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महाभारत की 10 प्रेम कहानियां, जिन्होंने बदल दिया इतिहास

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अनिरुद्ध जोशी

महाभारत में रिश्तों को लेकर बहुत पेंच है। एक तरफ बहुपत्नी है तो दूसरी तरफ बहुपति है। कहीं किसी का हरण हो रहा है तो कहीं पर किसी के साथ जबरदस्ती विवाह हो रहा है। लेकिन इन सभी के बीच प्रेम के फूल भी खिले हैं। महाभारत में यूं तो कई प्रेम कहानियां है लेकिन हम आपके लिए लाएं है मात्र 10 ऐसी प्रेम कहानियां जिनको लेकर युद्ध तक की नौबत आ गई थी और इतिहास बदल गया।
 
 
1.सत्यवती और ऋषि पाराशर : सत्यवती धीवर नामक एक मछुवारे की पुत्री थी और वह लोगों को अपनी नाव से यमुना पर करवाती थी। एक दिन वह ऋषि पाराशर को अपनी नाव में लेकर जा रही थी। ऋषि पाराशर उससे आकर्षित हुए और उन्होंने उससे प्यार करने की इच्छा जताई। सत्यवती ने ऋषि के सामने 3 शर्तें रखी- 1.उन्हें ऐसा करते हुए कोई नहीं देखे, पाराशर ने एक कृत्रिम आवरण बना दिया। 2.उसकी कौमार्यता प्रभावित नहीं होनी चाहिए, तो पाराशर ने उसे आश्वासन दिया की बच्चे के जन्म के बाद उसकी कौमार्यता पहले जैसी हो जाएगी। 3. वह चाहती थी कि उसकी मछली जैसी बदबू एक शानदार खुशबू में बदल जाए, पाराशर ने उसके चारों और एक सुगंध का वातावरन पैदा कर दिया। सत्यवती और पराशर ऋषि के प्रेम के कारण महान महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ।
 
 
2.शांतनु का सत्यवती से प्रेम : इसी सत्यवती ने शांतनु से विवाह किया था। यदि शांतनु सत्यवती से प्रेम नहीं करते तो महाभारत और कुरुवंश का इतिहास कुछ और होता। महाराजा शांतनु को गंगा से एक पुत्र मिला जिसका नाम उन्होंने देवव्रत रखा। देवव्रत हस्तिनापुर का युवराज घोषित कर दिया। यही देवव्रत आगे चलकर भीष्म कहलाए।
 
 
एक दिन शांतनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुए एक सुन्दर कन्या नजर आई। शांतनु उस कन्या पर मुग्ध हो गए। उन्होंने ने कन्या से उसका नाम पूछा तो उसने कहा, 'महाराजा मेरा नाम सत्यवती है और में निषाद कन्या हूं।' शांतनु सत्यवती के प्रेम में रहने लगे। सत्यवती भी राजा से प्रेम करने लगी। एक दिन शांतनु ने सत्यवती के पिता के समक्ष सत्यवती से विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन सत्यवती के पिता ने यह शर्त रखी की मेरी पुत्री से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का युवराज होकर राजा होगा तभी में अपनी कन्या का हाथ आपके हाथ में दूंगा। राजा इस प्रस्ताव को सुनकर अपने महल लौट आए और सत्यवती की याद में व्याकुल रहने लगे। जब यह बात भीष्म को पता चली तो उन्होंने अपने पिता की खुशी के खातिर आजीवन ब्रह्मचारी रहने की शपथ ली और सत्यवती का विवाह अपने पिता से करवा दिया।
 
 
3.कृष्ण और रुक्मणी का प्रेम : श्रीकृष्ण ने कई महिलाओं से प्रेम किया। राधा-कृष्ण की प्रेम कथा तो सभी जानते हैं, लेकिन कृष्ण और रुक्मिणी की नहीं। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह श्रीकृष्ण को छोड़कर अन्य किसी को भी पति रूप में स्वीकार नहीं करेगी। उधर, श्रीकृष्ण को भी इस बात का पता था। किंतु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह कृष्ण की बुआ के लड़के चेदिराज शिशुपाल के साथ हो।
 
