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पुलिस का मनोबल गिराने वाली सूची में इजाफा

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- विवेक त्रिपाठी
 
मथुरा के जवाहर बाग में दो पुलिस अधिकारियों की शहादत ने व्यवस्था से जुड़ी बहस को नए सिरे से तेज किया है। इस बात का अंदाजा शायद ही प्रदेश सरकार को है। जब से सरकार प्रदेश में आई, आए दिन ऐसी घटनाएं होती हैं जिसमें पुलिस का कोई न कोई जवान या तो मारा जा रहा है या फिर परेशान किया जा रहा है। ऐसी हरकतों से पुलिस बल अपनी हिफाजत को लेकर चिंतित रहता है।
ताजा आंकड़ों से जाहिर है कि पुलिस लगातार प्रताड़ित हो रही है। शायद इसलिए असामाजिक तत्वों में शासन का भय भी कम होता जा रहा है। इसके अलावा सत्ता के संरक्षण में पुलिस का एक वर्ग जनता के बीच में तानाशाही रवैये का इस्तेमाल करता है। यह सब सोचनीय है। 
 
बीते 4 साल में पुलिस के ऊपर लगभग 1,100 से ज्यादा हमले हो चुके हैं। इनमें भी ज्यादातर हमलों में पुलिस वालों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। कुछ नेता तो अपने चहेतों को छुड़ाने के लिए थानों में भी घुसकर हमले कर चुके हैं। फिर भी प्रदेश सरकार ने उसे हलके में लिया है। 
 
अभी हाल की रिपोर्ट में छपे आंकड़ों में जाएं तो 15 जून 2012 को उत्तरप्रदेश के बरेली जिले में इलाहाबाद-हरिद्वार एक्सप्रेस में 15-20 अज्ञात लोगों ने सिपाही राम निरंजन सिंह की सरेआम सीने में 315 बोर की गोली मारकर हत्या कर दी थी। 
 
इसी प्रकार 3 मार्च 2013 को कुंडा क्षेत्र में दो गुटों के बीच हुई गोलीबारी की घटना में गांव के प्रधान सहित 2 लोगों की मौत हो गई। इस घटना को नियंत्रित करने गए कुंडा सीओ जियाउल हक भी शहीद हो गए और उसी 3 मार्च को बरेली जिले में बदमाशों ने पुलिस टीम पर उस दौरान हमला किया, जब टीम बरेली के बभिया गांव में हिस्ट्रीशीटर जगपाल को पकड़ने गई थी। जगपाल को गिरफ्तार करके पुलिस ला रही थी तभी 15-20 लोगों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया जिसमें सिपाही प्रदीप कुमार की गोली लगने से मौत हो गई। 
 
16 जून 2014 में फिरोजाबाद जिले के रामगढ़ थाना क्षेत्र में सिपाही प्रताप सिंह और गिरिराज किशोर गुर्जर की बदमाशों ने गोलियां मारकर हत्या कर दी थी। 20 नवंबर 2015 को यूपी के प्रतापगढ़ जिले में बदमाशों ने इंस्पेक्टर अनिल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी। उन्होंने अपनी जान का खतरा होने की आशंका भी जताई थी लेकिन उन्हें साजिश के तहत निलंबित किया गया था। इस मामले में पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर की मौत को हादसा बता रहे थे। उनके परिवार वालों ने सीबीआई जांच की मांग की है।
 
25 नवंबर 2015 को गाजियाबाद जिले में बंथला चौकी में पानी लेने के लिए घुसे नशे में धुत बदमाशों ने मैनपुरी जिले में रहने वाले सिपाही सुदेश को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था। 25 नवंबर 2015 को ही राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर इलाके में बेखौफ बदमाशों ने खुली चुनौती देते हुए सरेराह सिपाही प्रमोद कुमार को गोली मारकर उसकी सरकारी पिस्टल लूट ली। सिपाही हाई कोर्ट के जज की सुरक्षा में तैनात था और ड्यूटी समाप्त होने के बाद घर वापस जा रहा था। 
 
2 अप्रैल 2016 को बिजनौर जिले में दो बदमाशों ने नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) के डिप्टी एसपी तंजील अहमद (45) और उनकी पत्नी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। तंजील अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जब एक संबंधी के विवाह समारोह से लौट रहे थे तब आरोपी उनका पीछा कर रहे थे। इस मामले में तंजील के एक रिश्तेदार के भतीजे रेहान और उसके साथी जैनुल और मुख्य आरोपी मुनीर को गिरफ्तार किया गया था। 
 
