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मध्यप्रदेश में 'पीले सोने' पर संकट के बादल

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Monsoon
इंदौर। देश के सबसे बड़े सोयाबीन उत्पादक मध्यप्रदेश में मानसूनी बारिश की कमी से मौजूदा खरीफ सत्र के दौरान इस तिलहन फसल पर संकट मंडरा रहा है। इससे सोयाबीन उगाने वाले किसानों की चिंता बढ़ गई है।
 
इंदौर के भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (आईआईएसआर) के निदेशक वीएस भाटिया ने बताया कि राज्य के लगभग सभी प्रमुख सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में इस तिलहन फसल की बुआई के बाद बेहद कम मॉनसूनी बारिश हुई है और सूखे मौसम का अंतराल बढ़ता जा रहा है। इससे सोयाबीन की फसल की स्थिति खराब है और यह नमी की गंभीर कमी से जूझ रही है।
 
भाटिया ने बताया, 'पश्चिमी मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में मॉनसूनी बारिश की अपेक्षाकृत लम्बी खेंच (कमी) के कारण सोयाबीन की फसल की हालत ज्यादा खराब है। इस क्षेत्र में कई किसान ऐसे भी हैं जिन्होंने पर्याप्त बारिश नहीं होने से अब तक सोयाबीन की बुआई ही नहीं की है।' 
 
इंदौर जिले के देपालपुर में पांच एकड़ में सोयाबीन बोने वाले किसान मांगीलाल पटेल ने कहा, 'इस बार मॉनसूनी बारिश हमें बुरी तरह तरसा रही है। आकाश में बादल तो घुमड़ते हैं, लेकिन बिना बरसे चले जाते हैं। अगर आने वाले दो-तीन दिन में अच्छी बारिश नहीं होती है, तो मेरे खेत में सोयाबीन की फसल बर्बाद हो जाएगी और मुझे दोबारा इसकी बुआई करनी पड़ेगी।' 
 
मध्यप्रदेश सरकार के कृषि विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि इस खरीफ सत्र के दौरान सूबे में 54.57 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन बुआई का लक्ष्य तय किया है। वर्ष 2016 के खरीफ सत्र के दौरान सूबे में 54.01 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन बोया गया था।
 
वैसे सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में सोयाबीन का सामान्य रकबा 58.59 लाख हेक्टेयर है, लेकिन पिछले तीन खरीफ सत्रों से देखा जा रहा है कि परम्परागत रूप से सोयाबीन उगाने वाले कई किसान उपज के बेहतर भावों की उम्मीद में दलहनी फसलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
 
जानकारों के मुताबिक इस बार बुआई के मामले में सूबे में सोयाबीन का खास मुकाबला तुअर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों के अलावा मक्का और कपास से भी है। बीते खरीफ सत्र के दौरान भावों में गिरावट के चलते किसानों को सोयाबीन की फसल सरकार के तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी नीचे बेचनी पड़ी थी।

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