं है। कांग्रेस टिकट के लिए सर्वाधिक समर्थन प्रेमलता कासड़े को है।

खंडवा में वर्मा दावेदार : खंडवा शहर की सीट सुरक्षित हो जाने के कारण भाजपा के स्थानीय विधायक हुकुमचंद यादव के इनकम्बैंसी फैक्टर से बच गई है। पूर्व मंत्री एवं विधायक किशोरीलाल वर्मा की हत्या के बाद पंधाना सीट से जीते उनके पुत्र देवेंद्र वर्मा ही खंडवा से टिकट के प्रबल दावेदार है। भाजपा ने यदि अपनी आंतरिक गुटबाजी पर काबू पा लिया, तो इस सीट को जीतने में उसे कोई दिक्कत नहीं आएगी। कांग्रेस से टिकट पर ओमप्रकाश आर्य, कुंदन मालवीय और मोहन ढोकसे में स्पर्धा है।

पंधाना सीट जनजाति के लिए आरक्षित हो गई है। इस सीट से भाजपा प्रत्याशी के बतौर वनमंत्री विजय शाह की पत्नी भावना शाह को सर्वाधिक समर्थन है। दूसरे स्थान पर अनार वात्सक्ले और माँगीलाल वारे का नाम है। कांग्रेस से राव शैलेंद्र सिंह, मंजूला भासकरे और धूलसिंह डाबर हैं, तो जनशक्ति से चिंताराम मोरे हैं, लेकिन यहाँ बसपा का भी जनशक्ति बराबर असर है। नेपानगर सीट भी सामान्य से जनजाति के खाते में आ गई है।

इसलिए यहाँ की भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनीस को नई जगह तलाशना पड़ रही है। कांग्रेसी नेता और पूर्व मंत्री तनवंतसिंह कीर के साथ भी यही समस्या है। यहाँ से भाजपा टिकट के लिए कोरकू समाज के राजेंद्र दादू तथा कांग्रेस से रामकिशन पटेल और अंतरसिंह बरडे का नाम है। भाजपा की संभावनाएँ यहाँ तभी उजली होंगी, जबकि सांसद नंदकुमारसिंह चौहान और अर्चना चिटनीस के गुटों में सौहार्द पैदा हो।

भीकनगाँव में भाजपा को दिक्कत : खरगोन जिले की भीकनगाँव सुरक्षित सीट पर भाजपा विधायक धूलसिंह खतरे में हैं। कांग्रेस को यहाँ छः फीसदी की बढ़त मिल रही है। झँवरसिंह का नाम इनके विकल्प के रूप में उभरा है, तो कांग्रेस के सिलदार पटेल और झूमा सोलंकी का नाम है। बसपा से जियालाल गोलकर और सपा से लालसिंह का नाम है। बड़वाह सीट पर भी कांग्रेस को बढ़त है, तो इसका कारण विधायक हितेंद्रसिंह सोलंकी के समर्थकों द्वारा किया गया भ्रष्टचार है।

यहाँ से नरेंद्र शर्मा का नाम है, लेकिन यहाँ भी खरगोन के पूर्व सांसद कृष्णमुरारी मोघे गुट और विधायक गुट के बीच जारी खेमेबाजी भाजपा का नुकसान कर रही है। इस सीट से कांग्रेस के दावेदार सुभाष यादव और विजयलक्ष्मी साधौ गुटों में विभाजित है। कांग्रेस से यहाँ नरेंद्र पटेल, प्रकाश जैन और ताराचंद पटेल की दावेदारी है। बसपा से भगवान बड़ोले और मजीद खान तथा जनशक्ति से धनलक्ष्मी और दिलीप सरकोठिया की दावेदारी है।

