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कृषि कानून वापसी के राजनीति के साथ दूसरे पहलू भी महत्वपूर्ण

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अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब राष्ट्र के नाम संबोधन की शुरुआत की तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वे तीनों कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा कर देंगे।

आखिर जिस कानून को लेकर सरकार पिछले एक वर्ष से अड़ी हुई थी, साफ घोषणा कर रही थी कि वापस नहीं होंगे, कृषि कानून विरोधी आंदोलन के संगठनों के साथ बातचीत के बाद कृषि मंत्री ने स्पष्ट बयान दिया था, स्वयं प्रधानमंत्री ने संसद के संबोधन में आक्रामक रुख अख्तियार किया था उसकी वापसी की उम्मीद आसानी से नहीं की जा सकती थी।

तो यह प्रश्न निश्चित रूप से उठेगा कि किन कारणों से प्रधानमंत्री ने यह निर्णय किया? इसके राजनीतिक मायने स्पष्ट हैं और सबसे ज्यादा चर्चा इसी की हो रही है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह स्वाभाविक भी है।

ऐसा नहीं है कि पूरा देश इस कानून के विरुद्ध था। सच्चाई यही है कि देश का बहुसंख्य किसान इन कानूनों के पक्ष में था। दिल्ली की सीमाओं पर कभी इतनी भीड़ जमा नहीं हुई या देश के अलग-अलग भागों से उतनी संख्या में लोग आंदोलन का समर्थन करने नहीं आए जिनके आधार पर कोई निष्कर्ष निकाले कि यह देशव्यापी मुद्दा है। इसका सरकार को भी पता था।

उच्चतम न्यायालय ने इन कानूनों पर रोक लगा ही रखी थी। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी एवं उनके रणनीतिकारों को भी आभास था कि अगर वापसी की घोषणा हुई तो विपक्ष उपहास उड़ायेगा। बावजूद उन्होंने इसकी घोषणा की है तो राजनीति के साथ इसके दूसरे पक्षों को भी समझना होगा।

यह बात सही नहीं लगती कि प्रधानमंत्री के फैसले के पीछे उत्तर प्रदेश चुनाव मुख्य कारण है। भाजपा के आंतरिक सर्वेक्षणों में कृषि कानूनों को लेकर उत्तर प्रदेश में व्यापक विरोध नहीं मिला। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में जरूर थोड़ा बहुत विरोध मिला लेकिन उससे चुनाव परिणाम बहुत ज्यादा प्रभावित होता इसकी रिपोर्ट नहीं थी। उत्तराखंड के तराई इलाके में असर था।

हरियाणा में भी समस्या पैदा हो रही थी क्योंकि आंदोलन और संगठनों के लोग वहां कई जगहों पर हाबी थे। गठबंधन के साथी जेजेपी को भी समस्या थी किंतु यह भी साफ था कि उन्होंने गठबंधन तोड़ा, सरकार गिरी तो आगामी चुनाव में उनको फिर से सफलता मिलने की निश्चिंतता नहीं है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह जब गृह मंत्री अमित शाह से मिले तो आंतरिक सुरक्षा के साथ पंजाब की राजनीति पर चर्चा हुई। कैप्टन अमरिंदर ने कहा भी अगर भाजपा कृषि कानूनों को वापस कर लेती है तो उनके साथ गठबंधन हो सकता है। कैप्टन के अनुसार कृषि कानूनों के पहले भाजपा को लेकर पंजाब में कोई समस्या नहीं थी।

भाजपा अकाली गठबंधन इन्हीं कानूनों पर टूट चुका था और प्रधानमंत्री ने स्वयं अकाली दल की जिस ढंग से तीखी आलोचना की, उस पर वार किया उसके बाद पंजाब के अंदर भाजपा के लोगों को लगा कि अब पार्टी स्वतंत्र रूप से खड़ी हो सकती है। पंजाब के अंदर से भाजपा के नेताओं- कार्यकर्ताओं की यह शिकायत लंबे समय से थी कि अकाली उनको काम करने नहीं देते और यह गठबंधन पार्टी के लिए हमेशा नुकसानदायक रहा है। यहां तक कि नवजोत सिंह सिद्धू के भाजपा छोड़ने के पीछे एक बड़ा कारण अकाली से नाराजगी थी। पार्टी ने राज्य से फीडबैक लिया और यह निर्णय का एक कारण है।

अमरिंदर की नई पार्टी लोक कांग्रेस और भाजपा के बीच गठबंधन हो सकता है और अकाली दल के साथ आने को भी खारिज नहीं किया जा सकता। इससे कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों के लिए चुनौती खड़ी होगी। यद्यपि कैप्टन की पार्टी नयी है लेकिन उनका जनाधार कई क्षेत्रों में व्यापक है।

आने वाले समय में इसके बाद उनके समर्थन में कांग्रेस के काफी नेता आ सकते हैं। कांग्रेस में इतनी अंदरूनी कलह है कि उसकी सत्ता में वापसी को लेकर कोई नेता आश्वस्त नहीं है। यहां से पंजाब में नई राजनीति की शुरुआत हो सकती है। कांग्रेस के नेता चाहे इस पर जो भी बयान दें उनके लिए खतरा पैदा हो गया है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की क्षति को तो भाजपा ने रोका ही है हरियाणा का भी राजनीतिक वायुमंडल बदल लिया है। भाजपा की नजर 2024 के चुनाव पर भी है। कई बार माहौल विरोधियों को सरकार के विरुद्ध आक्रामक होने और व्यापक रूप से घेरेबंदी का आधार दे देता है।

