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सियासीवार भी तलवार से कम नहीं
सियासीवार भी तलवार से कुछ कम नहीं होता, कभी कश्मीर जाता है, कभी बंगाल कटता है - मुनव्वर राना
इस शख़्स ने क़ुरआन पढ़ा है
है सद्र की इक एक गज़ल जाने फ़साहत, लगता है के इस शख़्स ने क़ुरआन पढ़ा है - इदरीस सद्र
दुनिया की आदत है
दुनिया की आदत है इसमें हैरत क्या, काँच के घर पर पत्थर मारा जाता है - आलम ख़ुर्शीद
कलियाँ जब भी उदास होती हैं
कलियाँ जब भी उदास होती हैं, उनकी अफसुरदगी मिटाने को, तितलियाँ आसपास होती हैं - अज़ीज़ अंसारी
दोस्तों का न रिश्तेदारों का
दोस्तों का न रिश्तेदारों का इस दिखावे के दौर में मुझको आसरा है फ़क़त किताबों का - अज़ीज़ अंसारी
मैं क्या जानूँ रोज़ा है या टूट गया
पेट की ख़ातिर फ़ुट-पाथों पर बेच रहा हूँ तस्वीरें, मैं क्या जानूँ रोज़ा है या मेरा रोज़ा टूट गया - मुनव्
बहुत हसीन सही सोहबतें
बहुत हसीन सही सोहबतें गुलों की मगर, वो ज़िन्दगी है जो कांटों के दरमियाँ गुज़रे।
मैं किसको आँख भरकर देखता
डूबने वाला था, और साहिल पे चेहरों का हुजूम, पल की मौहलत थी, मैं किसको आँख भरकर देखता - अहमद फ़राज़
अहले-मुहब्बत को बसाया जाए
कोई शहर ऐसा भी दुनिया में बनाया जाए, जिसमें सिर्फ़ अहले-मुहब्बत को बसाया जाए - कैफ़ मुरादाबादी
फूलों की बस्ती में जाना
काँटों से गुजर जाना, शोलों से निकल जाना, फूलों की बस्ती में जाना तो सँभल जाना।
किसी बेवफा की खातिर
किसी बेवफा की खातिर ये जुनूँ फराज़ कब तक, जो तुम्हें भुला चुका है उसे तुम भी भूल जाओ - अहमद फराज़
ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे
ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया।
कोई निशान लगाते चलो
कोई निशान लगाते चलो दरख़्तों पर, के इस सफ़र में तुम्हें लौट कर भी आना है ---- रऊफ़ ख़ैर
ज़िंदगी भी हाथ में आ जाएगी
खुद को देखें हम पराई आँख से, हर कमी अपनी नजर आ जाएगी, एक ही लम्हे पे कब्ज़ा कीजिए, ज़िंदगी भी हाथ
तेरा हमसफर कहाँ है
उन रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे, मुझे रोक-रोक पूछा, तेरा हमसफर कहाँ है।
रूठना अब तो तेरी आदत में शामिल हो गया
पहले इसमें इक अदा थी, नाज़ था, अंदाज़ था रूठना अब तो तेरी आदत में शामिल हो गया - आग़ा 'शायर'
मान लो तुमसे रूठ जाए कोई
मान लो तुमसे रूठ जाए कोई, तुम भला किस तरह मनाओगे - 'फिराक' गोरखपुरी
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
नहीं आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती, मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं।
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए, पंखुड़ी इक गुलाब की सी है----------------- मीर
याद रक्खो तो दिल के
याद रक्खो तो दिल के पास हैं हम, भूल जाओ तो फ़ासले हैं बहुत।
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