 
रुक्म ने माता-पिता के विरोध के बावजूद अपनी बहन का कृष्ण के शत्रञ शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं। रुक्मिणी को जब इस बात का पता लगा, तो वह बड़ी दुखी हुई और तब उसने एक ब्राह्मण को द्वारिका श्रीकृष्ण के पास भेजा। अंतत: श्रीकृष्ण को रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा।
 
 
4.अर्जुन और सुभद्रा का प्रेम : सुभद्रा श्री कृष्ण की बहन थी। बलराम चाहते थे कि सुभद्रा का विवाह कौरव कुल में हो। बलराम के हठ के चलते ही तो श्री कृष्ण ने सुभद्रा का अर्जुन के हाथों हरण करवा दिया था। बाद में द्वारका में सुभद्रा के साथ अर्जुन का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ। विवाह के बाद वे एक वर्ष तक द्वारका में रहे और शेष समय पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत किया। 12 वर्ष पूरे होने पर वे सुभद्रा के साथ इंदप्रस्थ लौट आए। इंद्रप्रस्थ में जब सुभद्रा द्रौपदी से मिली तो उसने तुरंत अर्जुन से अपनी शादी के बारे में नहीं बताया। लेकिन जब वे घुल-मिल गई तो सुभद्रा से सच्चाई बता दी और द्रौपदी ने उसे स्वीकार कर लिया।
 
 
इसी तरह अर्जुन ने मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से भी प्रेम किया था। अर्जुन ने जब राजा चित्रवाहन के राज्य मणिपुर में भ्रमण किया तो उसने कावेरी के तट पर चित्रांगदा को देखा। वह बहुत सुंदर थी, अर्जुन को उससे प्यार हो गया। जब उसने राजा चित्रवाहन से उसका हाथ मांगा तो उन्होंने शर्त रखी कि उनका पुत्र मणिपुर लाया जाना चाहिए और उसे मणिपुर का साम्राज्य संभालना होगा। अर्जुन राजी हो गए। जब अर्जुन के पुत्र बब्रुवाहन का जन्म हुआ तो अर्जुन ने अपने भाइयों के पास इंद्रप्रस्थ जाने के लिए अपनी पत्नी और बेटे को छोड़ दिया। चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बब्रुवाहन मणिपुर का राजा बना। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के बाद बब्रुवाहन ने अपने पिता अर्जुन को युद्ध में हरा दिया था।
 
 
इसी तरह अर्जुन ने नाग कन्या उलूपी से भी प्रेम विवाह किया था। उलूपी अर्जुन के साथ प्यार में पड़ी तो उसने अर्जुन का अपहरण कर लिया। बाद में उसने अर्जुन को अपने साथ के लिए राजी कर लिया जो कि ब्रह्मचर्य के नियमों से बंधा हुआ और द्रोपदी से रिश्ता होने के कारण अन्य किसी महिला से संबंध नहीं रख सकता था। अंत में उसने अर्जुन को एक वरदान दिया कि पानी में उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता है।
 
 
5.साम्ब और लक्षमणा का प्रेम : भगवान कृष्ण की 8 पत्नियों में से एक जाम्बवती थीं। जाम्बवती-कृष्ण के पुत्र का नाम साम्ब था। महाभारत अनुसार इस साम्ब का दिल दुर्योधन और भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था और वे दोनों प्रेम करने लगे थे। दुर्योधन के पुत्र का नाम लक्ष्मण था और पुत्री का नाम लक्ष्मणा था। दुर्योधन अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र से नहीं करना चाहता था। इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से प्रेम विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाकर द्वारिका ले जाने लगा। जब यह बात कौरवों को पता चली तो कौरव अपनी पूरी सेना लेकर साम्ब से युद्ध करने आ पहुंचे।
 
 
कौरवों ने साम्ब को बंदी बना लिया। इसके बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम को पता चला, तब बलराम हस्तिनापुर पहुंच गए। बलराम ने कौरवों से निवेदनपूर्वक कहा कि साम्ब को मुक्त कर उसे लक्ष्मणा के साथ विदा कर दें, लेकिन कौरवों ने बलराम की बात नहीं मानी। ऐसे में बलराम का क्रोध जाग्रत हो गया। तब बलराम ने अपना रौद्र रूप प्रकट कर दिया। वे अपने हल से ही हस्तिनापुर की संपूर्ण धरती को खींचकर गंगा में डुबोने चल पड़े। यह देखकर कौरव भयभीत हो गए। संपूर्ण हस्तिनापुर में हाहाकार मच गया। सभी ने बलराम से माफी मांगी और तब साम्ब को लक्ष्मणा के साथ विदा कर दिया। बाद में द्वारिका में साम्ब और लक्ष्मणा का वैदिक रीति से विवाह संपन्न हुआ।
 
