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हवाई हमलों ने अमेरिका को और जटिल स्थिति में डाला

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अवधेश कुमार

अमेरिका ने अफगानिस्तान से बोरिया-बिस्तर समेट लिया है। लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान में दो हवाई हमला किया जा चुका है। ये दोनों हमले भविष्य के लिए कई प्रश्न खड़े करते हैं। पहला हमला अफगानिस्तान के नंगहार प्रांत में किया गया था।

अमेरिकी सेंट्रल कमान के प्रवक्ता ने दावा किया था कि हमने आईएसआईएस के खुरासान मॉडल यानी आईएसकेपी के ठिकाने पर मानव रहित हवाई हमला किया जिसमें काबुल हमले के साजिशकर्ता को मार दिया गया है। दूसरा हमला काबुल में ही किया गया और अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता बिल अर्बन ने कहा कि अमेरिकी सैन्यबलों ने आत्मरक्षा में काबुल में एक गाड़ी पर एयरस्ट्राइक की है, जिसमें आईएसआईएस का बड़ा आतंकवादी मारा गया है, जो हामिद करजई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिए खतरा था। आईएसकेपी ने काबुल हवाई अड्डे पर हमले की जिम्मेदारी ली थी।

बाद में आईएस की आधिकारिक अमाक न्‍यूज एजेंसी के हवाले गार्जियन समाचार पत्र ने रिपोर्ट दिया कि आईएसकेपी ने आत्मघाती हमलावरों में से एक अब्दुल रहमान अल-लोगारी की तस्वीर जारी की है, जिसने काबुल हवाई अड्डे पर हमला किया था।

आईएस ने कहा है कि हमलावर अमेरिकी बलों से 5 मीटर की दूरी तक पहुंचने में सक्षम रहे। अगर आईएस का यह दावा सही है तो अमेरिका के लिए शर्म का विषय होना चाहिए कि काबुल हवाई अड्डा उसकी सुरक्षा निगरानी में था और हमलावर गोला बारूद के साथ उसके इतने पास पहुंच गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि काबुल हवाई अड्डे के बाहर हुए विस्फोट में मारे गए 13 अमेरिकी सैनिकों का बदला ले लिया गया है। उन्होंने उसके बाद कहा था कि हम आतंकवादियों को ढूंढ कर मारेंगे। बिडेन प्रशासन की ओर से कहा गया कि हमने कहा था कि मारेंगे और मार दिया। संभव है अमेरिका आगे और भी ड्रोन से मानवरहित हवाई हमले करें।

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की जोखिम भरी और बेतरतीब वापसी के कदम से अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन दुनिया के साथ स्वयं अमेरिकियों के भी निशाने पर हैं। पूरे अमेरिका में उनका व्यापक विरोध हो रहा है। विश्व भर में सोशल मीडिया पर जो बिडेन को जेहादी आतंकवादी समूहों के समर्थक एवं विश्व समुदाय के खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

अमेरिका की थूथू हो रही है। अमेरिका में माहौल यह है कि जो बिडेन ने पूरे देश को शर्मसार किया है। कहा जा रहा है कि उन्होंने दुनिया के साथ साथ अमेरिका के लिए ही जोखिम बढ़ा दिया है। जो तालिबान उतार फेंके गए थे उन्हें इस तरह 20 वर्ष बाद पहले से ज्यादा मजबूत बना कर छोड़ा है कि वे कल अमेरिका के लिए भी सिरदर्द बनेंगे।