कृषि कानून पिछले चुनाव में बड़ा मुद्दा नहीं था। बावजूद इस आधार पर भाजपा विरोधियों ने पश्चिम बंगाल में उसके तथा विरुद्ध तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रचार किया। ऐसे कई समूह जुट जाएं तो कई स्थानों पर भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते थे। यह राज्यों के चुनाव पर भी लागू होता है और लोकसभा पर भी।

देखा जाए तो संपूर्ण विपक्ष, जिसमें राजनीतिक और गैरराजनीतिक दोनों शामिल है, सरकार को घेरने की बड़ी आधार भूमि कृषि कानूनों को बना चुका था। अचानक यह छीन जाने से आगामी चुनाव के लिए सरकार विरोधी आक्रामक रणनीति बनाने के लिए सभी को नए सिरे से विचार करना पड़ेगा। जो नेता इस आंदोलन के कारण स्वयं को हीरो मान रहे थे उनके सामने भी कोई चारा नहीं होगा।

राकेश टिकैत ने अवश्य कहा और संयुक्त किसान मोर्चा ने निर्णय किया कि संसद में कानून निरस्तीकरण की प्रतीक्षा करेंगे किंतु है समर्थन में ऐसा वर्ग भी जो इस सीमा तक आंदोलन को खींचने के पक्ष में नहीं है। अगर संयुक्त किसान मोर्चा आगे न्यूनतम गारंटी कानून एवं अन्य मांगों को लेकर आंदोलन को खींचने की कोशिश करते हैं तो उनका समर्थन कम होगा।

प्रधानमंत्री ने समर्थन मूल्य के लिए समिति की भी घोषणा कर दी। इसके साथ अपील भी की है कि अब धरना दे रहे किसान घरों और खेतों को वापस चले जाएं। जाहिर है, इसको भी समर्थन मिलेगा और जो जिद पर आएंगे उनका आधार कमजोर होगा।इस तरह राजनीति के स्तर पर यह कदम तत्काल भाजपा के लिए लाभदायक एवं राजनीतिक- गैर राजनीतिक विपक्ष के लिए धक्का साबित होता दिख रहा है। विपक्ष की प्रतिक्रियाओं  में दम नहीं दिखता। सरकार ने कदम क्यों वापस लिया, पहले क्यो नहीं किया जैसै प्रश्न चुनाव में ज्यादा मायने नहीं रखते।

किंतु इस मामले को राजनीति से बाहर निकल कर देखने की आवश्यकता है। केंद्र के पास पुख्ता रिपोर्ट है और कैप्टन अमरिंदर ने गृहमंत्री से मुलाकात में इसको विस्तार से समझाया कि कैसे खालिस्तानी तत्व इस आंदोलन के माध्यम से सक्रिय होकर काम कर रहे हैं। पाकिस्तान उनको समर्थन दे रहा है।  इस बीच इन तत्वों की सक्रियता विदेश के साथ देश में भी दिखी है। निर्णय के पीछे यह एक बड़ा कारण है। लोकतंत्र का आदर्श सिद्धांत कहता है कि कदम चाहे जितना उचित हो अगर उसका विरोध सीमित ही सही हो रहा है, देश का वातावरण उससे प्रभावित होता है तो उसे वापस लेना चाहिए और भविष्य में वातावरण बनाकर फिर सामने आयें।

इसे आप रणनीति भी कह सकते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिपालन। हालांकि इससे उन लोगों को धक्का लगा है जो कानूनों को आवश्यक मानकर समर्थन में मुखर थे। सरकार को उन्हें भी समझाने में समय लगेगा। निर्णयों में हमेशा दूसरा पक्ष होता है। सरकार दूसरे पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर सकती। मोदी ने अपने संबोधन में कहा भी कि वे देश से माफी मांगते हैं क्योंकि वे कुछ किसानों को कानून की अच्छाइयां समझा नहीं सके। वैसे सच यही है कि आंदोलन में ऐसे तत्व हावी हो गए थे जो जानते हुए भी समझने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि उनका एजेंडा बिल्कुल अलग था। उन्हें कृषि कानूनों से ज्यादा मोदी सरकार के विरुध्द वातावरण बनाने में रुचि थी थी और है।

ये चाहते हैं कि सरकार को बल प्रयोग करना पड़े, कुछ हिंसा, अशांति हो और उन्हें सरकार विरोधी देशव्यापी माहौल बनाने में सहायता मिले। मोदी ने इस संभावना और इससे उत्पन्न होने वाले संभावित खतरे को खत्म करने की कोशिश की है। सरकार की जिम्मेवारी ऐसे तत्वों से देश को बचाना भी है। हालांकि सरकार ने कोशिश की होती तो आंदोलन खत्म हो चुका होता, तंबू उखड़ चुके होते। पता नहीं किस सोच के तहत एक छोटे से फोड़े को नासूर बनने दिया गया और जिन कृषि कानूनों की मांग वर्तमान विपक्ष के अनेक दल स्वयं करते रहे हैं, उन्होंने स्वयं इसकी पहल की उसे वापस लेने का दुखद कदम उठाना पड़ा है।

यह उन लोगों के लिए भी सबक है जो समस्याओं के निपटारे के लिए साहसी कदमों के समर्थक हैं। ऐसे लोग इस लंबे धरने के विरुद्ध सड़कों पर उतरते तो सरकार के सामने कृषि कानूनों को बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। ऐसे लोगों को भविष्य की तैयारी करनी चाहिए ताकि उनकी दृष्टि में अच्छा कोई कदम वापस लेने की नौबत नहीं आए।

(आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, वेबदुनिया का इससे कोई संबंध नहीं है।)

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