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बलराज साहनी के एक थप्‍पड़ के बाद हमेशा के लिए बदल गई हबीब तनवीर की जिंदगी

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नवीन रांगियाल

कभी कभी कोई घटना किसी सबक की तरह काम करती है। ख्‍यात नाटककार और अभि‍नेता हबीब तनवीर के साथ एक बार यही हुआ था। एक घटना हुई और एक उनकी एक आदत हमेशा के लिए बदल गई। एक दूसरी घटना में वे बर्तोल्त ब्रेख्त से मिलने के लिए अचानक बर्ल‍िन पहुंच जाते हैं लेकिन जब वे वहां पहुंचते हैं तो पता चलता है कि‍ ब्रेख्‍त की तो मौत हो चुकी है…

एक नाटक की रिहर्सल चल रही है। एक अभि‍नेता अपने डायलॉग ठीक से नहीं बोल पा रहा था। वो बार बार डायलॉग भूल जाता है। कई बार प्रैक्टिस की। लेकिन कुछ काम नहीं आया। ठीक इसी दौरान एक दूसरा शख्स वहां आता है और फि‍र एक थप्‍पड़ की आवाज आती है। फिर वो कहता है फिर से डायलॉग बोलो… और इस बार डायलॉग परफैक्‍ट हो जाता है।

नाटक का जो किरदार डायलॉग नहीं बोल पा रहा था वो ख्यात नाटककार हबीब तनवीर थे और जिसने उन्हें चांटा मारा वो बलराज साहनी थे। यह वाकया खुद हबीब तनवीर ने अपने एक इंटरव्यू में सुनाया था।
चांटा मारने के बाद बलराज साहनी ने हबीब तनवीर से कहा था-
‘थियेटर में जो सबसे जरुरी चीज होती है वो है मसल मेमोरी। यह जो चांटा तुम्हें मारा गया, यह तुम्हारी मसल मेमोरी है, जिससे नाटक का डायलॉग तुम्हें हमेशा के लिए याद हो गया। इसलिए इस मसल मेमोरी को कभी भूलना मत’

1 सिंतबर 1923 में हबीब तनवीर का जन्‍म हुआ था। जबकि 8 जून 2009 को उनका निधन हो गया। आइए जानते हैं उनके नाटक की दीवानगी के बारे में कुछ दिलचस्‍प तथ्य।

थप्‍पड़ वाली घटना के बाद हबीब तनवीर बलराज साहनी को अपना गुरु मानने लगे थे। जब इप्टा के सभी सदस्य जेल में थे बंद हो गए थे तो इप्टा को संभालने की जिम्मेदारी हबीब के कंधों पर ही आ गई थी। नाटक की दुनिया में पहला कदम हबीब तनवीर ने करीब ग्यारह-बारह साल की उम्र में ही रख दिया था। तब उन्होंने शेक्सपीयर के लिए नाटक किंग जॉन प्ले में काम किया था। हालांकि एक रंगकर्मी के तौर पर उनका सफर 1948 में मुंबई में इप्टा के साथ शुरू हुआ।

जब ब्रेख्त से मिलने पहुंचे बर्लिन
उनके बारे में एक किस्सा बहुत मशहूर है। वे नाटक के दीवाने हो चुके थे। यूरोप में रहते हुए ही उन्होंने एक दिन बर्तोल्त ब्रेख्त से मिलने की ठानी। इसके लिए वेट्रेन से बर्लिन पहुंच गए। लेकिन जब वहां गए तो पता चला कि करीब एक हफ्ते पहले ही ब्रेख्त की मौत हो चुकी है। लेकिन यहां भी उन्होंने सीखना नहीं छोड़ा। बर्लिन में आठ महीने रहे और ब्रेख्त के कई नाटक देखे और वहां के कलाकारों से नाटकों के बारे में जाना और समझा। भारत में उन्होंने कुछ छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को साथ लेकर ‘नया थियेटर’ की स्थापना की थी। नाटक में उन्होंने कई प्रयोग किए। लोकनृत्य को थियेटर से जोड़कर थियेटर को एक नया रूप दिया।

1954 में दिल्ली हबीब तनवीर दिल्ली चले आए। यहां वे हिंदुस्तानी थियेटर से जुड़े। जो कुदसिया जैदी का था। यहां वे बच्चों के लिए नाटक करते थे। यहीं उनकी मुलाकात अभिनेत्री और निर्देशिका मोनिका मिश्रा से हुई जिनसे बाद में उन्होंने शादी की। इसके बाद हबीब उन्होंने ब्रिटेन के रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामाटिक आर्ट में दो सालों तक थियेटर सीखा। यहां यूरोप में एक साल तक भटकते रहे, खूब नाटक देखे, पैसे कमाने के लिए अंगूर बेचे, सर्कस और रेडियो में काम किया और नाइटक्लब में गाया भी।

ऐसा था शुरुआती जीवन
1 सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब तनवीर का पूरा नाम हबीब अहमद खान था। पिता पेशावर से थे और मां रायपुर की रहने वाली। बचपन में उनका सपना था कि वे सिविल सेवा में जाएंगे, लेकिन बाद में लगा कि साइंस लेना चाहिए। रायपुर में स्कूली एज्युकेशन के बाद वे नागपुर चले आए। यहां उन्होंने मॉरिस कॉलेज से पढ़ाई की। इसके बाद उर्दू में एमए करने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय चले गए। इसी दौरान वे कविताएं लिखने लगे। कविताओं को ऐसा बुखार चढ़ा कि नाम के साथ तखल्लुस जोड़ लिया तनवीर। इस तरह वे हबीब अहमद खान से हबीब तनवीर हो गए। बाद में उन्होंने बतौर पत्रकार ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। करीब नौ फिल्मों में स्क्रिप्ट लिखी और फिल्मों में अभिनय भी किया।

चरणदास चोर से किए जाते हैं याद
हबीब तनवीर अपने बहुचर्चित नाटक ‘चरणदास चोर’ और ‘आगरा बाज़ार’ के लिए हमेशा याद किए जाते हैं। चरणदास चोर 1982 में एडिनबरा इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में सम्मानित होने वाला पहला भारतीय नाटक था। सरकार ने उन्हें दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण और फ्रांस सरकार ने अपने प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स’ से सम्मानित किया था। उन्हें कालिदास राष्ट्रीय सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नेशनल रिसर्च प्रोफेसरशिप भी मिले हैं।

सिगार पीने के अंदाज से थे मशहूर
नाटक और थियेटर का पर्याय बन चुके हबीब तनवीर अपनी आवाज और सिगार पीने के अंदाज के लिए भी मशहूर थे। वे अपनी आत्मकथा भी लिख रहे थे, लेकिन इसके पहले ही उनका निधन हो गया। 8 जून 2009 को उन्होंने आखिरी सांस ली।

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