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पहलगाम हमला : फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ होते तो क्या करते?

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वेबदुनिया न्यूज डेस्क

, मंगलवार, 6 मई 2025 (08:35 IST)
Field Marshal Sam Manekshaw News: पहलगाम हमले जैसी दुखद और उत्तेजक घटनाओं के बाद, भारत में कई बार यह सवाल उठता है कि क्यों समय पर कठोर निर्णय नहीं लिया जाता? क्यों हमारी प्रतिक्रिया में देरी होती है? इस संदर्भ में, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की जिंदगी और उनके नेतृत्व से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मानेकशॉ न केवल एक सैन्य रणनीतिकार थे, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने समय, परिस्थिति और नैतिकता के आधार पर निर्णय लेने की कला को बखूबी समझा। उनकी शिक्षाओं के आधार पर, आइए जानें कि एक व्यक्ति निर्णय लेने में क्यों हिचकिचाता है और हमें इससे कैसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
 
निर्णय लेने में देरी के कारण : मानेकशॉ का मानना था कि निर्णय न लेने का सबसे बड़ा कारण है डर। यह डर कई रूपों में हो सकता है :
 
परिणाम का डर : पहलगाम जैसे हमले के बाद, कोई भी निर्णय—चाहे वह सैन्य कार्रवाई हो या कूटनीतिक कदम—बड़े परिणामों को जन्म दे सकता है। एक गलत कदम से युद्ध, आर्थिक संकट या अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है। यह डर निर्णय निर्माताओं को रोकता है।
 
अनिश्चितता : मानेकशॉ ने 1971 के युद्ध से पहले तत्कालीन सरकार को सलाह दी थी कि सैन्य कार्रवाई के लिए सही समय का इंतजार करना जरूरी है। अप्रैल 1971 में जब उनसे युद्ध शुरू करने को कहा गया, तो उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया, क्योंकि सेना तैयार नहीं थी। यह अनिश्चितता—कि क्या हम पूरी तरह तैयार हैं?—निर्णय को टालने का कारण बनती है।
 
जिम्मेदारी का बोझ : एक निर्णय लेने वाला व्यक्ति जानता है कि उसका फैसला लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता है। मानेकशॉ ने हमेशा इस जिम्मेदारी को गंभीरता से लिया, लेकिन इसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
 
सामाजिक और राजनीतिक दबाव : पहलगाम जैसे हमलों के बाद जनता का गुस्सा स्वाभाविक है। लेकिन नेता कई बार तात्कालिक लोकप्रियता के बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देते हैं, जिससे त्वरित कार्रवाई में देरी हो सकती है।
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मानेकशॉ से प्रेरणा : समय, साहस और रणनीति : फील्ड मार्शल मानेकशॉ की जिंदगी हमें सिखाती है कि निर्णय लेने में देरी कमजोरी नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच का हिस्सा हो सकती है, बशर्ते वह सही दिशा में हो। 1971 के युद्ध में उनकी रणनीति इसका जीता-जागता उदाहरण है। जब भारत-पाकिस्तान युद्ध की बात आई, मानेकशॉ ने जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने सेना की तैयारी, मौसम की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय माहौल का गहन विश्लेषण किया। उनका यह धैर्य और साहस ही था जिसने भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई।
 
मानेकशॉ का यह दृष्टिकोण हमें प्रेरित करता है कि:
 
सही समय का इंतजार करें : हर कार्रवाई का एक सही समय होता है। पहलगाम जैसे हमले के बाद तुरंत प्रतिक्रिया देना भावनात्मक रूप से सही लग सकता है, लेकिन रणनीतिक रूप से यह हमेशा उचित नहीं होता।
 
साहस दिखाएं : मानेकशॉ ने सरकार को स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वह गलत समय पर युद्ध शुरू करने का जोखिम नहीं लेंगे। यह साहस हमें सिखाता है कि सही निर्णय के लिए दबाव के आगे झुकना नहीं चाहिए।
 
तैयारी पर जोर दें : मानेकशॉ ने सेना को तैयार करने में महीनों लगाए। यह हमें सिखाता है कि बिना तैयारी के लिया गया निर्णय विफलता को न्योता दे सकता है। 
 
पहलगाम हमले जैसे संकट हमें चुनौती देते हैं, लेकिन मानेकशॉ की शिक्षाएं हमें रास्ता दिखाती हैं। हमें चाहिए:
 
भावनाओं पर नियंत्रण : गुस्सा और दुख स्वाभाविक हैं, लेकिन निर्णय तर्क और रणनीति पर आधारित होने चाहिए।
 
एकजुटता : मानेकशॉ ने हमेशा सेना और सरकार के बीच एकजुटता पर जोर दिया। आज हमें भी जनता, सेना और सरकार के बीच एकजुटता की जरूरत है।
 
दीर्घकालिक सोच : तात्कालिक कार्रवाई से ज्यादा जरूरी है ऐसी रणनीति जो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोके। फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने हमें सिखाया कि सच्चा नेता वही है जो डर, अनिश्चितता और दबाव के बावजूद सही समय पर सही निर्णय लेता है। पहलगाम जैसे हमलों के बाद हमें तुरंत प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी से बचना चाहिए और मानेकशॉ की तरह धैर्य, साहस और रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यह न केवल हमारी ताकत को बढ़ाएगा, बल्कि हमें एक मजबूत और सुरक्षित भविष्य की ओर ले जाएगा। 

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