आदित्य पांडे
मैंने पिता को नहीं देखा फिर भी...
मैं और मेरी तन्हाई...अक्सर बातें करते हैं कि आप होते तो कैसा होता, यह तो यकीनन नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बात यकीनी तौर पर कह सकता हूं कि कुछ भी ऐसा नहीं होता जैसा अभी है। न मैं और न मेरे आसपास की दुनिया.. बच्चों के लिए खुद को दांव पर लगाते पिताओं को देखकर और आपके बारे में जितना सुना है उससे जोड़कर यह छवि तो बनती ही है कि आपके बिना मुझे जो निर्णय लेने पड़े, शायद वो मुझे न लेने पड़ते जो मैंने लिए और न उनके एवज में कड़वे घूंट पीने पड़ते...क्योंकि तब निर्णय आपके होते और उनका जहर आप ही तक रहता। ...शायद धूप ही कम होती या शायद आपकी छांव उससे भी बड़ी होती...
उम्र से पहले बड़े हो जाने का ही मामला क्यों...यह भी तो, कि मैं भी किसी से किसी चीज के लिए जिद कर पाता और उनमें से कुछ ख्वाहिशें डांट डपट के बाद ही सही पूरी भी हो जातीं...यकीन मानिए मैंने कभी ऐसा कोई काम नहीं किया जो मुझे उम्र से छोटा महसूस करा पाता...हां, ऐसे तो कई काम किए जो मेरी उम्र में दूसरों को पता भी नहीं होते थे जैसे किसी के यहां गमी में जाना...और भी न जाने क्या-क्या... बड़ी जिम्मेदारियों के काम...
पर बड़े होने पर कभी-कभी मैंने आपको उस जगह महसूस किया है जहां मुझे आपकी जरूरत थी...मैं नहीं जानता कब, कहां और कैसे अनजान राहों पर आपने मेरी मदद की...महसूस किया है बड़ी शिद्दत से कि वह आप ही थे, मुझे विश्वास है कि वह आप ही थे...जिन्होंने मुझे कठोर मुसीबतों से बचाया और वह भी आप ही हैं जिनकी अदृश्य स्मृतियों ने मुझे मजबूत बनाया है... आप सुन रहे हैं ना?