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हिन्दी ब्लॉगिंग : खुशफहमियों से ऊपर उठकर थोड़ी समालोचना हो जाए

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-बालेन्दु शर्मा दाधीच
हिन्दी ब्लॉगिंग ने न सिर्फ इंटरनेट, बल्कि जनसंचार के माध्यमों तथा रचनाकर्म के बीच भी अलग पहचान और जगह बनाई है। हिन्दी रचनाकर्म के क्षेत्र में ठहराव और शीतलता के बीच ब्लॉगिंग, जो कि वास्तव में एक तकनीकी परिघटना तथा माध्यम मात्र है, ने वह हलचल और ऊष्मा पैदा की जिसकी अनुपस्थिति हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और भाषा प्रेमियों को व्यथित करने लगी थी। हिन्दी में पिछली बार ऐसी रचनात्मक हलचल टेलीविजन चैनलों के प्रस्फुटन के दौर में देखी गई थी। 
 
लगभग 20 साल के वायवीय अंतराल में ब्लॉगिंग ने, जो कि वास्तव में कोई हिन्दी-केंद्रित तकनीक नहीं है, हमारे साहित्यिक सूनेपन में दमदार हस्तक्षेप किया। इसके साथ ही रचनात्मकता का एक उफान-सा आया जिसने स्तरीय साहित्यिक सामग्री रचने वालों से लेकर घटिया रचनाओं की अंतहीन जुगाली करने वालों तक को हिन्दी अभिव्यक्ति संसार के व्यापक कलेवर के भीतर समेट लिया। 
 
आज हिन्दी ब्लॉगिंग उत्कृष्ट रचनाओं से लेकर दैनिक जीवन से जुड़ी महत्वहीन निजी टिप्पणियों, राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाक्रम की उपयोगी मीमांसाओं से लेकर अप्रिय किस्म के बहस-मुबाहिसों, रचनाकर्मियों के एक अद्वितीय मंच से लेकर गुटबाजी, आत्मश्लाघा एवं चापलूसी के अड्डे तथा जागरूकता फैलाने के सार्थक साधन से लेकर आरोप-प्रत्यारोपों के सहज सुलभ माध्यम का रूप ले चुका है। कुछ अच्छा, कुछ बुरा, हिन्दी ब्लॉग जगत वह पंचमेल खिचड़ी है जिसे खाने पर हर व्यक्ति को अलग-अलग स्वाद आता है। वास्तव में ब्लॉगिंग की अवधारणा भी यही है! सीमाओं से मुक्त, स्वच्छंद, सरल और सबको एक-दूसरे से जोड़ने वाला माध्यम।
 
हिन्दी ब्लॉगिंग का एक अहम कालखंड पूरा हो चुका है। इसने बहुत-सी उम्मीदें जगाई हैं और कुछ तोड़ भी दी हैं किंतु अब हिन्दी ब्लॉगिंग के 'तीव्र प्रसार' संबंधी आत्मसंतोष, आने वाले दिनों की सुखद कल्पनाओं और ब्लॉग विश्व की विविधताओं की प्रशंसा करते रहने का समय नहीं रहा।
 
तकनीकी और साहित्यिक दुनिया में 8-10 साल का अरसा किसी भी विधा या माध्यम को परिपक्व बनाने के लिए छोटा नहीं होता। इससे पहले कि हम हिन्दी ब्लॉगिंग के दूसरे तथा अधिक चुनौतीपूर्ण दौर में प्रवेश करें, इस बात का संजीदा, ईमानदार तथा व्यावहारिक मूल्यांकन किए जाने की जरूरत है कि अपने पहले चरण में क्या यह माध्यम वाकई उतना ही सफल तथा क्रांतिकारी सिद्ध हुआ जितनी संभावनाएं इसके भीतर मौजूद थीं।
 
हिन्दी ब्लॉगिंग के अधिकांश मंचों पर तथाकथित उपलब्धियों, खुशफहमियों और प्रचारात्मक बिंदुओं पर आधारित मुद्दे हावी हो जाते हैं। ऐसे मंचों पर प्रायः ईमानदार समालोचना और तटस्थ मूल्यांकन का अभाव रहता है। इतने वर्षों बाद ब्लॉगिंग की वाहवाही करते रहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अंततः हम यह प्रचार उन्हीं लोगों के बीच कर रहे हैं, जो स्वयं ब्लॉगर हैं या हिन्दी से जुड़े हैं। हिन्दी ब्लॉगिंग की वास्तविकताएं उनसे छिपी नहीं हैं।
 