 
6.हिडिंबा और भीम : पांचों पांडव लक्षागृह से बचने के बाद एक रात जंगल में सो रहे थे और भीम पहरा दे रहे थे। जिस जंगल में सो रहे थे वह जंगल राक्षसराज हिडिंब का था। उसकी पुत्री का नाम हिडिंबा था जो कि एक नर भंसक थी। उसने जंगल में भीम को देखा तो उसके प्यार में पड़ गई और अपने भेष बदल कर भीम से शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। बहुत कठिनाइयों के बाद दोनों की शादी हो गई और दोनों कुछ समय तक साथ रहे। जब भीम ने उसे छोड़ दिया उसके बाद उसने घटोत्कच्छ को जन्म दिया जिसकी उसने बिना किसी पश्चाताप के अकेले देखभाल की।
 
 
7.अर्जुन और उलूपी का प्रेम : अर्जुन की चौथी पत्नी का नाम उलूपी था। कहते हैं कि उलूपी जलपरी थी। उन्हीं ने अर्जुन को जल में हानिरहित रहने का वरदान दिया था। इसके अलावा उसी ने चित्रांगदा और अर्जुन के पुत्र वभ्रुवाहन को युद्ध की शिक्षा दी थी। महाभारत युद्ध में अपने गुरु भीष्म पितामह को मारने के बाद ब्रह्मा-पुत्र से शापित होने के बाद उलूपी ने ही अर्जुन को शापमुक्त भी किया था।
 
 
दरअसल, एक बार अर्जुन ने युधिष्ठिर और द्रौपदी को एकांत में देखकर वैवाहिक नियम भंग कर दिया था जिसके चलते उन्होंने स्वेच्छापूर्वक एक वर्ष के लिए तीर्थ भ्रमण स्वीकार कर इंद्रप्रस्थ छोड़ दिया। एक दिन वे हरिद्वार में स्नान कर रहे थे कि तभी नागराज कौरव्‍य की पुत्री नागकन्या उलूपी ने उन्हें देखा और वह उन पर मोहित हो गई। ऐसे में वह उन्हें खींचकर अपने नागलोक में ले गई और उसके अनुरोध करने पर अर्जुन को उससे विवाह करना पड़ा।
 
 
अर्जुन ने नागराज के घर में ही वह रात्रि व्‍यतीत की। फिर सूर्योदय होने पर उलूपी के साथ अर्जुन नागलोक से ऊपर को उठे और फिर से हरिद्वार (गंगाद्वार) में गंगा के तट पर आ पहुंचे। उलूपी उन्‍हे वहां छोड़कर पुन: अपने घर को लौट गई। जाते समय उसने अर्जुन को यह वर दिया कि आप जल में सर्वत्र अजेय होंगे और सभी जलचर आपके वश में रहेंगे।
 
 
अर्जुन और नागकन्या उलूपी के मिलन से अर्जुन को एक वीरवार पुत्र मिला जिसका नाम इरावान रखा गया। भीष्म पर्व के 90वें अध्याय में संजय धृतराष्ट्र को इरावान का परिचय देते हुए बताते हैं कि इरावान नागराज कौरव्य की पुत्री उलूपी के गर्भ से अर्जुन द्वारा उत्पन्न किया गया था। नागराज की वह पुत्री उलूपी संतानहीन थी। उसके मनोनीत पति को गरूड़ ने मार डाला था, जिससे वह अत्यंत दीन एवं दयनीय हो रही थी। ऐरावतवंशी कौरव्य नाग ने उसे अर्जुन को अर्पित किया और अर्जुन ने उस नागकन्या को भार्या रूप में ग्रहण किया था। इस प्रकार अर्जुन पुत्र उत्पन्न हुआ था। इरावान सदा मातृकुल में रहा। वह नागलोक में ही माता उलूपी द्वारा पाल-पोसकर बड़ा किया गया और सब प्रकार से वहीं उसकी रक्षा की गयी थी। इरावान भी अपने पिता अर्जुन की भांति रूपवान, बलवान, गुणवान और सत्य पराक्रमी था।
 
