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जानिए कितना बड़ा खतरा था 20 मिनट तक ब्रिज पर फंसे प्रधानमंत्री मोदी को?

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वेबदुनिया न्यूज डेस्क

गुरुवार, 6 जनवरी 2022 (16:13 IST)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काफिले का पाकिस्तान से लगे बॉर्डर एरिया में लगभग 20 मिनट तक फंसे रहना सुरक्षा में एक बहुत बड़ी चूक मानी जा रही है। इस मामले पर जहां केंद्र सरकार ने पंजाब सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले पर सख्त रुख दिखाते हुए पंजाब सरकार को तलब किया है। 
 
प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक पर कई तर्क-वितर्क हो रहे हैं लेकिन देश के प्रधानमंत्री के साथ हुई इस घटना से सुरक्षा एजेंसियों की कमजोरियां और केंद्र-राज्य संबंधों में संवादहीनता सामने आई हैं। इस पूरे मामले को राजनीति के एंगल से देखने की बजाय इसे देश के प्रधानमंत्री के साथ हुई गंभीर लापरवाही के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता।  
 
आइए जानते हैं कि कितना गंभीर खतरा था प्रधानमंत्री को? और इस पूरे मामले पर सुरक्षा विशेषज्ञों क्या कहना है?
 
आखिर क्या हुआ था हाइवे पर : सुबह 7 से 9 बजे तक हाईवे पर कहीं कोई रुकावट नहीं थी, लेकिन दोपहर 12 बजे के बाद अचानक चीजें बिगड़ती चली गईं और किसान संगठनों के सदस्य व अन्य लोग पुलिस होने के बावजूद हाईवे तक पहुंचने में कामयाब हो गए थे। 
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वीआईपी सुरक्षा में काम कर चुके रिटायर्ड कर्नल रिपुदमन सिंह का कहना है कि मोदी का काफिला जहां फंसा था, वह हमेशा से संवेदनशील इलाका माना जाता रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि यहां से भारत-पाकिस्‍तान अंतरराष्‍ट्रीय सीमा की दूरी 50 किमी से भी कम दूर पर है।
 
उल्लेखनीय है कि फिरोजपुर क्षेत्र में अक्‍सर टिफिन बम और अन्य विस्फोटक पदार्थ मिलते रहते हैं। 2021 नवंबर में दिवाली से पहले भारत-पाक सीमा के पास गांव अलीके से पुलिस ने टिफिन बम बरामद किया था। इस मामले को लेकर 3 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था। हाल के महीनों में ही इस क्षेत्र से चार से ज्‍यादा टिफिन बम मिल चुके हैं और जलालाबाद में तो 15 सितंबर 2021 को यहां टिफिन बम ब्‍लास्‍ट में एक आदमी की जान भी जा चुकी है। 
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कर्नल सिंह कहते हैं कि इसके पहले भी पंजाब में कई बार सीमापार से ड्रोन के जरिए ड्रग्स, हथियार व विस्फोटक पहुंचाने की खबर आ चुकी है। ब्रिज पर फंसे काफिले को ड्रोन के जरिए भी आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। 
पंजाब जैसे बॉर्डर स्टेट में एक ओवर ब्रिज पर प्रधानमंत्री का काफिला एक कैप्टिव की तरह 15-20 मिनट तक खड़ा रहे तो यह सुरक्षा के लिहाज़ से गंभीर बात है। इस फ्लाईओवर पर कोई भी आतंकी गुट इस काफिले को टारगेट कर सकता था। 
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एक ही जगह स्टैंट स्टिल रहना, भले ही बुलेटप्रूफ कार के अंदर, बेहद खतरनाक हो सकता है। इसके अलावा फ्लाईओवर की पैरेलल लाइन पर ट्रैफिक चल रहा था जो इस स्थिति को और भी खतरनाक बना देता है। फोटो में प्रधानमंत्री को फ्रंट सीट पर बैठे साफ देखा जा सकता है। तेजी से चलता ट्रैफिक में किसी दुर्घटना की आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता।
प्रधानमंत्री के दौरे से पहले राज्य सरकार को सूचित किया जाता है और प्रधानमंत्री की सुरक्षा की दृष्टि से हरसंभव सुरक्षा के इंतजाम किए जाते हैं। पुलिस पूरे रूट को सैनिटाइज करती है और संवेदनशील जगहों पर एंट्री-एग्जिट पाइंट्स पर बैरिकेडिंग करती है।   
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कैसे होती है प्रधानमंत्री की सुरक्षा : वीआईपी सुरक्षा में काम कर चुके रिटायर्ड कर्नल रिपुदमन सिंह करते हैं कि प्रधानमंत्री के आगमन से कई दिन पहले एसपीजी और खुफिया एंजेंसियां स्थल का मुआयना कर रेकी करती है। आईबी, राज्य की सुरक्षा एजेंसियां केंद्र की सुरक्षा एजेंसियों के साथ को-ऑर्डिनेट कर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करती हैं। प्रधानमंत्री के इनर सर्कल में एसपीजी के विशेष दस्ते तैनात किए जाते है और आउटर सर्कल की जिम्मेदारी स्टेट पुलिस के पार होती है। अशांत क्षेत्रों में आउटर सर्कल सेक्युरिटी केंद्रीय सुरक्षा बलों जैसे सीआरपीएफ या बीएसएफ के पास भी हो सकता है। 
 
खुफिया एजेंसियां किसी भी दौरे से पहले वीआईपी के थ्रेट लेवल के आधार थ्रेट परसेप्शन (संभावित प्रदर्शन/धरना/हमले की आशंका इत्यादि का विश्लेषण) करती है उसी आधार पर वीआईपी मूवमेंट का रूट प्लान तैयार करती है। प्रधानमंत्री के दौरे में कहां क्या व्यवस्था होनी चाहिए, क्या रूट होना चाहिए ये सारा कुछ तय करती हैं। 
 
कर्नल सिंह कहते हैं कि प्रधानमंत्री के मूवमेंट की पूरी ड्रिल की जाती है और उसके अनुसार सुरक्षा के इंतेजाम किए जाते हैं। आपात स्थिति के लिए सुरक्षित ठिकाने से लेकर, वैकल्पिक मार्ग सहित अस्पताल, यहां तक की वीआईपी के ब्लड ग्रुप की कई युनिट भी रखी जाती है। 
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उनका मानना है कि यदि एकाएक कोई रास्ते में आ गया तो पुलिस को उन्हें तुरंत हटाना चाहिए थ। नहीं तो पीएम के काफ़िले को कोई और वैकल्पिक मार्ग देना चाहिए था। सबसे बेहतर यह होता कि पीएम के काफिले को एयरपोर्ट से आगे बढ़ने से पहले ही यह सूचना देनी चाहिए थी, क्योंकि बिना पुलिस की हरी झंडी के काफिला आगे नहीं बढ़ाता है। कुल मिलाकर यह टोटल सेक्युरिटी फैल्योर है जिसकी जिम्मेदारी राज्य के साथ कुछ हद तक केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों को भी लेना होगी।

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