स्वयं को निरंतर आश्वस्त करते रहने से ब्लॉगिंग का विकास होने वाला नहीं है और न ही उसमें आने वाली असुरक्षा की भावना समाप्त होगी। यदि उसे समाप्त करना है तो इस माध्यम की चुनौतियों और विकास के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। ब्लॉगिंग का सुखद, सुदर्शन चित्र खींचते रहने से उसका कोई विशेष लाभ नहीं होगा। बहुत हुआ तो यथास्थित कायम रह जाएगी (हालांकि ताजा चुनौतियों के मद्देनजर इस बात में भी गंभीर संदेह हैं)। आज उसके वास्तविक परिदृश्य को अनावृत्त करने की आवश्यकता है, भले ही वह कितना भी सुखद या अनाकर्षक हो। अंग्रेजी में इसके लिए एक अच्छा शब्द इस्तेमाल किया जाता है- 'रियलिटी चेक।' यदि हम अपनी सीमाओं को स्वीकार ही नहीं करेंगे तो उनसे आगे कैसे बढ़ेंगे?
 
साहित्य और ब्लॉगिंग : हिन्दी ब्लॉगिंग के भीतर और बाहर एक सवाल बार-बार उठाया जाता है कि ब्लॉग लेखन साहित्य है? इसी से जुड़ा एक अन्य प्रश्न भी चर्चा में रहता है कि हिन्दी ब्लॉगिंग ने हिन्दी साहित्य में कितना योगदान दिया है? अलग-अलग मंच पर इसका अलग-अलग उत्तर मिलेगा। यदि ब्लॉगरों की संगोष्ठी में पूछा जाए तो इस बात पर लगभग सर्वानुमति दिखाई देगी कि हिन्दी ब्लॉगिंग यकीनन साहित्य है और उसने साहित्य को बहुत समृद्ध बनाया है, किंतु साहित्यकारों के मंच पर उठने पर इसी प्रश्न का उत्तर नकारात्मक होगा। 
 
मेरी दृष्टि में दोनों ही पक्ष कुछ हद तक सही हैं। हिन्दी ब्लॉगिंग ने इस मायने में हिन्दी साहित्य के प्रति महत्वपूर्ण योगदान दिया है कि उसने लेखन, रचनाकर्म और अभिव्यक्ति के प्रति आम लोगों की अभिरुचि को पुनर्जीवित किया है। आधुनिक युग की व्यस्तताओं, विवशताओं तथा दैनिक जीवन में बढ़ते तकनीकी हस्तक्षेप के कारण आम हिन्दीभाषी व्यक्ति लिखना तो छोड़ ही दीजिए, पढ़ने से भी दूर होता जा रहा था। इस स्थिति में कोई बहुत नाटकीय बदलाव आज भी नहीं आया है, लेकिन फिर भी हिन्दी ब्लॉगिंग की बदौलत छात्रों, युवकों और अन्य नवोदित लेखकों का ऐसा वर्ग तैयार हुआ है जिसने हिन्दी में साहित्य रचना शुरू किया है। यहां गुणवत्ता का प्रश्न गौण है, क्योंकि आज नहीं तो कल इनमें से कुछ रचनाकर्मी हिन्दी साहित्यकारों की श्रेणी में अवश्य शामिल होंगे। 
 
हिन्दी ब्लॉगिंग ने एक बड़ा योगदान इंटरनेट को समृद्ध करने में दिया है। हिन्दी तथा भारत से जुड़ी विविधतापूर्ण सामग्री उन्होंने वेब पर डाली है, जो सर्च इंजनों के माध्यम से करोड़ों इंटरनेट प्रयोक्ताओं तक पहुंची है। कम्प्यूटर पर हिन्दी में काम कर उन्होंने हिन्दी के प्रसार में भी योगदान दिया है और दूसरे हिन्दी भाषियों को भी कम्प्यूटर कौशल से युक्त किया है। तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में उन्होंने जितना बड़ा योगदान दिया है, वैसा न सरकारें दे सकी हैं और न ही कंपनियां। आम हिन्दी ब्लॉगर ने इस धारणा को निर्मूल सिद्ध करने में मदद की है कि हिन्दी में यह संभव नहीं है या वह नहीं हो सकता। उन्होंने हिन्दी-विश्व का आत्मविश्वास बढ़ाया है। उसे स्वयं के प्रति अधिक आश्वस्त किया है। 
 
