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सबको सन्‍मति दे भगवान

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डॉ. नीलम महेंद्र

यह सही है कि लफ्जों में इतनी ताकत होती है कि किसी पुरानी डायरी के पन्नों पर कुछ समय पहले चली हुई कलम आज कोई तूफान लाने की क्षमता रखती है, लेकिन किसी डायरी के खाली पन्ने भी आंधियां ला सकते हैं, ऐसा शायद पहली बार हो रहा है।
 
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के 2017 के वो कैलेंडर और डायरी आज देशभर में चर्चा में हैं, जिनके बारे में तो अधिकतर भारतीयों को शायद इससे पहले पता भी न हो। कारण है गांधीजी की जगह मोदी की तस्वीर। पूरा देश गांधी प्रेम में उबल रहा है कि गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता, केवल चरखे के पीछे बैठकर फोटो खिंचाने से कोई गांधी नहीं बन सकता आदि।
 
सही भी है आखिर गांधीजी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और पूरा देश उनसे बहुत प्यार करता है और उनकी इज्जत करता है। लेकिन गांधीजी को सही मायनों में हममें से कितनों ने समझा है? गांधीजी कहते थे कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। आज जो लोग  गांधीजी के नाम को रो रहे हैं इनमें से कितनों ने अपने भय या असुरक्षा की भावना पर विजय हासिल की है?
 
यह असुरक्षा की भावना नहीं तो क्या है कि एक तरफ आप चिल्ला रहे हैं कि गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता और दूसरी तरफ इसे बेमतलब मुद्दा भी बना रहे हैं! क्योंकि आप केवल इन शब्दों को 'कह' रहे हैं, इनके सहारे जनमानस को बहकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। अगर आप अपने कहे शब्दों को 'समझते' तो इस बात को मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि यह तो अटल सत्य है ही कि गांधीजी की जगह कोई नहीं ले सकता। गांधीजी ही हमारे गांधी हैं और रहेंगे।
 
लेकिन जो असली भावना आपको डरा रही है वो यह है कि आप ही की गलतियों के कारण आज मोदी भी उस मुकाम पर पहुंच गए हैं कि कोई उनकी जगह भी नहीं ले सकता। विपक्ष तो क्या सरकार या फिर खुद उनकी ही पार्टी में भी उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है, कम से कम आज तो नहीं। गांधीजी को आज जो रो रहे हैं और कह रहे हैं कि गांधी को खादी से और खादी को गांधी से कोई अलग नहीं कर सकता उन्होंने इतने साल गांधी के लिए या फिर खादी के लिए क्या किया? दरअसल वो गांधी को नहीं उस नाम को रो रहे हैं जिस नाम को उन्होंने अपने कॉपीराइट से अधिक कभी कुछ नहीं समझा।
 
इतने सालों गांधीजी के लिए कुछ किया गया तो यह कि देशभर में लगभग 64 सरकारी स्कीमें उनके नाम पर खोली गईं, 24 खेलों के टूर्नामेंट और ट्रॉफी उनके नाम पर रखे गए, 15 स्कॉलरशिप उनके नाम पर दी गईं, 19 स्टेडियम उनके नाम पर खोले गए, 39 अस्पतालों का नाम उनके नाम पर रखा गया, 74 बिल्डिंग और सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे गए, 5 एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा गया आदि लिस्ट बहुत लंबी है।
 
इसके अलावा 2 अक्टूबर को बापू की समाधि पर फूल चढ़ाकर उनके प्रिय भजनों का आयोजन और दूरदर्शन पर 'गांधी' फ़िल्म का प्रसारण। बस, कर लिया बापू को याद! क्या यहीं तक सीमित है हमारा 'बापू प्रेम'? हमारे राष्ट्रपिता के प्रति इतनी ही है हमारी भक्ति? क्‍या यही सच्ची श्रद्धा है जिसके हकदार हैं हमारे बापू?
 