8.कर्ण और द्रौपदी की प्रेम कथा : हालांकि इस यह कथा मान्यता पर आधारित है। कहते हैं कि द्रौपदी को महारथी कर्ण से प्रेम था और कर्ण को भी द्रौपदी पसंद थी। स्वयंवर में कर्ण भी गए थे। राजा द्रपुद का भीष्म से विरोध था और कर्ण भीष्म के पक्ष में थे। राजा द्रुपद ने द्रौपदी को पहले ही बता दिया था कि कर्ण एक सूत पुत्र है और यदि तुमने उन्हें पसंद किया तो जीवनभर तुम्हें एक दास की पत्नी के रूप में पहचाना जाएगा। स्वयंवर में निराश द्रौपदी ने एक कठिन निर्णय लेते हुए भरी सभा में कर्ण को एक सूत पुत्र कहकर अपमानीत किया था। फिर भी चीरहरण के दौरान द्रौपदी को कर्ण से उम्मीद थी लेकिन कर्ण ने अपने अपमान को याद कर वहां द्रौपदी की कोई सहायता नहीं की। बाद में जब भीष्म पितामह मृत्युशैया पर लेटे थे तब कर्ण ने उनसे कहा कि वे द्रौपदी को चाहते थे। यह बात द्रौपदी ने भी सुनी और पहली बार द्रौपदी को भी पता चला कि कर्ण भी मुझे प्रेम करते हैं।
 
 
 
9.राधा और कृष्ण : राधा को कृष्ण का प्रेम विवादित रहा है। राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। वृषभानु वैश्य थे। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की मित्र थीं और उसका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। बरसाना राधा के पिता वृषभानु का निवास स्थान था। बरसाने से मात्र 4 मील पर नंदगांव है, जहां श्रीकृष्ण के सौतेले पिता नंदजी का घर था। होली के दिन यहां इतनी धूम होती है कि दोनों गांव एक हो जाते हैं। बरसाने से नंदगाव टोली आती है और नंदगांव से भी टोली जाती है।
 
 
कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को 'लाड़ली' कहा जाता है। बरसाना गांव के पास दो पहाड़ियां मिलती हैं। उनकी घाटी बहुत ही कम चौड़ी है। मान्यता है कि गोपियां इसी मार्ग से दही-मक्खन बेचने जाया करती थीं। यहीं पर कभी-कभी कृष्ण उनकी मक्खन वाली मटकी छीन लिया करते थे। कहते हैं कि राधा की कृष्ण से पहली मुलाकात नंदगांव और बरसाने के बीच हुई। एक-दूसरे को देखने के बाद दोनों में सहज ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ गया। माना जाता है कि यहीं से राधा-कृष्ण के प्रेम की शुरुआत हुई। इस स्थान पर आज एक मंदिर है। इसे संकेत स्थान कहा जाता है। 
 
 
वृंदावन मथुरा से 14 किलोमीटर दूर है। विष्णु पुराण में वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी है। यहां श्रीकृष्‍ण ने कालिया का दमन किया था। मान्यता है कि यहीं पर श्रीकृष्‍ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे। कृष्ण की शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है। कृष्ण ने जो नंदगांव और वृंदावन में छोटा-सा समय गुजारा था, उसको लेकर भक्तिकाल के कवियों ने ही कविताएं लिखी हैं। उनमें कितनी सच्चाई है? ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 48 के अनुसार राधा कृष्ण की पत्नी (विवाहिता) थीं, जिनका विवाह ब्रह्मा ने करवाया। इसी पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 49 श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी थीं, क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था। हालांकि ऐसे कई श्लोक है जिससे यह स्पष्ट नहीं होता है कि राधा आखिर कृष्ण की प्रेम कथा कितनी सच है। लेकिन यह तो सच ही है कि भक्तिकाल और रीतिकाल में राधा के साथ बचपन में बिताए गए कुछ माह को इतना महिमा मंडित किया गया कि वह जप कब रुक्मणी-श्रीकृष्ण से राधा-कृष्ण हो गया पता ही नहीं चला। राधे राधे।
 
