-संजय जैन
झाबुआ। जैन समाज में 'नमो लोए सव्व साहूणं' की बजाय 'नमो लोए शव साहूणं' का प्रचलन धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। आज समाज अच्छे, चरित्रवान, संयमधारी साधुओं की बजाय शिथलाचारी साधुओं को पूजता नजर आ रहा है। ऐसा लगता है कि मानो यह जाग्रत समाज शवों को पूजने वाला समाज हो गया है। हमें इस विचारधारा को बदलना होगा एवं सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन तथा सम्यक चारित्र को प्राप्त करने के प्रयास करना होंगे। तभी हमारे अंदर के राग-द्वेष समाप्त होंगे तथा समाज का उत्थान होगा।
अकड़ना जो हमारा एक सिस्टम बन गया है, वह मुर्दे की पहचान है
यह क्रांतिकारी विचार स्थानीय ऋषभदेव बावन जिनालय के पौषधशाला भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में गणिवर्य मुनिश्री राजेन्द्र विजय मसा ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि महावीर स्वामीजी ने नीचे गिरे हुए जनों को ऊपर उठाया। गौतम स्वामी के माध्यम से तत्कालीन समाज में खेत में काम कर रहे किसानों को भी धर्म की राह पर चलना सिखाकर उन्हें मोक्षगामी जीव बनाया।
आदिवासियों के बीच पिछले 10 वर्षों के कार्यों के अनुभवों को बताते हुए गणिवर्य मुनिश्री ने कहा कि वनवासियों में धर्म के संबंध में अभी कोई सहीं सोच विकसित नहीं हो रही है। इस क्षेत्र के आदिवासियों के मस्तिष्क की कोरी स्लेट पर भविष्य की अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कार एवं अच्छी सोच तराशना है।
जैन समाज में व्याप्त संप्रदायवाद, गच्छवाद के बारे में आपने कहा कि जहां भेद है, वहां वेद नहीं है और जहां वेद नहीं है, वहां ज्ञान नहीं है और जहां ज्ञान नहीं है, वहां चारित्र नहीं है और जहां चारित्र नहीं है, वहां मोक्ष नहीं है। अत: सबसे पहले आप सब अपने अंतर्मन में बसे हुए मतभेदों को समाप्त करें।
धर्मसभा के पूर्व पूज्य साध्वीश्री मसा पुण्यदर्शनाश्रीजी, रत्नत्रयाश्रीजी, हर्षदर्शनाश्रीजी, तत्वत्रयाश्रीजी ने पूज्य मुनिराज की आगवानी की। पश्चात पूज्य मुनिराज की संघ चर्तुविध के साथ शोभायात्रा स्थानीय बड़े तालाब स्थित अंबिका माता मंदिर से प्रारंभ हुई तथा बावन जिनालय पर शोभायात्रा का समापन हुआ।
इसके पश्चात पूज्य मुनिराज ने बावन जिनालय में प्रभु ऋषभदेवजी की प्रतिमा के सम्मुख चैत्यवंदन कर भावभरा सुंदर भक्ति गीत प्रस्तुत किया। इसके पश्चात धर्मसभा के प्रारंभ में वरिष्ठ श्रावक ओएल जैन ने गुरुवंदन की विधि संपन्न करवाई।