विश्व भर के विश्लेषकों का यह आकलन भी सही है कि अमेरिका के इस रवैया से पूरी दुनिया भर के जिहादी आतंकवादियों को नई ऊर्जा मिली है। उनको लग रहा है कि हम चाहे जितना आतंकवाद फैलाएं अमेरिका और उनके सहयोगी देश हमारे विरुद्ध कार्रवाई करने नहीं आने वाले। अमेरिका में जो बिडेन को हटाने तक की मांग हो रही है। एक समूह पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में फिर से अभियान चला रहा है। ट्रंप फिर से सामने आ गए हैं। रिपब्लिकन पार्टी पूरी तरह हमलावर है। रिपब्लिकन सीनेटर और पूर्व प्रवक्ता डेन क्रेनशॉ ऐसे ऐसे तथ्य लेकर सामने आ रहे हैं जिसका जवाब देना बिडेन प्रशासन और डेमोक्रेट के लिए मुश्किल हो गया है।

डेन क्रेनशॉ ने अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान में छोड़े गए युद्धक विमानो, हेलीकॉप्टरों, ड्रोनों,हथियार और गोला बारूद, बख्तरबंद गाड़ियों, आधुनिक उपकरणों की सूची प्रस्तुत करते हुए बताया कि ये हथियार उतने हैं जितने विश्व के 85 प्रतिशत देशों के पास नहीं है। उन्होंने बिडेन को लताड़ते हुए कहा कि मिस्टर प्रेसिडेंट बिडेन, अब मामले को संभालिए जिसे आपने खड़ा किया है। भागने की कोशिश मत कीजिए। आपके हाथ खून से रंगे हैं। हम युद्ध के मैदान में हैं। युद्ध का अंत समझने की गलती मत कीजिए।

आपने दुश्मन को एक और फायदेमंद मौका दिया है। यह सच है कि जो बिडेन ने सेना तथा खुफिया एजेंसियों के सुझाव को दरकिनार करते हुए अमेरिकी सेना सहित सैन्य कांट्रैक्टरों एवं अन्य को वापस करने का निर्णय किया। सेना के अंदर भी जो बिडेन को लेकर आक्रोश का भाव है। अफगानिस्तान से लौटे जवान का वीडियो वायरल हुआ है जिसमें कह रहा है कि हमने सब कुछ गड़बड़ कर दिया। जो कुछ 20 सालों में पाया था उसे न केवल खोया बल्कि बुरी तरह पलट दिया। लगभग यही भाव संपूर्ण सैन्य महकमे में है।

जो बिडेन से काबुल हवाई अड्डे आतंकवादी हमला के बाद पूछा गया कि क्या आप जिम्मेवारी लेते हैं? उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ उसकी जिम्मेवारी मैं लेता हूं लेकिन इसमें यह जोड़ा कि नहीं भूलिए कि पूर्व राष्ट्रपति ने 31 मई तक ही अमेरिकी सेना की वापसी का फैसला कर लिया था। उसके बाद पूरे अमेरिका में यह प्रश्न उठाया जाने लगा कि क्या जो बिडेन डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का अनुसरण करने के लिए राष्ट्रपति बने थे? इसमें उनके पास फिर से कुछ पराक्रम दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

अमेरिकी नागरिकों की मृत्यु को आम अमेरिकी सहन नहीं कर पाते और उसमें भी अगर सेना के जवान मारे जाएं तो पूरे देश का माहौल ही अलग हो जाता है। इस तरह माना जा सकता है कि जो बिडेन ने तत्काल आम अमेरिकियों के आक्रोश को कम करने तथा अपनी कलंकित छवि को ठीक करने के लक्ष्य से ये हमले किए हैं। आईएएस खुरासान मॉडल तालिबान और अमेरिका दोनों का विरोधी है। लेकिन यहां भी कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या अमेरिका ने अपनी खुफिया सूचना के आधार पर ये हमले किए या फिर उनको तालिबान ने सूचना दी? अगर सूचना तालिबान ने दी तो कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपनी लड़ाई अमेरिका के माध्यम से लड़ना चाहता है? आखिर उसके दुश्मन से अगर अमेरिका लड़ रहा है तो तालिबान के लिए इससे राहत पर प्रसन्नता की और कोई बात हो नहीं सकती। काबुल हवाई अड्डे पर हमले के एक हफ्ते पहले आईएसकेपी के प्रमोशनल वीडियो क्लिप में तालिबान पर अमेरिका की कठपुतली होने और सच्चे शरिया का प्रचार नहीं करने का आरोप लगाया था। उसी संदेश में आईएस ने अफगानिस्तान में जिहाद के नए चरण का वादा किया। तो आईएस उस घोषणा के अनुसार लड़ाई के नए दौर की शुरुआत कर चुका है।

