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बैदापोसी से दिल्ली तक के संघर्ष गाथा की नायिका : द्रौपदी मुर्मू

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डॉ. सौरभ मालवीय

-डॉ. सौरभ मालवीय
आदिवासी समाज से संबंध रखने वाली द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से समाज में नई शक्ति का संचार होगा। समाज के सभी वर्ग में भी एक नया उत्साह उत्पन्न होगा। उनमें यह संदेश जाएगा कि इस देश का कोई भी व्यक्ति अपने परिश्रम एवं लगन के बल पर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है। द्रौपदी मुर्मू स्वयं कहती हैं, “मैंने अपने अब तक के जीवन में जन-सेवा में ही जीवन की सार्थकता को अनुभव किया है। जगन्नाथ क्षेत्र के एक प्रख्यात कवि भीम भोई जी की कविता की एक पंक्ति है- ‘मो जीवन पछे नर्के पड़ी थाउ, जगत उद्धार हेउ’ अर्थात अपने जीवन के हित-अहित से बड़ा जगत कल्याण के लिए कार्य करना होता है।

यह मेरे लिए संतोष की बात है जो सदियों से वंचित रहे, विकास के लाभ से दूर रहे, वे गरीब, दलित, पिछड़े तथा आदिवासी मुझमें अपना प्रतिबिम्ब देख सकते हैं। मेरे इस निर्वाचन में देश के गरीबों का आशीर्वाद सम्मिलित है। देश की करोड़ों गरीब महिलाओं और बेटियों के सपनों एवं सामर्थ्य की झलक है।

मैंने देश के युवाओं के उत्साह और आत्मबल को करीब से देखा है। हम सभी के श्रद्धेय अटल जी कहा करते थे कि देश के युवा जब आगे बढ़ते हैं तो वे केवल अपना ही भाग्य नहीं बनाते, अपितु देश का भी भाग्य बनाते हैं। आज हम इसे सच होते देख रहे हैं। मैं चाहती हूं कि हमारी सभी बहनें एवं बेटियां अधिक से अधिक सशक्त हों तथा वे देश के हर क्षेत्र में अपना योगदान बढ़ाती रहें।

देश की 15वीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा है। ओडिशा के रायरंगपुर से राजधानी दिल्ली के राष्ट्रपति भवन तक की उनकी यात्रा अत्यंत कठिन रही है। इस यात्रा में उन्हें अनेक संकटों का सामना करना पड़ा, किन्तु उन्होंने पराजय स्वीकार नहीं की तथा अपनी यात्रा को जारी रखा. परिणाम स्वरूप वह देश की राष्ट्रपति चुनी गईं। इससे पूर्व वह झारखंड की प्रथम आदिवासी एवं महिला राज्यपाल रह चुकी हैं। उन्होंने भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया है। साथ ही वह भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी रहीं हैं।

द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून, 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के बैदापोसी ग्राम में एक संथाल परिवार में हुआ था। उनके पिता बिरंचि नारायण टुडु किसान थे। उन्होंने अपने गृह जनपद से आरंभिक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने भुवनेश्वर के रामादेवी महिला महाविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपने गांव की प्रथम लड़की थीं, जिसने स्नातक की शिक्षा पाप्त की थी। शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात उन्होंने अध्यापिका के रूप में अपना व्यावसायिक जीवन आरंभ किया। इसके पश्चात उन्होंने सिंचाई तथा बिजली विभाग में कनिष्ठ सहायक के रूप में भी कार्य किया। इसके पश्चात उन्होंने मानद सहायक शिक्षक के रूप में भी कार्य किया।

