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राहुल गांधी में बदलाव की संभावना नहीं

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हमें फॉलो करें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का फोटो
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अवधेश कुमार

, मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026 (15:26 IST)
लोकसभा अध्यक्ष कह रहे हैं प्रधानमंत्री को घेरने वाले थे 
 
शीर्ष स्तर की राजनीति में इस स्तर का टकराव, जिसमें बीच कोई रास्ता नहीं, हर दृष्टि से चिंताजनक है। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नहीं बोल पाएं यह सामान्य स्थिति नहीं थी। 

इसमें भी जिन कारणों से वे नहीं बोल पाए वह डर पैदा करने वाला है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आसन से कह रहे थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि सदन में न आएं क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है। इसके पहले लोकसभा या राज्यसभा में यह स्थिति कभी देखी नहीं गई। शायद इसकी कल्पना भी नहीं रही होगी। 
 
विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के भाषण में बाधा डालना, बहिर्गमन करना, यहां तक कि बेल में आकर हंगामा करना, संसद की कार्यवाही बाधित करना आदि दृश्य हम सबने देखा है। कांग्रेस के 7-8 महिला सांसदों का प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच कर घेरा जैसी स्थिति बनाना बिल्कुल असामान्य स्थिति थी। हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री के आने पर वहां क्या दृश्य उत्पन्न होता! 
 
कांग्रेस ने घोषणा की थी कि अगर विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं बोल पाएं तो प्रधानमंत्री को भी नहीं बोलते देंगे। तो क्या महिला सांसद उनके आसन तक जबरन रोकने गए थे? संसद के नेता को रोका जाएगा तो स्वाभाविक है पार्टी और गठबंधन के सांसद वहां प्रतिरोध करने आएंगे। उसमें संसद का दृश्य क्या होता इसकी कल्पना से भय पैदा होता है! प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अवश्य भाषण दिया लेकिन लोकसभा में कांग्रेस अपने रवैये पर कायम है।
 
संसद में अनेक अवसर आए हैं। बोफोर्स भ्रष्टाचार के आरोप में 24 जून, 1989 को लोकसभा में विपक्ष के 110 में से 106 सांसदों ने त्यागपत्र दे दिया था। लंबे समय तक इसके विरुद्ध संसद के दोनों सदनों में विरोध हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में अभियान चल रहे थे किंतु हमारे माननीय सांसद इतने विवेकशील थे कि कभी सदन में सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। 
 
महिला आरक्षण विधेयक के तीखे विरोध में विधेयक की कॉपी छीनकर अवश्य फाड़ी गई लेकिन इससे आगे लोकसभा अध्यक्ष या आसन को अपमानित करने या चिढ़ाने की स्थिति कभी नहीं थी। यूपीए सरकार के कार्यकाल में कॉमनवेल्थ, 2जी सभी मामलों पर हंगामा हुआ, कार्यवाही बाधित हुई, लेकिन सांसद प्रधानमंत्री की सीट को उनके आने के पहले से घेर लें या महिला सांसदों का इसके लिए उपयोग किया जाए यह अवस्था कभी नहीं आई। 
 
जब 2014 में संसद के दोनों सदनों में आंध्रप्रदेश के विभाजन और तेलंगाना राज्य के निर्माण का विधेयक पारित करना था तो भी समस्या आई थी। 14 फरवरी को लोकसभा में विधेयक पारित होने के दिन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बोलते समय ऐसी स्थिति पैदा हुई कि लोकसभा टीवी का प्रसारण रोकना पड़ा। हाथापाई और गाली गलौज की नौबत तक स्थिति पहुंची थी। 20 फरवरी 2014 को राज्यसभा में विधेयक पारित करने के लिए सारे दरवाजे बंद कर मार्शल को बुलाना पड़ा था। 
 
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बोलते समय विधायक छीनो विधायक फाड़ो जोर-जोर से चिल्ला रहे थे और तृणमूल सांसद सुखेन्दु राय ने प्रधानमंत्री के बोलते समय कागजात फाड़ दिए। उसके बाद फिर सभापति को कठोर निर्णय लेना पड़ा। संसद के अंदर कई सांसद हेलमेट पहन कर आने लगे थे।

कई सांसद ने आरोप लगाया कि उनके साथी गाली दे रहे हैं और धमका रहे। एक सांसद ने मिर्च का स्प्रे भी छोड़ा लेकिन सदन के बाहर। किसी स्थिति में प्रधानमंत्री की सीट को पहले से घेर लिया जाए ऐसी घटना नहीं हुई।
 
देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2016-17 से स्थिति ज्यादा बिगड़ी है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अध्यक्ष और सभापति के आसन की ओर कागज फेंकना, आगे टेबल पर खड़ा होकर मिमिक्री करना आदि संसदीय परंपरा के विपरीत व्यवहार सतत रूप में देखा गया है।

वर्तमान लोकसभा में पहले दिन से विपक्ष के नेता राहुल गांधी का तय होता है कि यही बोलना है, सदन में क्या विषय  है इससे उनका मतलब नहीं रहता। राष्ट्रपति अभिभाषण पर कई विषयों में सरकार की आलोचना हो सकती है, घेरा जा सकता है। लेकिन उनका विषय पूर्व थल सेना अध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक थी जिसके बारे में अध्यक्ष ने एक नियमन दे दिया। 
 
