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एक घड़ी सुधारने वाला जब बन गया कार कंपनी का मालिक

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अनिरुद्ध जोशी

यह कहानी है फोर्ड कंपनी के मालिक हेनरी फोर्ड की, जिन्हें 5 वर्ष की उम्र में पढ़ाई के लिए एक गांव से ढाई किलोमीटर दूर पैदल ही दूसरे कस्बे के स्कूल जाना पड़ता था। पिता की इच्छा थी कि हेनरी एक अच्‍छा किसान बने लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 11 वर्ष की उम्र में हेनरी के खिलौने आम बच्चों से अलग हटकर थे। चाय की केतली, हल तथा छोटे-छोटे पुर्जे उनके खिलौने हुआ करते थे।
 
 
15 वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गया था। हेनरी के साथ ही उनके पिता मार्गरेट फोर्ड, जेन फोर्ड, विलियम फोर्ड, और रोबर्ट फोर्ड को भी छोड़कर चले गए थे। यह सभी बच्चे अनाथ हो गए थे। फोर्ड परिवार पुरी तरह से नीचे गिर गया था। 
 
15 वर्ष की उम्र में हेनरी को उनके पिता ने एक जेब घड़ी दी थी। उन्होंने तब घड़ी ठीक करके अपना गुजारा करना प्रारंभ किया। 16 वर्ष की उम्र में वे डिट्रॉइट में एक कारखाने में यांत्रिक विद्या का ज्ञान प्राप्त करने लगे। फिर वहां से घर वापस लौटकर पिता की दी हुई 80 एकड़ भूमि पर मशीन मरम्मत करने का एक कारखाना खोला। 
 
विवाह के बाद उन्होंने गैस इंजिन और खेतों पर भारी काम करने वाली मशीन बनाने की एक योजना बनाई, लेकिन उसमें वे सफल नहीं हो पाए। वे फिर से डिट्रॉइट चले आए। वहां उन्होंने डिट्रॉइट एडिसन इलेक्ट्रिक कंपनी में काम करना आरम्भ किया और वहां उन्होंने पेट्रोल से चलने वाली पहली गाड़ी बनाई, जिसमें 4HP की शक्ति होती थी।
 
इसके बाद उन्होंने खुद की डिट्रॉइट ऑटोमोबाइल कंपनी की स्थापना की। फिर इस कंपनी से छोड़कर वे दौड़ में भाग लेने वाली गाड़ियां बनाने लगे। दौड़ में उनकी गाड़ियों को शानदार सफलता मिली जिसके चलते उनका नाम होने लगा। इस प्रसिद्धि के कारण हेनरी फोर्ड ने फोर्ड मोटर कंपनी की स्थापना की। पहले साल में फोर्ड मोटर कंपनी ने 2 सिलिंडर और 8 HP की 1708 गाड़िया बनाई। दूसरे साल में उनकी 5000 गाड़िया बिक गयी। इस तरह वे दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनी के मालिकों की लिस्ट में शामिल हो गए।
 
 
प्रेरक प्रसंग : हेनरी फोर्ड ने जो कुछ भी किया था खुद के दम पर किया था। उन्होंने घड़ी सुधारने से लेकर कार बनाने तक के सफर में अपना काम खुद ही किया। एक बार की बात है कि भारत के कुछ चुनिंदा उद्योगपति व्यक्ति उनसे मिलेन के लिए उनसे समय मांगकर उनके बंगले पर पहुंच गए। वहां उन्होंने एक व्यक्ति को बर्तन मांजते हुए देखा तो उससे कहा कि हमें हेनरी फोर्ड से मिलना है उन्होंने हमें इसी समय मिलने का वक्त दिया था। वह व्यक्ति विनम्रता से उठा और उसने सभी को एक जगह बैठाया और बोला मैं अभी आता हूं। ऐसा कहकर वह अंदर चला गया। 
 
कुछ देर बाद बर्तन मांजने वाला वह व्यक्ति हाथ-पैर धोकर उनके पास आकर बैठ गया और बोला- तो आप हैं वह भारतीय उद्योगपति। मुझे हेनरी कहते हैं।...यह सुनकर सभी उद्योगपति असमंजस में पड़ गए। 
 
भारतीय उद्योगपति को असमंजस में देखकर हेनरी ने कहा, 'लगता है आपको मेरे हेनरी होने पर सन्देह हो रहा है?' उन उद्योगपतियों ने कहा कि हां, यह तो होगा ही क्योंकि अभी आपको एक नौकर का काम करते देखा और सोचा इतनी बड़ी कंपनी का मालिक बर्तन साफ कैसे कर सकता है। ऐसा करते हुए देखकर किसी को भी भ्रम पैदा हो सकता है। यह काम तो नौकरों का है।
 
 
हेनरी ने कहा, 'शुरुआत में मैं भी एक साधारण आदमी था और अपना काम खुद करता था। अपने हाथ से किए गए कठोर परिश्रम का ही फल है कि आज मैं फोर्ड मोटर का मालिक हूं। मैं अपने अतीत को भूल न जाऊं और मुझे लोग बड़ा आदमी न समझने लगे, इसलिए मैं अपने सभी काम अपने हाथ से करता हूं। अपना काम करने में मुझे किसी तरह की शर्मिन्दगी और झिझक नहीं होती।'
 
यह सुनकर एक भारतीय उद्योगपति खड़ा हो गया और कहने लगा, अब मैं चलना चाहूंगा क्योंकि जिस मकसद से आपके पास आया था, वह एक मिनट में ही पूरा हो गया। मेरी समझ में आ गया कि सफलता की कुंजी दूसरों पर भरोसा करने में नहीं, स्वयं पर भरोसा करने में है।'

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