2 जून 2016 को मथुरा स्थित जवाहर बाग में पुलिस कब्जा हटवाने गई तो सत्याग्रहियों ने गोरिल्ला स्टाइल में पेड़ों पर चढ़कर पुलिस के ऊपर गोलाबारी, बमबारी और गोलियां दागीं। इस हिंसा के बीच एसपी सिटी मथुरा मुकुल द्विवेदी और थानाध्यक्ष फरह संतोष कुमार शहीद हो गए थे। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में 18 अतिक्रमणकारी मारे गए जबकि 21 पुलिस वाले जख्मी हो गए।
 
ऐसा नहीं है, यह तो महज कुछ ही आंकड़े हैं। जो दिखाता है कि कानून के रखवाले यूपी में सुरक्षित नहीं हैं। 4 साल में सिपाही से लेकर एसपी तक को अपनी जान गंवानी पड़ी है। बदले में उन्हें कुछ मुआवजा देकर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है। एक रिपोर्ट से पता चला है कि उप्र में 2016 में हर 32 घंटे में पुलिस को अपनी जान गंवानी पड़ी है। 
 
हालांकि न्यायालय ने मेजा की पुलिस चौकी में घुसकर अमित मिश्रा की दबंगों द्वारा पिटाई करने पर कड़ा रुख अख्तियार किया था। साथ ही आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने तो यहां तक कहा था कि अपराधी और मफियाओं से राजनीतिक दलों को अलग रहना चाहिए और पुलिस की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से भी बचना चाहिए। 
 
लेकिन ऐसा होता दिखा नहीं। हर दिन कोई न कोई पुलिस को परेशानी वाली घटना सामने नजर आई है। सरकार को इन आकड़ों पर गौर करके इस पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी जिससे ऐसी घटनाओं पर लगाम लग सके। माफियाओं को संरक्षण देना भी नेताओं को बंद करना होगा। अपराधी को जितनी जल्दी सजा मिलेगी उससे समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा। राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते पुलिस का मनोबल काफी गिरा है। 
 
अपराधियों की राजनीतिक पहुंच के चलते पुलिसकर्मियों को निलंबित या स्थानांतरित होने का डर बना रहता है इसलिए वे ज्यादा खुलेपन से काम नहीं ले पाते हैं। सरकार और समाज को पुलिस का सहयोग करना चाहिए। कानून को अपना काम करने में किसी प्रकार बाधा नहीं उत्पन्न होने देना चाहिए। 
 
सरकार को बड़े-बड़े ऑपरेशनों में बड़ी सतर्कता दिखानी चाहिए जिससे कि कोई निर्दोष न मारा जा सके। पुलिस को अपने काम की पूरी आजादी होनी चाहिए जिससे कि वह समाज को भयमुक्त और अपराधमुक्त बना सके। सरकार द्वारा समय-समय पर पुलिस बल को अत्याधुनिक तौर-तरीकों का प्रशिक्षण देते रहना चाहिए जिससे वह हमेशा आगे रहे। 
 
अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल भी किया जाना आवश्यक है। उन्हें समय-समय पर अवकाश भी देना होगा जिससे कि वह आराम करके फिर नए सिरे से काम में लगे, क्योंकि जब तक कानून के रखवाले सुरक्षित नहीं होंगे तो आम आदमी कहां से सुरक्षित होगा। इस पर भी सरकार और समाज को ध्यान देने की जरूरत है।
 
कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखना किसी भी सरकार का पहला और मूलभूत कर्तव्य है। अन्य किसी भी कार्य का नंबर बाद में आता है। कानून व्यवस्था की खराब स्थिति अन्य सभी उपलब्धियों पर पानी फेर देती है। इस बात को समाजवादी पार्टी से बेहतर कोई नहीं जानता होगा। सत्ता में आने के बाद होने वाले प्रत्येक चुनाव में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। सपा प्रमुख मुलायम खुद इस बात को लेकर अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं, लेकिन उनकी हिदायतें बेअसर साबित हुईं। 
 
एक तरफ कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार पुलिस बल खुद ही हमले का शिकार है, एक के बाद एक घटनाएं देखने को मिल रही हैं, दूसरी तरफ आमजन सुरक्षा को लेकर परेशान रहता है। इस व्यवस्था में सुधार हेतु कारगर कदम उठाने होंगे।

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