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हिन्दू धर्म में हो ‘वेटिकन’ जैसी व्यवस्था-डॉ. शंकर अभ्यंकर

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Dr shankar vasdeo abhyankar
श्रीमद्‍ भगवद गीता, रामायण समेत विभिन्न हिन्दू धर्मग्रंथों के जानकार और आदित्य प्रतिष्ठान पुणे के प्रमुख डॉ. शंकर वासुदेव अभ्यंकर का मानना है कि हिन्दू धर्मगुरु बनने के लिए केन्द्रीय व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि वर्तमान में कोई भी व्यासपीठ पर बैठ जाता है। धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों को ही साथ चलना चाहिए।

अभ्यंकर हिन्दू धर्मग्रंथों और संस्कृति पर पूरे अधिकार के साथ बोलते हैं तो मनुस्मति के नवनिर्माण की भी बात करते हैं। जब उनकी नजर हैलमेट पर पड़ती है तो वे ये बताना नहीं भूलते कि जिस तरह दुर्घटना से बचने के लिए हमारे लिए हैलमेट अनिवार्य है, उसी तरह जीवन में धर्म की जरूरत होती है। डॉ. अभ्यंकर ने ऐसे ही कई मुद्दों पर वेबदुनिया के साथ लंबी बातचीत की। 
 
हिन्दू धर्म क्या है? : हिन्दू धर्म और संस्कृति बहुत ही विशाल है। इसकी गरिमा अतुलनीय है। वसुधैव कुटुंबकम इसकी मूल भावना है। हिन्दू धर्म को इस तरह समझा जा सकता है- यदि हम मान लें कि दुनिया का ड्राइंग रूम अमेरिका है, सुंदर वस्तु स्विट्जरलैंड है, चीन उद्यमशीलता का प्रतीक है और यूरोप दुकान का। मगर भारत इस दुनिया की पूजा स्थली है। हिन्दू धर्म की विशालता यही है कि उसकी सोच वैश्विक है। वह पूरे विश्व को अपने आलिंगन में लेना चाहता है। हिन्दू धर्म की अलग-अलग व्याख्याएं हैं। सावरकर हिन्दू धर्म की व्याख्या करते हुए कहते हैं- सिंधु नदी से हिन्द महासागर तक के क्षेत्र में समाए हुए सभी लोग जो इस भारत को पुण्यभू मानते हैं उसे हिन्दू कहा जा सकता है। हिन्दू धर्म के चार अधिष्ठान हैं। (हिन्दू धर्म के बारे में विस्तार से जानने के लिए देखें वीडियो)
हिन्दू धर्म में हो वेटिकन जैसी व्यवस्था : धर्मगुरु बनने के लिए हिन्दू धर्म में भी वेटिकन जैसी व्यवस्था होनी चाहिए। जिस तरह से ईसाई धर्मगुरु बनने के लिए वेटिकन से प्रमाण पत्र जारी होता है, उसी तरह की केन्द्रीय व्यवस्था हिन्दू धर्म में भी होनी चाहिए। क्योंकि यहां कोई भी व्यक्ति धर्म गुरु बन जाता है, अपनी गद्दी बना लेता है। फिर अनैतिक गतिविधियां भी संचालित होती है, जिससे धर्म बदनाम होता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। धर्मगुरु बनने के लिए एक मापदंड तय होना चाहिए। जैसे कि कोई व्यक्ति जिसने गीता, रामायण, वेद आदि धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है, उसे ही धर्मगुरु बनाना चाहिए। हर किसी व्यक्ति को व्यासपीठ पर बैठने का अधिकार नहीं होना चाहिए। 
 
भारत को चाहिए सुदर्शनधारी चक्र : कथाकारों और प्रवचनकारों द्वारा कृष्ण का जो रूप पेश किया जा रहा है वह अनुचित है। भागवत महापुराण में एक बार भी राधा के नाम का उल्लेख नहीं है, लेकिन हमारे कथाकार पूरी कथा के दौरान राधाकृष्ण... राधाकृष्ण ही रटते रहते हैं। वर्तमान में देश को योगेश्वर श्रीकृष्ण और सुदर्शनधारी कृष्ण की जरूरत है। मगर कथाकार बिना अध्ययन के व्यासपीठ पर बैठ जाते हैं। ऐसे लोगों को व्यासपीठ पर पांव रखने की अनुमति ही नहीं होनी चाहिए। (क्या है कृष्ण का असली रूप... सुनें विस्तार से)
मनुस्मृति का पुनर्निर्माण : मनुस्मृति कायदे कानून का ग्रंथ है। समय के साथ समाज में भी बदलाव आते हैं, अत: इसका नवनिर्माण भी जरूरी है। जिस तरह कानून में संशोधन होते हैं, उसी तरह एक समय के बाद इसमें में भी संशोधन होना चाहिए। हालांकि मनुस्मृति के मूलभूत सिद्धांत कालातीत और स्थलातीत हैं, जिनमें बदलाव हो ही नहीं सकता। लेकिन, बदलती सामाजिक व्यवस्था के बीच प्रत्येक 100 वर्ष  के बाद नए स्मृतिग्रंथ की जरूरत है। इस संबंध में मैंने कांचिकामकोटि पीठ और श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्यो से चर्चा की है साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और विश्व हिन्दू परिषद के बड़े नेता प्रवीण तोगड़िया से भी इस संबंध में बात की है। उन्होंने इस संबंध में मेरे विचार से सहमति जताई है। (मनु स्मृति के बारे में सुनें विस्तार से)

और क्या बोले अभ्यंकर साईं स्वरूपानंद प्रकरण पर... पढ़ें अगले पेज पर... 
 