प्रश्न है कि क्या बिडेन के नेतृत्व वाला अमेरिका अपनी वापसी के बाद भी इस तरह के हमले करेगा? काबुल हवाई अड्डे हमले का मास्टरमाइंड इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत के प्रमुख मौलवी अब्दुल्ला उर्फ असलम फारूकी को माना जा रहा है। फारूकी को पिछले साल अप्रैल में अफगान सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार किया था। लेकिन, जब तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा कर लिया, तो उन्होंने बगराम जेल से सभी आतंकवादियों को रिहा कर दिया। अफगान सुरक्षा बलों की हिरासत में रहते हुए असलम फारूकी ने आईएसआई के साथ अपने संबंध स्वीकार किया था। पाकिस्तान ने उसके प्रत्यर्पण की मांग की थी जिसे तब अब्दुल गनी सरकार ने मना कर दिया था। तालिबान कहता है कि आईएसकेपी उसका कट्टर दुश्मन है, लेकिन उन्होंने उसे बगराम जेल से अन्य आतंकवादियों से साथ ही रिहा कर दिया।

यह तालिबान के आम व्यवहार के विपरीत है। ध्यान रखने की बात यह भी है कि इस समय काबुल के सुरक्षा की जिम्मेवारी तालिबान ने हक्कानी समूह को दे दिया है और हक्कानी समूह का पूरा समर्थन आईएस केपी को रहा है। फारुकी पाकिस्तानी नागरिक है। उसका मुख्य केंद्र अभी भी पाकिस्तान ही है।

इन सारे सूत्रों को जोड़ने के बाद कोई एक निष्कर्ष निकालना कठिन होता है। तालिबान आईएसकेपी के लोगों को छोड़ते नहीं लेकिन उन्होंने फारुकी को आराम से छोड़ दिया। तालिबान हक्कानी समूह एक हैं तो फिर आईएसकेपी को हक्कानी का समर्थन क्यों है? जाहिर है,जो बिडेन भले अपनी इज्जत बचाने की छटपटाहट में आईएसकेपी को निशाना बना रहे हों या भविष्य में निशाना बनाएंगे लेकिन साफ है कि इससे संबंधित सारे पहलुओं की विवेचना उनके प्रशासन ने नहीं की है। आशंका यह है कि तालिबान और अफगानिस्तान से जान छुड़ाकर भागने की हड़बड़ाहट में जो बिडेन ने कहीं एक नया मोर्चा तो नहीं खोल दिया। या तालिबान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका को फंसाने की चाल तो नहीं चली? सारे प्रश्न अमेरिका के हवाई हमले वाले नए तेवर से जुड़े हुए हैं।

इतना जरूर स्वीकार करना होगा कि अमेरिका का हवाई हमला बताता है कि अफगानिस्तान से भागने की आतुरता के बावजूद जो बिडेन के लिए जान छुड़ा पाना मुश्किल है। ऐसे हवाई हमलों से अमेरिकियों का गुस्सा शांत नहीं हो सकता और आईएएस से टकराव उन्हें पूरी तरह अफगानिस्तान से भागने नहीं देगा। भले धरती पर नहीं लेकिन आकाश के रास्ते अफगानिस्तान में अमेरिका बने रह सकता है।

इस आलेख में व्‍यक्‍‍त विचार लेखक के निजी अनुभव और निजी अभिव्‍यक्‍ति है। वेबदुनि‍या का इससे कोई संबंध नहीं है।

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