किंतु जहां तक साहित्य और ब्लॉगिंग का मुद्दा है, सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। हिन्दी ब्लॉगिंग में उस किस्म के स्तरीय तथा उत्कृष्ट लेखन की मात्रा कम है जिसे 'साहित्य' की श्रेणी में गिना जा सके। जो ब्लॉगर अपने लेखन को 'साहित्य' का दर्जा दिलाने के लिए उतावले होकर दलीलें देते हैं वे संभवत: साहित्य और ब्लॉगिंग दोनों ही अवधारणाओं के साथ न्याय नहीं करते। ब्लॉगिंग का मूलभूत उद्देश्य 'साहित्य-सृजन' नहीं है और न ही साहित्य में 'ब्लॉगिंग' जैसी कोई विधा शामिल हो पाई है।
 
लगभग 3 वर्ष पहले एक वरिष्ठ हिन्दी ब्लॉगर ने साहित्य और ब्लॉगिंग का संदर्भ आने पर टिप्पणी की थी कि ब्लॉगिंग साहित्य से भी कहीं आगे बढ़कर है। साहित्य के पाठक वर्ग का दायरा बहुत सीमित है जबकि ब्लॉग इंटरनेट के जरिए भौगोलिक सीमाओं से मुक्त हो चुका है। इस तरह की दलीलें भावुकतापूर्ण ही हैं। कारण, प्रसार का दायरा साहित्य की गुणवत्ता आंकने का पैमाना नहीं है। वह अभिव्यक्ति की गहराई, भाषा सौष्ठव, मनोरंजन, नवीनता, स्तरीयता, चिंतन की गहराई, बौद्धिक विमर्श तथा पाठक के प्रति अवदान जैसे पैमानों पर मापी जाती है। जो लेखन इन मापदंडों पर खरा है, वह 'साहित्य' की श्रेणी में गिना जाएगा, भले ही उसे पाठक के नाम पर एक भला आदमी भी नसीब न हो। दूसरी तरफ, कितने ही लेखकों के उपन्यास लाखों की संख्या में बिकते हैं लेकिन वे साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं गिने जाते। उनका साहित्य मनोरंजक अवश्य है इसलिए लोकप्रिय भी है किंतु उत्कृष्ट साहित्य कहलाने के लिए आवश्यक अन्य अवयवों के लिहाज से इन रचनाओं की बहुत-सी सीमाएं हैं।
 
स्वच्छंद अभिव्यक्ति के मायने : डिक कोस्टलो के अनुसार, The Internet destroyed most of the barriers to publication. The cost of being a publisher dropped to almost zero with two interesting immediate results: anybody can publish, and more importantly, you can publish whatever you want.
 
अपनी तबीयत के हिसाब से कुछ भी प्रकाशित करने की आजादी ब्लॉग की मूलभूत अवधारणा के लिहाज से उसकी बड़ी मजबूती है। किंतु साहित्य के बरक्स देखेंगे तो यही उसकी कमजोरी बन जाती है। यहां प्रकाशित रचना किसी दूसरे व्यक्ति, और वह भी विशेषज्ञ स्तर के व्यक्ति, के हाथ से नहीं गुजरती। साहित्यिक गुणवत्ता का तटस्थ निर्धारण नहीं हुए बिना ही वह प्रकाशित होती है। उसे भाषा-सौंदर्य, त्रुटिहीनता, तथ्यात्मकता, शैली, प्रामाणिकता, मौलिकता, काव्यगत अनुशासन जैसे पैमानों पर कसने की व्यवस्था नहीं है।
 
हर ब्लॉगर रचनात्मक हो, यह आवश्यक नहीं लेकिन साहित्य के लिए वह आवश्यक है। यहां 'आज तबीयत नासाज है' से लेकर 'लखनऊ में अच्छी बेडमी कहां मिलेगी' जैसे विषयों पर भी पोस्ट लिख सकते हैं और वह भी लिखने का मन न हो तो कहीं से कॉपी-पेस्ट कर सकते हैं। कुछ बहुत अच्छी साहित्यिक परियोजनाएं, कुछ बहुत अच्छे रचनाकर्मी, और उच्च स्तरीय ब्लॉग भी मौजूद हैं, इसमें दो राय नहीं है। लेकिन कहीं कोई सीमा भी तो नहीं है। ब्लॉगिंग एक स्वांत: सुखाय अभिव्यक्ति, रचनात्मकता और संचार का साधन है। वह पत्रकारिता तो है किंतु अनौपचारिक किस्म की, अप्रमाणित पत्रकारिता। वह साहित्य भी हो सकता है, किंतु छिन्न-भिन्न, असंगठित, अपरिमार्जित और स्वच्छंद जिसमें से 'सबस्टेंस' ढूंढने के लिए उसे काफी छानने की जरूरत है। आगे हम इस विषय पर और चर्चा करेंगे।

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