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फिर कोर्ट पहुंचा धार का भोजशाला विवाद, हर शुक्रवार नमाज पर रोक लगाने की मांग

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, गुरुवार, 12 मई 2022 (11:00 IST)
इंदौर। धार में ऐतिहासिक भोजशाला का विवाद एक बार फिर अदालत में पहुंच गया है। मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने हिंदू फ्रंट फार जस्टिस द्वारा भोजशाला में नमाज पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका स्वीकार कर ली है। अदालत ने इस संबंध में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI), केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भोजशाला कमेटी को नोटिस जारी किया है।
 
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की अध्यक्ष रंजना अग्निहोत्री ने इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, याचिका में कहा गया है कि भोजशाला में मंगलवार को हनुमान चालीसा और शुक्रवार को नमाज होती है। परिसर में दूसरे समुदाय की एंट्री और नमाज को बंद कराया जाए।
 
याचिका में मांग की गई है कि भोजशाला में मां सरस्वती का मंदिर था, जिसकी मूर्ति ब्रिटिश सरकार साथ ले गई थी। सरकार उसे सम्मान सहित वापस लाकर स्थापित करे। परिसर में जो खंडित मूर्तियां हैं, उनका रख-रखाव किया जाए। परिसर की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी हो, जिससे वे नष्ट ना हो सकें। परिसर में दूसरे समुदाय की एंट्री पर रोक लगाई जाए। शुक्रवार को होने वाली नमाज भी बंद हो।
 
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न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति अनिल वर्मा की युगलपीठ ने बुधवार को याचिकाकर्ता के तर्क सुनने के बाद केंद्र शासन, राज्य सरकार, पुरात्व विभाग, मौलाना कमालूद्दीन ट्रस्ट सहित अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में अगली सुनवाई जून के अंतिम सप्ताह में होगी। उल्लेखनीय है कि भोजशाला विवाद सदियों पुराना है।
 
हिंदूओं का कहना है कि यह सरस्वती देवी का मंदिर है। सदियों पहले मुसलमानों ने इसकी पवित्रता भंग करते हुए यहां मौलाना कमालूद्दीन की मजार बनाई थी। भोजशाला में आज भी देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक लिखे हुए हैं। अंग्रेजों ने भोजशाला में लगी वागदेवी की प्रतिमा को लंदन ले गए थे।
 
याचिका में मांग की गई है कि मुसलमानों को भोजशाला में नमाज पढ़ने से तुरंत रोका जाए। हर मंगलवार हिंदू यज्ञ-हवन कर भोजशाला को पवित्र करते हैं लेकिन शुक्रवार को मुसलमान इसे अपवित्र कर देते हैं। भोजशाला हिंदुओं के लिए उपासना स्थली है। मुसलमान नमाज के नाम पर भोजशाला के भीतर अवशेष मिटाने का काम कर रहे हैं।
 
क्या है भोजशाला का इतिहास : धार में परमार वंश के राजा भोज ने 1010 से 1055 ईसवीं तक 44 वर्ष शासन किया। उन्होंने 1034 में धार नगर में सरस्वती सदन की स्थापना की। यह एक महाविद्यालय था, जो बाद में भोजशाला के नाम से विख्यात हुआ। राजा भोज के शासन में ही यहां मां सरस्वती या वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की गई। मां वाग्देवी की यह प्रतिमा भोजशाला के समीप खुदाई के दौरान मिली थी। इतिहासकारों की मानें तो यह प्रतिमा 1875 में हुई खुदाई में निकली थी। 1880 में भोपावर का पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इसे अपने साथ लंदन ले गया था।
 
हुआ दरगाह का निर्माण : 1305 से 1401 के बीच अलाउद्दीन खिलजी तथा दिलावर खां गौरी की सेनाओं से माहलकदेव और गोगादेव ने युद्ध लड़ा। 1401 से 1531 में मालवा में स्वतंत्र सल्तनत की स्थापना। 1456 में महमूद खिलजी ने मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवाया।
 
दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे : भोजशाला को लेकर हिन्दू और मुस्लिम संगठनों के अपने-अपने दावे हैं। हिन्दू संगठन भोजशाला को राजा भोज कालीन इमारत बताते हुए इस हिन्दू समाज का अधिकार बताते हुए इस सरस्वती का मंदिर मानते हैं। हिन्दुओं का तर्क है कि राजवंश काल में यहां मुस्लिमों को कुछ समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। दूसरी तरफ मुस्लिम समाज का कहना है कि वे वर्षों से यहां नमाज पढ़ते आ रहे हैं, यह जामा मस्जिद है, जिसे भोजशाला-कमाल मौलाना मस्जिद कहते हैं।
 
इन स्थानों पर है विवाद : वसंत पंचमी को हिन्दू भोजशाला के गर्भगृह में सरस्वतीजी का चित्र रखकर पूजन करते हैं। 1909 में धार रियासत द्वारा 1904 के एशिएंट मोन्यूमेंट एक्ट को लागू कर धार दरबार के गजट जिल्द में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया। बाद में भोजशाला को पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया।
 
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के पास इसकी देखरेख का जिम्मेदारी है। धार स्टेट ने ही 1935 में परिसर में नमाज पढऩे की अनुमति दी थी। स्टेट दरबार के दीवान नाडकर ने तब भोजशाला को कमाल मौला की मस्जिद बताते हुए को शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति वाला आदेश जारी किया था। पहले भोजशाला शुक्रवार को ही खुलती थी और वहां नमाज हुआ करती थी। एएसआई के आदेश के बाद 2003 से व्यवस्थाएं बदल गईं।
 
प्रति मंगलवार और बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिन्दुओं को चावल और पुष्प लेकर पूजा की अनुमति और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति दी गई। सप्ताह के शेष दिन पांच दिनों में पर्यटक एक रुपए शुल्क देकर प्रवेश कर सकते हैं।
 
कब क्या हुआ
- 1456 में महमूद खिलजी ने मौलाना कमालूद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवाया गया।
-भोजशाला को लेकर 1995 में मामूली विवाद हुआ था। इसके बाद मंगलवार को हिंदूओं को पूजा और शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी गई।
-12 मई 1997 को प्रशासन ने भोजशाला में आम नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। हिंदुओं को बसंत पंचमी पर और मुसलमानों को शुक्रवार एक से तीन बजे तक नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। प्रतिबंध 31 जुलाई 1997 तक रहा।
-6 फरवरी 1998 को पुरातत्व विभाग ने भोजशाला में आगामी आदेश तक प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।
-2003 में मंगलवार को फिर से पूजा करने की अनुमति दी गई। पर्यटकों के लिए भी भोजशाला को खोल दिया गया।

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