पिछले कुछ वर्षों में संसद सत्र के आरंभ होने के पूर्व विदेश से कोई रिपोर्ट आ जाती है और हंगामा हो जाता है। पीगैसस, हिंडेनबर्ग रिपोर्ट से लेकर गुजरात दंगे पर बीबीसी डॉक्युमेंट्री आदि की एक लंबी कड़ी है। अंततः इसके परिणाम शून्य आते हैं। ज्यादातर मामले उच्चतम न्यायालय में गए और विपक्ष को कोई लाभ नहीं हुआ। इस बार विदेश में बैठे एक व्यक्ति की एक पत्रिका में प्रकाशित आलेख को राहुल गांधी ने आधार बनाया। 
 
हालांकि उसे लेख में ऐसा नहीं है कि जिससे लगे कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020 में गलवान घटना के बाद चीन के विरुद्ध कार्रवाई में सेना के हाथ बांध दिए थे। इसलिए कुछ लोगों की टिप्पणी है कि उन्हें बोलने दिया जाता तो कोई अंतर नहीं आता।

यह विषय विस्तार से चर्चा की है जो यहां संभव नहीं। इतना ध्यान रखना चाहिए कि चीन के साथ 1962 के बाद केवल 1967 में सीमा पर गोली चली उसके बाद कभी नहीं। गलवान संघर्ष में भी गोली नहीं चली थी। पूरा  गुत्थम-गुत्था लाठी, डंडे , पत्थर, रड , कंटीले ताड़ आदि से हुआ था। 
 
मुख्य बात यह है कि संसद में हमारा आचरण कैसा हो? संसद के बाहर भी हम धरना-प्रदर्शन देते,मार्च करते हैं तो पुलिस प्रशासन की निश्चित जगह तक अनुभूति होती है। वहां तक जाने के बाद हम रुक जाते हैं या निर्धारित धरना स्थल पर धरना देते हैं।

उसका उल्लंघन करते हैं तो पुलिस हमें हिरासत में लेती है या  गिरफ्तार करती है। यानी सड़क पर विरोध के भी नियम हैं। संसद को सड़क के आंदोलन से भी बुरी अवस्था में पहुंचा दिया जाए जहां अध्यक्ष के नियमन का कोई मूल्य न रहे इससे ज्यादा भयावह स्थिति कुछ नहीं हो सकती। 
 
यह भी नहीं कह सकते कि सब कुछ अनायास हो रहा है। राहुल गांधी इस समय लोकसभा में देश के सबसे बड़े नेता हैं। सबसे ज्यादा सांसद उनके हैं। तीन राज्यों में उनकी अपनी सरकार है तथा तमिलनाडु की सत्ता में उनकी भागीदारी है।

इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बाद किसी भी पार्टी से उनकी हैसियत बड़ी है। ऐसा नेता बगैर सोचे - समझे और रणनीति के इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकता। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आई तो संविधान समाप्त कर देगी, आरक्षण हटा देगी जैसे दुष्प्रचार का कुछ हद तक राजनीतिक लाभ कांग्रेस एवं विपक्ष को मिला। 
 
क्या यह रणनीति है कि कुछ दूसरे मुद्दे उठाकर उसको और आगे ले जाया जाए? नेपाल और बांग्लादेश में जेन जी के नाम से हिंसक और उग्र आंदोलन से उथल-पुथल का दृश्य हमारे सामने है। राहुल गांधी देश के संविधान व लोकतंत्र को बचाने के लिए जेन जी से हम आपके साथ हैं की घोषणा से कि पहले ही अपील कर चुके हैं।

संसद के दोनों सदनों के आसनों को भी वे और उनकी पार्टी पक्षपाती करार दे रही है। कभी बोलते समय मेरा माइक बंद कर दिया जाता है, मुझे बोलते नहीं दिया जाता है जैसी अकल्पनीय स्थिति उनके सामान्य वक्तव्य हो चुके हैं। उच्चतम न्यायालय के कुछ फैसलों और टिप्पणियों के विरुद्ध सार्वजनिक वक्तव्य भी हम देख रहे हैं। 
 
चुनाव आयोग को भाजपा का एजेंट बताया ही जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की मुख्य यूएसपी रक्षा और सुरक्षा है। तो क्या इसी मुद्दे पर उसे कमजोर और झूठा साबित करने की रणनीति है? ये सारी संभावनाएं इसलिए सशक्त लगतीं हैं क्योंकि बयानों और व्यवहारों का पैटर्न इसके अनुरूप दिखाई देता है।

इस लोकसभा की शुरुआत के दिन से राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दों पर उन्होंने कभी नहीं बोला। उनका अपना विषय होता है और अध्यक्ष के रोकने पर उनकी प्रतिक्रिया ऐसी होती है कि हमें बोलते नहीं दिया जाता।
 
स्पष्ट है कि इसमें बदलाव की तत्काल संभावना नहीं। इस प्रश्न का किसी के पास उत्तर नहीं किया कहां जाकर समाप्त होगा। इसका हल ढूंढना ही होगा। राजनीति इस अवस्था में कतई नहीं जानी चाहिए जहां वापस लौटने की स्थिति न रहे।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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