Publish Date: Thu, 26 Feb 2026 (17:09 IST)
Updated Date: Thu, 26 Feb 2026 (17:10 IST)
मैंने एक रील देखी जिसमें बताया जा रहा था कि ईश्वर का मजाक बनाने वालो को सजा मिलती है। उस रील में टाइटैनिक से लेकर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिन तक के उदाहरण शामिल थे। जिनको ईश्वर का मजाक बनाने से लेकर इंसान को ईश्वर से बड़ा समझने के बुरे परिणाम भुगतने को मिले थे। यह वीडियों भले ही एक प्रकार से गॉड का डर पैदा करने के लिए बनाई गई हो। पर यह सच ही है कि हमें एक परमसत्ता तो चला ही रही है। जो सम्पूर्ण विश्व को संचालित करती है।
चाहे हम इंसानों ने ईश्वर, गाॅड, वाहेगुरु, अल्लाह नाम बदलकर रख दिए हो और चाहे उनमें आपसी प्रतिद्वंदिता, प्रतियोगियों के रूप में लगवा दी हो। हम चाहे ये बड़े, वे बड़े, ये श्रेष्ठ, वे सर्वश्रेष्ठ कर रहे हो। ऐसा सिद्ध करने के लिए हमने रेडियों कार्बन डेटिंग का प्रयोग भी किया तब कालक्रम भी निर्धारित करवा दिया हो। पर हम उस सत्ता को कभी पूर्ण रूप से नकार नहीं पाए है। खैर, कौन कितना पुराना और नया है यह हम फिर कभी बात करेंगे। पर आज तो हम आस्तिक और नास्तिकता के विषय पर ही ध्यान देंगे।
तो रील देखकर मेरे मन में एक भाव आया कि हमारे सनातन धर्म में भी तो हमारे पूर्वज, बडे़ कहते आए है कि भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती और गलत का फल तो मिलता ही है। जिसे हमारे ईश जगतगुरु श्री कृष्ण गीता में कर्म कहते है और उससे मिले परिणाम को कर्मफल कहते है। इसी को मॉर्डन युग में कर्मा कहते है। कर्म के परिणाम को ही अच्छा और गलत परिणाम मिलने के रूप में जानते है। वैसे मेरे हिसाब से अच्छा और गलत करने के तरीके भी है। जिसे हम केवल हाथों से ही नहीं बल्कि सोचकर, सुनकर, बोलकर, लिखकर, बताकर, हावभाव से भी करते है। हम शाश्वत रूप से समझे तो कह सकते है कि अच्छे का फल अच्छा तो गलत का फल गलत ही मिलता है। यह फल आज नहीं तो कल, गलत बातों की सजा के रूप में मिलता ही है।
मैंने खुद को नास्तिक कहने वालों को देखा है। वह ईश्वर की सत्ता को समझने के लिए एक मिथ्या का आवरण ओढ़ते है। वे कहते है कि ईश्वर जैसा कुछ नहीं होता। तो इसके विपरीत मेरा खुद का मानना है कि ईश्वर का मजाक जिसने भी बनाया है उसके परिणाम उसने भुगते ही है। मैंने देखा है चाहे आस्तिक हो या नास्तिक जब वे बीमारी में होते है, एक्सीडेंट में, मरते समय की पीड़ा को भोगते है तो वह अपने गलत कृत्यों के लिए ईश्वर से माफी मांगते पाए जाते है।
वैसे तो, वह जीवन भर कहते रहते है कि ईश्वर होते ही नहीं। पर ऐसा कहते-कहते और खुद की बात सिद्ध करने में ईश्वर के अस्तित्व को नकारने में लगे होने के कारण ईश्वर को ज्यादा याद करने लग जाते है। इसलिए नास्तिकता कुछ होती ही नहीं। यह तो एक भ्रामकता है। शाश्वत सत्य तो आस्तिक होना ही है। चाहे वह ईश्वर को स्वीकारने में हो, चाहे अस्वीकार करने में, पर दोनों ही अवस्थाओं में आस्तिक और नास्तिक जन करीब तो ईश्वर के ही जाते है। ईश्वर के बारे में सोचना भी तो ईश्वरीय भक्ति ही है।
अगली बात, क्यों कई चीजें वैज्ञानिकता के मापदंड पर परखने के बाद भी उनके आगे वैज्ञानिकता धाराशाही हो जाती है? क्यों वैज्ञानिक आज तक मरने के बाद मनुष्य के साथ क्या होता है नहीं पता लगा पाए? क्यों आज तक विज्ञान धर्म की जांच तो कर पाया है पर धर्म से आगे नहीं बढ़ पाया? कितने ही लोग कहते पाए जा रहे है, हम ईश्वर को नहीं मानते पर वास्तव में जो अपने आपको नास्तिक कहते है वही ईश्वर की खोज में ज्यादा लगे होते है। वे ही विभिन्न माध्यमों से सबसे ज्यादा साबित करने में लगे होते है कि ईश्वर नहीं है और ऐसा ईश्वर ने नहीं किया, बल्कि ऐसा इसके या उसके कारण हुआ है।
ईश्वर को नकारते-नकारते वह ईश्वर की ज्यादा खोज कर बैठते है। चाहे किसी भी रूप में पर नास्तिक लोग ही ईश्वर की ज्यादा बातें करते है। इसलिए, नास्तिक होना बस एक अवस्था है और मनगढ़त व्याख्या। ऐसी व्याख्या करने वाले ही ज्यादा ईश्वर की शक्तियों से तुलनात्मक अध्ययन करते जाते है और एक समय में उनको विज्ञान भी फेल होता लगने लगता है। जिसके उदाहरण तो आज भी भारत के सनातन तीर्थक्षेत्रों में सरलता से देखने को मिल जाते है।
उदाहरण के लिए ज्वाला मां पर नौ ज्योतिषियों का बिना किसी ईंधन के जलना, उज्जैन के काल भैरव मंदिर का मदिरापान का दृश्य, यमुनोत्री में भीषण ठंड में सूर्यकुण्ड में गरम पानी मिलना, तो श्री जगन्नाथ धाम के रहस्य, महाकाल बाबा का मंदिर ग्रीनविच पर बना होना। ऐसे ही असंख्य उदाहरण जिनके उत्तर नास्तिकों को भी आज तक विज्ञान के सहारे खोजने पर भी नहीं मिल सके है।
मेरा तो मानना है कि दुनिया का हर व्यक्ति आस्तिक ही है क्योंकि आज तक स्वइच्छा से कोई भी जन्म, मरण, परण तय नहीं कर पाया और ना ही यह दावा कर पाया है कि अगले दिन उसके साथ क्या होने वाला है। वह बस एक विश्वास के साथ बोल देता है कि 'यह मैं कल करता हूं या करती हूं' और यह विश्वास क्या है? ऐसा विश्वास किससे भरोसे जताया गया? बस जिस अदृश्य शक्ति के भरोसे विश्वास जताया वहीं मन में भगवान होने का भाव है। बस इसलिए आस्था को मन में धारने वाला कभी नास्तिक हो ही नहीं सकता। नास्तिकता तो बस एक मिथ्या भाव है।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)
Edited BY: Raajshri Kasliwal