उन्होंने अपने बचपन में निर्धनता और अभावों का सामना किया था। उन्होंने अपने समाज के लोगों की दयनीय स्थिति देखी थी। वे अपने समाज एवं देश के लिए कुछ करना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने राजनीति में आने का निर्णय लिया। उनका विचार था कि राजनीति के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने के पश्चात वह अपने समाज के लोगों के लिए कुछ कर पाएंगी। उन्होंने वर्ष 1997 में रायरांगपुर में पार्षद का चुनाव लड़ा और विजय प्राप्त की। इसके पचात वह जिला परिषद की उपाध्यक्ष भी चुनी गईं।
उन्होंने वर्ष 2000 में विधानसभा चुनाव लड़ा तथा इसमें भी उन्हें विजय प्राप्त हुई। रायरांगपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जाने के पश्चात उन्हें बीजद एवं भाजपा गठबंधन वाली नवीन पटनायक की सरकार में स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बनाया गया। तत्पश्तात वर्ष 2002 में उन्हें ओडिशा सरकार में मत्स्य एवं पशुपालन विभाग का राज्यमंत्री बनाया गया। वर्ष 2006 में उन्हें भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष मनोनीत किया गया। वर्ष 2009 में उन्होंने रायरांगपुर विधानसभा क्षेत्र से दूसरी बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा तथा इस बार भी उन्हें विजय प्राप्त हुई। ओडिशा विधानसभा ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए नीलकंठ पुरस्कार से सम्मानित किया था। उन्होंने वर्ष 2009 में लोकसभा का चुनाव लड़ा, परन्तु दुर्भाग्वश उनकी पराजय हुई। फिर 18 मई, 2015 को उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया।
द्रौपदी मुर्मू का विवाह श्याम चरण मुर्मू से हुआ। महाविद्यालय की पढ़ाई के दौरान उनकी भेंट श्याम चरण मुर्मू से हुई थी। उनकी यह भेंट मित्रता में परिवर्तित हो गई. फिर वह प्रेम में बदल गई। श्याम चरण मुर्मू ने विवाह का प्रस्ताव रखा, परन्तु द्रौपदी के परिवार के लोगों ने विवाह से मना कर दिया। किन्तु उन्होंने पराजय नहीं मानी। अंतत: कुछ समय पश्चात दोनों के परिवार के लोगों ने विवाह के लिए स्वीकृति दे दी। इस प्रकार वे विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए। द्रौपदी मुर्मू का जीवन ठीकठाक चल रहा था, किन्तु ऐसा समय भी आया जब उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। वर्ष 2009 में उनके बड़े पुत्र की एक सड़क  दुर्घटना में मृत्यु हो गई। वह अपने युवा पुत्र की मृत्यु के दुख उबर भी नहीं पाई थीं कि इसके पश्चात वर्ष 2013 में उनके दूसरे पुत्र की भी मृत्यु हो गई। इसके अगले ही वर्ष 2014 में उनके पति की भी मृत्यु हो गई। दो युवा पुत्रों और पति की मृत्यु से वह टूट गईं। इस दुख से उबरने के लिए उन्होंने मेडिटेशन का सहारा लिया। लंबे समय के पश्चात उनकी मनोस्थिति कुछ ठीक हुई।
द्रौपदी मुर्मू ने अपने दुख भूलकर अपना कार्य फिर से आरंभ कर दिया। एनडीए ने उन्हें राष्ट्रपति चुनाव के लिए खड़ा किया। उन्होंने विपक्ष के प्रत्याशी यशवंत सिन्हा को पराजित कर विजय प्राप्त की। इस प्रकार वह राष्ट्रपति चुनी गईं। वह देश की द्वितीय महिला राष्ट्रपति हैं तथा स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाली प्रथम राष्ट्रपति हैं। 
अपने शपथ ग्रहण के पश्चात समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने स्वयं को संथाली एवं आदिवासी बताते हुए जलाशयों एवं वनों के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “मेरा जन्म तो उस जनजातीय परंपरा में हुआ है, जिसने हजारों वर्षों से प्रकृति के साथ ताल-मेल बनाकर जीवन को आगे बढ़ाया है। मैंने जंगल और जलाशयों के महत्व को अपने जीवन में महसूस किया है। हम प्रकृति से जरूरी संसाधन लेते हैं और उतनी ही श्रद्धा से प्रकृति की सेवा भी करते हैं।“
आशा है कि आदिवासी समाज से राष्ट्रपति बनने के पश्चात देश में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर अब और अधिक बल दिया जाएगा तथा महिलाओं की स्थिति में सुधार की दिशा में किए जाने वाले कार्यों की गति भी तीव्र होगी।    
(लेखक- मीडिया शिक्षक एवं राजनीतिक विश्लेषक है)

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