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भारतीय छात्रों के लिए दरवाजे खोलता जर्मनी

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अनवर जमाल अशरफ

विदेशों में पढ़ाई की ख्वाहिश रखने वालों के लिए सबसे बड़ी चुनौती पैसे की कमी होती है, लेकिन अगर किसी देश में मुफ्त पढ़ाई हो, तो यह छात्रों के लिए खुशखबरी से कम नहीं। यूरोप में भारतीय छात्र सबसे ज्यादा ब्रिटेन जाना पसंद करते हैं लेकिन जर्मनी जल्दी ही उसे पीछे छोड़ने वाला है। और इसकी सबसे बड़ी वजह जर्मन यूनिवर्सिटी‍यों में मुफ्त पढ़ाई का नियम है।
 
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा पर नजर रखने वाले भारतीय संगठन एमएम एडवाइजरी के ताजा सर्वे में बताया गया है कि पिछले साल जर्मनी में करीब सवा तीन लाख छात्र पढ़ने आए, जबकि ब्रिटेन में लगभग साढ़े चार लाख। यह अनुपात तेजी से बदल रहा है और जहां तक भारतीय छात्रों की बात है, तो जर्मनी जाने वालों की संख्या में जबरदस्त तेजी आई है, जबकि ब्रिटेन में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या पिछले साल लगभग 10 फीसदी घट गई है। 
 
भारत से लगभग दो लाख छात्र हर साल विदेशों में पढ़ने जाते हैं, जिनका लक्ष्य इंग्लिश बोलने वाले विकसित देश यानी अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड होता है। एक लाख यानी लगभग आधे छात्र अमेरिका जाना चाहते हैं, जबकि 38000 छात्रों के साथ ग्रेट ब्रिटेन दूसरे नंबर पर है और फिर ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा का नंबर आता है। जर्मनी में बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था होने के बाद भी यह भारतीयों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता था क्योंकि जर्मन एक मुश्किल भाषा है और यहां पढ़ाई करने के लिए जर्मन आना लाजमी समझा जाता था, पर हाल के दिनों में यह मिथक टूटा है और जर्मनी ने विदेशी छात्रों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं।
 
पढ़ाई पर खर्च : समझा जाता है कि विदेशों में पढ़ाई के लिए मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। ज्यादातर देशों के मामले में यह बात सही भी है। अमेरिका में औसत सालाना फीस लगभग 30000 डॉलर (20 लाख रुपए) है, जबकि ब्रिटेन में पिछली सरकार ने विश्वविद्यालयों की सालाना फीस 9000 पाउंड (लगभग नौ लाख रुपए) तय कर दी थी। इससे उलट जर्मनी के सभी 16 प्रांतों ने सरकारी विश्वविद्यालयों की फीस खत्म कर दी है। अब यहां मुफ्त पढ़ाई की जा सकती है। हालांकि जर्मनी में प्राइवेट विश्वविद्यालय भी हैं और उनकी औसत फीस 15000-20000 यूरो (12-15 लाख रुपए) है। लेकिन छात्र आमतौर पर सरकारी यूनिवर्सिटीयों में पढ़ाई करना चाहते हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय मान्यता है और जिन्होंने अर्से से अपनी साख बना रखी है। पहले मुफ्त पढ़ाई की सुविधा सिर्फ जर्मन और यूरोपीय संघ के छात्रों को थी, जो अब विदेशी सहित सभी छात्रों के लिए कर दी गई है।
 
विषय और स्कॉलरशिप : जर्मनी अपनी तकनीकी दक्षता, मशीनरी रिसर्च और कार टेक्नोलॉजी के लिए जाना जाता है। इस वजह से यह इंजीनियरिंग के छात्रों और रिसर्च स्कॉलरों की पहली पसंद है। लेकिन वास्तव में यहां बायो टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट, इतिहास और अर्थशास्त्र की भी विश्वस्तरीय पढ़ाई होती है। यहां के बर्लिन, लाइपजिश, म्यूनिख और आखेन जैसे कुछ विश्वविद्यालय दुनियाभर में अव्वल माने जाते हैं। भारत से जर्मनी आने की इच्छा रखने वाले छात्रों को जर्मन एक्सचेंज एजुकेशन प्रोग्राम यानी डाड की वेबसाइट (daad.de) पर नजर रखनी चाहिए। डाड हर साल अलग-अलग विषयों में भारतीय छात्रों को जर्मनी में रिसर्च और पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप देता है। यूरोपीय संघ की संस्था एरासमुस (ec.europa.eu) पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा स्कॉलरशिप देने वाली संस्था है, जो जर्मनी में पढ़ाई के लिए भी छात्रवृत्ति देती है। वैसे अलग-अलग विषयों में मिलने वाली स्कॉलरशिप के बारे में इस लिंक (http://goo.gl/JHs137) से ज्यादा जानकारी मिल सकती है।
 
