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संजा पर्व विशेष : चली स्कूल

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संजा
कुछ दिनों पूर्व की बात है। कार्यालय कार्य क्षेत्रीय भ्रमण के दौरान मैं उस ग्रामीण अंचल में थी। मैं स्कूल परिसर के बाहर खड़ी अपने साथियों से चर्चा कर रही थी कि कुछ स्कूली छात्राएं पास से गुजरती हुई मुझे देख रूक गईं। नमस्ते किया। किशोरियों के उत्साहित और ऊर्जावान चेहरे बरबस मुझे उनसे बातचीत करने के लिए उकसाते हैं। नमस्ते का उत्तर देने के साथ ही मैं उनसे स्कूली माहौल के बारे में बात करने लगी। 


बातचीत के दौरान मैंने पूछा,’ पढ़ाई के अलावा और क्या-क्या करती हो ?’
एक बोली, खेलते हैं। और शाम को संजा बनाते हैं। अभी श्राद्ध चल रहे हैं न। प्रसाद बनाते हैं, जिसे सहेलियों को बूझना होता है।’
दूसरी ने कहा, फिर सब मिलकर संजा के गीत गाते हैं। संजा तू थारे घर जा, कि थारी माय मारेगी ....।’
 
उसके गीत को बीच में रोकते हुए मैंने पूछा, - तुम्हें इस गीत का मतलब पता है ? संजा का घर कहां है ? कहां जाएगी वो ? और उसकी मां क्यों मारेगी उसे ? ’
सब लड़कियां एकाएक चुप हो गई। उनके चेहरे पर विस्मय के भाव आ गए। मानो सोच रही हों संजा का घर कहां है और उसकी मां क्यों मारेगी, यह तो कभी सोचा ही नहीं। 
 
चुप्पी तोड़ते हुए एक लड़की बोली, ये गीत तो पुराने समय से गाते आ रहे हैं। सब गाते हैं तो हम भी गाते हैं।
अचानक एक छोटी लड़की बोली, मेडमजी, मैंने एक नया गीत बनाया है संजा का। पर ये सहेलियां उसे गाती ही नहीं।’
उसे शाबासी देते हुए मैंने कहा, अरे वाह ! तुमने गीत बनाया ? गीत बनाना तो बहुत कठिन काम है। चलो, तुम्हारा बनाया गीत जरा सुनाओ तो।’
वह दोनों हाथों से ताली बजाकर पूरी रौ में गाने लगी ,
 
संजा चली इस्कूल...
लगाकर फूल... 
संग हमारे...
कोई संजा की नजर उतारे...
 
वह बच्ची पूरे आत्मविश्वास से गीत गाए जा रही थी। दोनों हाथों से तालियां बजाकर उसे गाते देख मेरी आंखें भीग गई। अन्य सहेलियां उसे देख रही थी और मैं भावविभोर होकर सोच रही थी, इस बदलती बयार को किसी की नजर ना लगे।

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