तो फिर वो क्या है जब देश का प्रधानमंत्री जिसके नाम के साथ गांधी तो नहीं लगा लेकिन आजादी के 70 साल बाद जब देश की बागडोर अपने हाथों में लेता है तो गांधीजी के सपने को यथार्थ में बदलने के उद्देश्य से 'स्वच्छ भारत' अभियान की शुरुआत करता है और उसका प्रतीक चिन्‍ह गांधीजी के चश्मे को रखता है?
 
वो क्या है जब यही प्रधानमंत्री गांधीजी की 150वीं जयंती के अवसर पर साल 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का बीड़ा उठाता है? यहां इस प्रश्न पर तो बात ही नहीं की जा रही कि इतने सालों जिस 'गांधीवादी' पार्टी का शासन था, उसने इस दिशा में क्या कदम उठाए या फिर आजादी के इतने सालों बाद भी किसी प्रधानमंत्री को इस मूलभूत स्तर पर काम क्यों करना पड़ रहा है।
 
वो क्या है जब प्रधानमंत्री 'मन की बात' में देशवासियों से 'गांधी की खादी' अपनाने का आह्वान करते हैं तो खादी की बिक्री में 125% की बढोतरी दर्ज होती है (इंडिया टुडे की रिपोर्ट)। वो क्या है, जब मोदी नारा देते हैं, 'खादी फॉर नेशन, खादी फॉर फैशन'। वो क्या है जब प्रधानमंत्री खादी के उन्नयन के लिए पंजाब में 500 महिलाओं को चरखा बांटने वाले आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं? गांधीजी अपने बाथरूम की सफाई खुद ही करते थे तो आज जो गांधी के नाम पर विलाप कर रहे हैं उनमें से कितने उनका अनुसरण करते हैं?
 
और वो क्या है, जब इस देश का प्रधानमंत्री उनका अनुसरण करते हुए न सिर्फ खुद हाथ में झाड़ू पकड़कर सफाई अभियान की शुरुआत करते हैं, बल्कि पूरे देश को प्रेरित करते हैं? लेकिन यह अजीब सी बात है कि जब प्रधानमंत्री के हाथों में झाड़ू होता है तो कोई सवाल नहीं करता, लेकिन उन्हीं हाथों में चरखा आ जाता है तो मुद्दा बन जाता है? आपको इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता कि खादी की बिक्री जो कि कांग्रेस के शासनकाल के 50 सालों में 2 से 7% थी, पिछले दो वर्षों में बढ़कर 34% तक पहुंच गई। 
 
आपको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले भी 6 बार जब बापू इस कैलेंडर में नहीं थे, वो भी आप ही के शासनकाल में 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 में तब आपने इसे मुद्दा नहीं बनाया था तो आपके लिए गांधीजी की ही प्रिय प्रार्थना 'आप सबको सन्‍मति दे भगवान'। गांधीजी केवल चरखा और खादी तक सीमित नहीं हैं, वो एक विचारधारा हैं, जीवन जीने की शैली हैं नैतिकता, सच्चाई, दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के साथ-साथ अहिंसा के प्रतीक हैं। वे व्यक्ति नहीं अपने आप में एक संस्था हैं। 
 
इससे बड़ी बात क्या होगी कि वे केवल भारत में नहीं, अपितु पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाते हैं। जब भारत के गांधी पर अमेरिका के जान ब्रिले फिल्म लिखते हैं और रिचर्ड एटनबोरो निर्देशित करते हैं तो वे गांधी को हमसे छीनते नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व को उनके व्यक्तित्व एवं विचारधारा से अवगत कराते हैं, उनकी सीमाएं भारत को लांघ जाती हैं।
 
तो जो लोग आज कैलेंडर की तस्वीर पर बवाल मचा रहे हैं, वे अपनी असुरक्षा की भावना से बाहर निकलकर समझें कि गांधीजी इतने छोटे नहीं कि किसी तस्वीर के पीछे छिपाए जाएं।

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