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नानक ने समझाया 'नाम' का प्रभाव

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गुरू नानक देव
गुरु  नानक अपने एक प्रिय शिष्य के साथ घूमते हुए असम पहुंचे। एक स्थान पर आग की लपटें देख शिष्य ने नानदेव से पूछा, यह अकस्मात आग कैसे लगी है? इसके पूर्व कि नानदेव उत्तर देते, वह बुझ गई। 

शिष्य बोला, अरे यह तो बुझ भी गई। तब नानदेव बोले, बेटा यहां जादू टोना बहुत अधिक है।

क्या जादू-टोने में भी सत्यता होती है? - शिष्य ने प्रश्न किया।

नानदेव बोले, वाहे गुरु के अलावा किसी में भी सत्यता नहीं होती। परमात्मा के सामने जादू-टोने का कोई प्रभाव नहीं होता।

उन्होंने एक स्थान पर डेरा डाला और शिष्य भोजन की व्यवस्था करने समीप के गांव में गया। किंतु वहां के एक जादूगर ने मंत्र से उसे पक्षी बनाकर पिंजरे में बंद कर लिया। शिष्य को न लौटते देख नानक देव ने जान लिया कि उसे पक्षी बना दिया गया है। वे उस जादूगर के द्वार पर पहुंचे और उन्होंने शिष्य का नाम पुकारा।

नाम पुकारते ही पिंजरा टूट गया और शिष्य मनुष्य रूप में सामने आ खड़ा हुआ। यह चमत्कार देख जादूगर नानक देव से बोला, आप जब यहां आए, तभी मैंने आप पर भी मंत्र का प्रयोग किया था, किंतु जब कोई प्रभाव दिखाई नहीं दिया, तभी मैंने जान लिया था कि आप कोई पहुंचे हुए महात्मा हैं।

नानक देव बोले ऐसी बात नहीं है। वास्तव में मेरा देवता तुम्हारे देवता से बड़ा है। तब हमें भी उसका मंत्र बताएं, वह जादूगर बोला।

नानक देव बोले, अच्छा तो यह मंत्र लो, एक ओंकार सतिनाम, कर्तापुरुष निर्भउ अकालु मूरति अजूनी सै भंगुर प्रसादि (उस एक ईश्वर का नाम ही सच्चा है, जो सारे संसार का कर्ता है, निर्भय है, अजर अमर है, अजन्मा है और उसी की कृपा का मैं इच्छुक हूं।) उस जादूगर ने मंत्र का उच्चारण किया और उनका शिष्य हो गया। यही नाम का प्रभाव है।


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