महेश्वर सीट पर भाजपा विधायक भूपेंद्र आर्य की अलोकप्रियता के कारण भाजपा का ग्राफ नीचे है। सात फीसदी मतों की बढ़त के साथ कांग्रेस नेत्री डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ सामने हैं। भाजपा से भूपेंद्र आर्य के विकल्प के रूप में राजकुमार मेव है। बसपा से सीताराम मकवाने का नाम है। कसरावद सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता सुभाष यादव को जनशक्ति की प्रभावी मौजूदगी के कारण भाजपा पर चार फीसदी की बढ़त हासिल है, लेकिन बसपा ने ताराचंद यादव को टिकट देकर सुभाष यादव की चुनौतियाँ बढ़ा दी है। जनशक्ति से इस सीट पर गजानन पाटीदार का नाम है। भाजपा यहाँ यादव को तभी चुनौती दे सकती है, जबकि जनशक्ति मैदान में नहीं रहे।

बुरहानपुर में बहुकोणीय : बुरहानपुर सीट पर हाल ही में हुए दंगों का साया साफ देखा जा सकता है। परिसीमन ने वैसे भी इस सीट के राजनीतिक समीकरणों को गड्ड-मड्ड कर दिया है। भाजपा को इस सीट पर कांग्रेस के मुकाबले पाँच फीसदी और राष्ट्रवादी कांग्रेस की तुलना में तीन फीसदी मतों की बढ़त हासिल है। जनशक्ति, बसपा और सपा ने यहाँ के चुनावों को बहुकोणीय बनाया है। यदि कांग्रेस ने यह सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस के लिए छोड़ दी, तो भाजपा के लिए संकट बढ़ जाएगा।

हालाँकि जनशक्ति के लोकप्रिय नेता और पूर्व सांसद अमृतलाल तारवाला के असामयिक निधन से जनशक्ति की ताकत घटी है। भाजपा से इस सीट पर नेपानगर विधायक अर्चना चिटनीस का नाम आया है, तो महापौर अतुल पटेल तथा कैलाश पारिख की भी दावेदारी है। इस सीट में शाहपुर विधानसभा का बड़ा हिस्सा जुड़ा है, जिसमें सांसद नंदकुमारसिंह चौहान का अच्छा प्रभाव है, लेकिन यहाँ भी समस्या चौहान और चिटनीस के बीच खुली तकरार की है। इस सीट से राष्ट्रवादी कांग्रेस की ओर से मौजूदा विधायक हामिद काजी का नाम है, तो शाहपुर के कांग्रेसी विधायक रवींद्र महाजन कांग्रेस का टिकट माँग रहे हैं। तनवंतसिंह कीर भी चाहते हैं कि यदि भोपाल से टिकट नहीं मिलता है, तो उन्हें यहाँ अवसर दिया जाए। बुरहानपुर सीट का भविष्य कांग्रेस और राकांपा के गठजोड़ पर निर्भर करता है।

खरगोन शहर में भाजपा का ग्राफ नीचे : खरगोन की शहरी सीट पर भाजपा विधायक बाबूलाल महाजन की अलोकप्रियता के चलते भाजपा का ग्राफ यहाँ नीचे है। बची-खुची कसर जनशक्ति की चुनौती ने पूरी कर दी है। भाजपा प्रत्याशी के रूप में यहाँ से सर्वाधिक समर्थन भाजपा नेता बालकृष्ण पाटीदार को मिला है। कांग्रेस के सामने भी हाल के उपचुनाव में जीते सांसद अरुण यादव और रामलाल पाटीदार का विकल्प है। बसपा ने अजीजुद्दीन को टिकट दिया है। धूलकोट की जगह बनी भगवानपुरा में भी भाजपा की हालत पतली है। धूलकोट विधायक दलसिंह सोलंकी को मतदाताओं ने नकार दिया है। उनके विकल्प के रूप में मानसिंह लट्टू और जमुनासिंह सोलंकी का नाम है, लेकिन उन्हें कांग्रेस के केदारसिंह डाबर से कड़ी चुनौती मिलेगी। फिर भाजपा की उम्मीदों में पलीता लगाने के लिए जनपद सदस्य गोविंद बंडोल हैं ही।

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