 
10.राजा दुष्यंत और शकुंतला : यह प्रसिद्ध कथा महाभारत में मिलती है। पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना 'महाभारत' में वर्णित 16 सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ 'अभिज्ञान शाकुंतलम' के एक वृत्तांत अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष का नामकरण हुआ। मरुद्गणों की कृपा से ही भरत को भारद्वाज नामक पुत्र मिला। भारद्वाज महान ‍ऋषि थे। चक्रवर्ती राजा भरत के चरित का उल्लेख महाभारत के आदिपर्व में भी है।
 
 
एक दिन राजा दुष्यंत ने वन में कण्व ऋषि के आश्रम में शकुंतला को देखा और वे उस पर मोहित हो गए। शकुंतला विश्वामित्र और मेनका की संतान थीं। दोनों ने गंधर्व विवाह किया और वन में ही रहने लगे। शकुंतला के साथ अच्छे दिन बताने के बाद राजा पुन: अपने राज्य जाने लगे और उन्होंने शकुंतला से वापस लौटकर उन्हें ले जाने का वादा किया। वे अपनी निशानी के रूप में अंगुठी देकर चले गए। एक दिन शकुंतला के आश्रम में ऋषि दुर्वासा आए। शकुंतला ने उनका उचित सत्कार नहीं किया तो उन्होंने शाप दे दिया कि जा तु जिसे भी याद कर रही है वह तुझे भूल जाएगा। गर्भवती शकुंतला ने ऋषि से अपने किए की माफी मांगी। ऋषि का दिल पिघल गया। उन्होंने कहा कि कोई निशानी तुम उसे बताओगी तो उसे याद आ जाएगा।
 
 
शकुंतला राजा से मिलने के लिए निकल गई। रास्ते में वह अंगुठी एक तालाब में गिर गई। जिसे मछली ने निकल लिया। शकुंतला राजभवन पहुंची लेकिन राजा दुष्यंत ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। राजा दुष्यंत द्वार शकुंतला के अपमान के कारण आकाश में बिजली चमकी और शकुंतला की मां मेनका उन्हें ले गयी।
 
 
उधर वो मछली एक मछुवारे के जाल में आ गयी जिसके पेट से वो अंगूठी निकली। मछुवारे ने वो उस अंगूठी को कीमती समझकर राजा दुष्यंत को भेंट दे दी। राजा दुष्यंत ने जब वह अंगुठी देखी तो उन्हें सबकुछ याद आ गया। महाराज दुष्यंत बहुत पछताए। कुछ समय बाद इंद्रदेव के निमन्त्रण पर देवो के साथ युद्ध करने के लिए राजा दुष्यंत इंद्र नगरी अमरावती गए। युद्ध के बाद वे आकाश मार्ग से वापस लौट रहे थे तभी उन्हें रास्ते में कश्यप ऋषि के आश्रम में एक सुंदर बालक को खेलते देखा। मेनका ने शकुंतला को कश्यप ऋषि के आश्रम में छोड़ा हुआ था। वो बालक शकुंतला का पुत्र ही था। 
 
 
जब उस बालक को राजा दुष्यंत ने देखा तो उसे देखकर उनके मन में प्रेम उमड़ आया वो जैसे ही उस बालक को गोद में उठाने के लिए खड़े हुए तो शकुंतला की सखियों ने चेताया कि राजन आप इस बालक को छुएंगे तो इसके भुजा में बंधा काला डोरा सांप बनकर आपको डंस लेगा। राजा ने इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और उस बालक को गोद में उठा लिया। लेकिन बालक को उठाते ही उसकी भुजा में बंधा काला डोरा टूट गया जो उसके पिता की निशानी थी। शकुंतला की सहेली ने सारी बात शकुंतला को बताई तो वो दौड़ती हुई राजा दुष्यंत के पास आयी। राजा दुष्यंत ने ने भी शकुंतला को पहचान लिया और अपने किए की क्षमा मांगी और उन दोनों को अपने राज्य ले गए। महाराज दुष्यंत और शकुंतला ने उस बालक का नाम भरत रखा जो आगर चलकर एक महान प्रतापी सम्राट बना।
 
 
मित्रों महाभारत की शुरुआत इस भरत से ही होती है।

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