सीबीआई चीफ आलोक वर्मा को इन 5 कारणों ने करवाया बर्खास्‍त...

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019 (22:36 IST)
भ्रष्टाचार और कर्तव्य में लापरवाही बरतने के आरोप में गुरुवार को आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति ने मैराथन बैठक के बाद आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया। हालांकि वर्मा ने इन आरोपों को झूठे, निराधार और फर्जी करार दिया है। आइए, जानते हैं वो पांच प्रमुख कारण जिनके कारण आलोक वर्मा को मिली पद से छुट्टी...


1. सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने कैबिनेट सचिव और केंद्रीय सतर्कता आयोग को पत्र लिखकर सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार और अनियमितता के कम से कम 10 मामलों का जिक्र किया था। अस्‍थाना का आरोप था कि वर्मा ने मीट कारोबारी मोइन कुरैशी से जुड़े मामले की जांच को प्रभावित करने के लिए सतीश बाबू सना से 2 करोड़ रुपए की रिश्वत ली थी।

2. आलोक वर्मा पर यह भी गंभीर आरोप लगाया गया कि उन्‍होंने रेलवे के 2 होटलों का ठेका देने से जुड़े लालू प्रसाद यादव के खिलाफ जांच के मामले में दखल दिया और इस मामले में पुख्ता सबूत होने के बावजूद एक वरिष्ठ अधिकारी को बचाया और जांच में से उनका नाम भी हटा दिया।

3. आलोक वर्मा को पद से बर्खास्‍त करने में एक कारण यह भी रहा कि हरियाणा के एक जमीन घोटाले के मामले में उन पर गंभीर आरोप लगाए गए। इस घोटाले की शुरुआती जांच को बंद करने को सुनिश्चित करने के लिए 36 करोड़ रुपए का सौदा हुआ। इतना ही नहीं उन पर आरोप हैं कि वे हरियाणा के तत्कालीन टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के डायरेक्टर और एक रियल एस्टेट कंपनी के संपर्क में भी थे।

4. वर्मा पर यह भी आरोप था कि उन्होंने कस्टम डिपार्टमेंट द्वारा पकड़े गए एक गोल्ड स्मगलर को बचाया था। इस मामले में उन्‍होंने स्मगलर को पुलिस सुरक्षा से बाहर निकालने का निर्देश दिया था। यह साल 2016 की बात है जब वे दिल्ली पुलिस के कमिश्नर थे।

5. वर्मा को उनके पद से छुट्टी दिलाने में एक और कारण यह भी रहा कि उन पर यह भी गंभीर आरोप थे कि उन्होंने दागी अफसरों को सीबीआई में लेने की कोशिश की। कहा गया कि वर्मा ने 2 दागी अफसरों को सीबीआई में लाने की कोशिश की थी, जबकि दोनों के खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट थी।

उल्‍लेखनीय है कि यही वो प्रमुख गंभीर आरोप रहे जो आलोक वर्मा पर लगाए गए, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति ने कड़ा फैसला लिया और परिणामस्‍वरूप वर्मा को अपने पद से हाथ धोना पड़ा।

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