 
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साईं-स्वरूपानंद प्रकरण : हमें इसकी परख होनी चाहिए कि जिसका पूजन हम करते हैं उसका कार्य समाज के हित में हुआ है या नहीं। उन्होंने सत्व गुण समाज में लाया है या नहीं। इसका सोच विचार अवश्य करना चाहिए। हमारा धर्म लोकशाही का धर्म है। इसमें पूरी स्वतंत्रता है कि आप जिस रास्ते पर चलना चाहें, चल सकते हैं। हिन्दू धर्म तो नास्तिकों को भी स्वीकार करता है। हां, हमेशा ऊपर की ओर जाइए, नीचे की ओर नहीं। 
 
रामराज्य की संकल्पना :  चुनाव के बाद लोग चाहते हैं कि देश में राम राज्य की स्थापना होनी चाहिए, लेकिन हमने आजादी के बाद भारतीय संस्कृति और परंपरा को छोड़ दिया। न तो इंडिया भारत है और न ही भारत इंडिया। भारत की आत्मा धर्म है। इंडिया का अधिष्ठान मांस- मज्जा है। इंडिया निरीश्वरवादी है। इंडिया में कोई लक्ष्मण रेखा नहीं है। जब संस्कार नहीं रहे तो हमारा पतन शुरू हो गया। इंडिया तो गाली है। भारत हमारी गौरवशाली परंपरा है। जीवन मूल्य समाप्त हो गए। राम का आदर्श बनना चाहिए। तभी राम राज्य की कल्पना को साकार किया जा सकता है। (सुनें विस्तार से राम राज्य के बारे में...) 
विद्यालयों में गीता की शिक्षा : मैं इस बात से शत प्रतिशत सहमत हूं कि विद्यालयों में गीता का अध्यापन होना ही चाहिए। इससे विद्यार्थी और शिक्षक दोनों का ही कल्याण होगा। गीता धार्मिक ग्रंथ नहीं है यह तो तत्वज्ञान का अभूतपूर्व ग्रंथ है। गीता का अध्यापन प्राथमिक स्तर से ही शुरू किया जाना चाहिए ताकि अच्छे विद्यार्थी तैयार हो सकें। गीता पूरी दुनिया को आत्मोन्नति का मार्ग दिखाती है। ऐसा होता है तो राष्ट्र का भला ही होगा।
 
इस तरह तैयार होंगे विवेकानंद : सिर्फ एक विवकेनंद से कुछ नहीं होगा। भारत में ऐसे कई विवेकानंद तैयार करने की जरूरत है। आदित्य प्रतिष्ठान इस दिशा में 32 साल से काम कर रहा है। दुनिया में भी इसके कई केन्द्र हैं। संस्थान मानवीय संस्कृति का वैश्विक संत विद्यापीठ तैयार कर रहा है, जहां धर्म, राष्ट्र, समाज, अर्थ, साहित्य, विज्ञान, तकनीक, कला, खेल आदि का 5 वर्ष तक प्रशिक्षण दिया जाएगा। शिक्षा में अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय होना चाहिए। ज्ञान और विज्ञान दोनों साथ चलें क्योंकि ज्ञान के बिना विज्ञान अंधा है और विज्ञान के बिना ज्ञान पंगु। एचएससी के बाद यहां प्रवेश लिया जा सकेगा। (सुनें विस्तार से... इस तरह बनेंगे विवेकानंद)
  
धर्मसत्ता और राजसत्ता साथ साथ चलें : वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी है कि धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों साथ साथ चलें। राजसत्ता साफ सुथरी है तो उसे धर्म का अधिष्ठान चाहिए। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। जिसके मन में धर्म के प्रति सच्ची आस्था है, उसके हाथ में राजसत्ता होनी चाहिए। हमारा सौभाग्य है वर्तमान में देश को ऐसा नेतृत्व मिला है। इससे जरूर परिवर्तन देखने को मिलेगा। 
 
रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास पर नारी विरोधी होने के आरोपों पर डॉ. अभ्यंकर कहते हैं कि हमें कुछ भी आरोप लगाने से पहले संदर्भ अवश्य देखना चाहिए। उन्होंने किस संदर्भ में कोई बात कही है। नारी को ताड़ना संबंधी बात उन्होंने सबके लिए नहीं कही। वे तो प्रत्येक स्त्री को सीता माता के रूप में ही देखते थे। ताड़ना से तात्पर्य स्त्री के उस रूप से है जो धर्म का उल्लंघन करती है, जिसकी पति, परिवार और कौटुंबिक व्यवस्था के प्रति आस्था नहीं है। (कैमरामैन : धर्मेन्द्र सांगले)
 

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