मकर संक्रांति पर देशभर में पंतंग उड़ाने की परंपरा है। इसीलिए इसे पतंग उत्सव भी कहते हैं। मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा के पीछे कोई एक लिखित पौराणिक कथा तो नहीं है, लेकिन इसके साथ कई धार्मिक मान्यताएं, ऐतिहासिक प्रसंग जुड़े हुए हैं। यहाँ उन 2 कथाओं के बारे में बताया गया है जो हिंदू शस्त्रों में मिलती है।
1. प्रभु श्री राम और इंद्रलोक की कथा
सबसे प्रचलित लोककथा भगवान श्री राम से जुड़ी है। 'तुलसीदास' जी की रामचरितमानस और कुछ अन्य क्षेत्रीय रामायणों (जैसे तमिळ की कंबन रामायण) के अनुसार:
मकर संक्रांति के दिन प्रभु श्री राम ने पहली बार पतंग उड़ाई थी। वह पतंग उड़ते हुए इंद्रलोक तक जा पहुँची थी। इंद्र के पुत्र जयंत की पत्नी ने उस सुंदर पतंग को पकड़ लिया और सोचा कि इसे उड़ाने वाला कितना सुंदर होगा।
जब पतंग वापस नहीं आई, तो राम जी ने हनुमान जी को उसे लाने भेजा। हनुमान जी ने वहां जाकर बताया कि यह पतंग प्रभु राम की है। तब जयंत की पत्नी ने इस शर्त पर पतंग वापस की कि वह प्रभु के दर्शन करना चाहती हैं।
माना जाता है कि तभी से मकर संक्रांति पर खुशी और उत्साह के प्रतीक के रूप में पतंग उड़ाने की परंपरा शुरू हुई।
2. भीष्म पितामह और उत्तरायण
महाभारत काल में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण (मकर संक्रांति) होने तक अपनी मृत्यु को रोक कर रखा था। उत्तरायण को 'देवताओं का दिन' और मोक्ष का द्वार माना जाता है। आकाश की ओर ऊंची उड़ती हुई पतंगें, आत्मा के परमात्मा की ओर जाने और ऊँचाइयों को छूने के संकल्प का प्रतीक मानी जाती हैं।