रहने का खर्च : स्कॉलरशिप न मिले, तो भी कम पैसों में जर्मनी में पढ़ाई संभव है। दाखिला लेने के लिए यहां की यूनिवर्सिटीयों में सीधे संपर्क किया जा सकता है। ज्यादातर यूनिवर्सिटी की वेबसाइट इंग्लिश में उपलब्ध है। छात्रों के लिए जर्मनी में सबसे बड़ा खर्च मकान का किराया होता है। डाड ने जर्मन छात्रों के लिए औसत खर्च का अनुमान लगाया है, जिसके मुताबिक म्यूनिख जैसे दक्षिणी शहरों में कम से कम 350 यूरो (27000 रुपए) प्रतिमाह से कम किराए पर एक कमरे का मकान नहीं मिल सकता है, लेकिन अगर स्टूडेंट हॉस्टल (प्राइवेट) का विकल्प देखा जाए, तो यह लगभग 240 यूरो (19000 रुपए) में मिल सकता है।
 
डाड ने अपने पास उपलब्ध डाटा के अनुसार बताया है कि जर्मनी में छात्रों को खाने-पीने के लिए हर महीने 165 यूरो, कपड़ों के लिए 52 यूरो, ट्रांसपोर्ट के लिए 82 यूरो, टेलीफोन और इंटरनेट के लिए 33 यूरो, पढ़ाई से जुड़ी सामग्री के लिए 30 यूरो और दूसरे खर्चों के लिए 68 यूरो की जरूरत पड़ती है। ट्यूशन फीस मुफ्त है यानी महीने में 670 यूरो (54000 रुपए) में छात्र आराम से रह सकते हैं। जर्मनी में स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य है, जो इस खर्च में नहीं जुड़ा है। छात्रों का स्वास्थ्य बीमा लगभग 90 यूरो प्रतिमाह में हो सकता है। दूसरी ओर ब्रिटेन में छात्रों का औसत खर्च 2000 पाउंड (दो लाख रुपए) प्रतिमाह बताया जाता है।
 
जर्मनी में छात्र आमतौर पर अपने खर्च का बहुत बड़ा हिस्सा खुद ही कमा लेते हैं। यहां पढ़ाई के साथ काम करने की इजाजत है और छात्र हर साल 120 दिन काम कर सकते हैं। उन्हें हफ्ते में 20 घंटे काम की इजाजत है। आमतौर पर वे शाम को रेस्त्रां या दुकानों में तीन-चार घंटे काम कर लेते हैं। जर्मनी में न्यूनतम तनख्वाह साढ़े आठ यूरो प्रति घंटा है और इस तरह से उनके पास अपना खर्च चलाने के लिए पर्याप्त पैसे जमा हो जाते हैं।
 
भाषा की समस्या : जर्मन दुनिया की सबसे मुश्किल भाषाओं में गिना जाता है। हालांकि अब कई यूनिवर्सिटी अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई करा रही हैं, लेकिन जर्मनी में रहने और यहां काम करने के लिए जर्मन भाषा की बुनियादी जानकारी होना बेहतर है। यहां लगभग सभी शहरों में जर्मन भाषा सीखने की सुविधा होती है। अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर सर्वे करने वाली संस्था एमएम एडवाइजरी की एमएम मथाई ने यूनिवर्सिटी वर्ल्डन्यूज से कहा, जर्मनी विदेशी छात्रों को जो पैकेज दे रहा है, वह इतना आकर्षक है कि छात्र जर्मन भाषा की बाधा को पार करने के लिए तैयार हो रहे हैं। जर्मनी यूरोप में सबसे आगे के देशों में गिना जाता है और तकनीकी तौर पर बेहद सशक्त देश है। फिलहाल भारत के करीब 12000 छात्र जर्मनी में पढ़ते हैं।
 
इमिग्रेशन पॉलिसी : अमेरिका या ब्रिटेन के मुकाबले जर्मनी में इमिग्रेशन पॉलिसी आसान है। ब्रिटेन की एक मुश्किल यह है कि वहां छात्र वीजा पर रहने वाले लोग काम नहीं कर सकते। अगर पढ़ाई के बाद ब्रिटेन में गैर यूरोपीय संघ के देशों के छात्रों को काम मिल भी जाता है तो उन्हें पहले अपने देश लौटना पड़ता है और वहां से वर्क वीजा लेकर आना पड़ता है। पहले ऐसा नहीं था। ब्रिटेन ने यह नियम वीजा फ्रॉड को रोकने के लिए बनाया है, लेकिन इससे वहां छात्रों की संख्या कम हो रही है। जर्मनी में यह बंदिश नहीं है। यहां पढ़ाई के दौरान काम को प्रोत्साहित किया जाता है और कोशिश होती है कि छात्रों को जर्मनी के अंदर नौकरी मिल जाए। पढ़ाई खत्म होने के बाद अगर काम न मिले, तो भी 18 महीने का वर्क सर्च वीजा मिल सकता है। जर्मनी शेंगन क्षेत्र में आता है यानी यहां पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए शेंगन इलाके के दूसरे बड़े देश फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड्स और स्कैंडिनेवियाई देशों के दरवाजे भी खुले रहते हैं, उन्हें वहां भी नौकरी मिल सकती है, जबकि ब्रिटेन इससे बाहर है और वहां के लिए अलग वीजा लेना पड़ता है।

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