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चुनाव 2008
- राजदेव पाण्डेय
विधानसभा चुनाव में भाजपा व कांग्रेस के लिए अपनी बढ़त बनाए रखना इस बार बड़ी चुनौती है। दो दलीय परंपरा का उपासक यह प्रदेश अब यूपी की राह पर जा सकता है, जहाँ की सत्ता की चासनी ढेर सारे छोटे-छोटे दल भी चख रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस वहाँ तीसरे व चौथे नंबर पर हैं। जिन दलों ने यूपी में भाजपा व कांग्रेस को हाशिए पर बना रखा है, वे अब मध्यप्रदेश में हल्ला बोलने आ रहे हैं। उन्होंने एमपी पर कब्जा जमाने के लिए विंध्य और चंबल घाटी पर हमला बोला है। जानकारों का मानना है कि ये दोनों क्षेत्र ही प्रदेश में तीसरी ताकत के प्रवेशद्वार बनेंगे। कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए रसूख बनाए रखने की यह चुनौती है।

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दोनों बड़े दलों कांग्रेस व भाजपा ने अपने चुनावी रथी घोषित नहीं किए। दरअसल इन दोनों दलों की चिंता आपसी प्रतिस्पर्धा से कम है। इनकी असली चिंता उन दलों से है, जिनके लिए राजनीतिक बोलचाल की शब्दावली में 'तीसरी ताकत' का शब्द आरक्षित है।

प्रदेश में तीसरी ताकत के उभार का भूत चुनावी परिदृश्य पर छाया हुआ है। उमा भारती भाजपा को अधिकतम घाटा देने के लिए मैदान में हैं। बुंदेलखंड और ग्वालियर-चंबल संभाग उनके लिए आसान मैदान होगा। यह चुनाव या तो वाटर लू साबित होगा, अन्यथा प्लासी वार, जिसे जीतकर अँगरेजों ने सारे देश पर कब्जे की नींव रख दी थी। कभी भाजपा के युवा तुर्क रहे प्रहलाद पटेल से उमा भारती ने फिर संपर्क साधा है। वे एक हुए तो भाजपा की ताकत को कम तो करेंगे ही।

दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी की मायावती हैं। कांग्रेस को नुकसान पहुँचाने के लिए उनकी पार्टी ने आत्मघाती तेवर अपनाए हैं। उनका राजनीतिक आत्मघाती दस्ता खुद महत्वाकांक्षा रूपी ज्वर और उपेक्षा के आंत्रशोथ से पीड़ित हैं। उनके खाद, पानी (वोट) को उनके नेताओं ने चुरा-सा लिया है, लेकिन 'हाथी' कितना भी कमजोर होगा, किसी की बागड़ उजाड़ने में तो सक्षम माना ही जा सकता है। राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी, सपा, समानता दल व नामी-गिरामी अन्य निर्दलीय उम्मीदवार तीसरी ताकत में शामिल होने को बेताब हैं।

सदन में तीसरी ताकत के प्रतिनिधि होने के अपने अलग मायने हैं। अगर त्रिकोणीय स्थिति बनी तो ये प्रतिनिधि सीधे तौर पर 'लाल बत्ती' के असली हकदार माने जाते हैं। ऐसे में हर कोई 'दमदार महत्वाकांक्षी' राजनीतिक शख्सियत ऐसी ताकत में शुमार होना चाहेगा। इसके अलावा दोनों बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस में घात-प्रतिघात की कहानी भी होगी। यह स्थिति छोटे दलों अथवा निर्दलियों के लिए खाद-पानी मुहैया कराने के लिए सक्षम होगी।

लोकतंत्र का आदर्श - अभी तक प्रदेश दो दलीय परंपरा का आदर्श लोकतंत्र रहा है। अगर कोई अनहोनी हुई, तीसरी ताकत का जन्म हुआ तो ये दोनों बड़े दलों के लिए असहज की स्थिति होगी। इस तरह का झटका यूपी में दोनों दलों को लग चुका है। फिलहाल ऐसा दिवास्वप्न दोनों ही दल मध्यप्रदेश में नहीं देखना चाहेंगे। यही वजह है कि कोई भी दल 'लूज' उम्मीदवार उतारने की रिस्क नहीं ले रहा। जिताऊ उम्मीदवार की तलाश में दोनों पार्टियों के क्षत्रपों की नींद भी खराब हो रही है। दोनों पार्टियों के आलाकमान जीतने के लिए एकता की बात कर रहे हैं।

बगैर लहर का चुनाव - इस बार का चुनाव पिछले चुनावों की तुलना में पहला ऐसा चुनाव होगा, जिसमें में कोई 'लहर' नहीं होगी। न सत्ता के समर्थन में और न ही विरोध में। जाहिर है इस चुनाव में प्रत्याशियों का व्यक्तिगत रसूख चलेगा। यह स्थिति बड़े दलों के प्रत्याशियों के लिए अच्छी नहीं मानी जाएगी।

बिजली, पानी, सड़क के मुद्दे पर जनता सभी दलों के दावे-प्रतिदावे देख चुकी है यानी मैदान मुद्दों से शून्य है। उसमें लड़ाई के लिए मुद्दारूपी हथियार नहीं होंगे। चुनावी अखाड़े में वही जीतेगा, जिसे धोबी पछाड़ का दाँव आता हो। संभव है तीसरी ताकत के नेता ऐसे ही पहलवान होंगे।

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