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अरावली: एक पहाड़ के होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है?

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संदीपसिंह सिसोदिया

करीब दो अरब वर्ष पुरानी अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है। गुजरात से दिल्ली तक लगभग 692 किलोमीटर में फैली यह श्रृंखला राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के पारिस्थितिक संतुलन की धुरी रही है। अरावली की भूमिका केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। इतिहास गवाह है कि यह पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत की प्राकृतिक किलेबंदी रही है।

इसकी ऊबड़-खाबड़ श्रृंखलाओं ने सदियों से उत्तर-पश्चिम से आने वाले आक्रमणकारियों के लिए प्राकृतिक अवरोध पैदा किया, जिससे उपजाऊ मैदानों और दिल्ली जैसे केंद्रों की रक्षा हुई। राजपूत राज्यों, विशेषकर मेवाड़ और मारवाड़ ने अरावली की इन पहाड़ियों को रणनीतिक किले बनाने में इस्तेमाल किया—चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़ जैसे दुर्ग इसी श्रृंखला में बसे हैं, जहां योद्धाओं ने मुगलों और अन्य आक्रमणकारियों के खिलाफ़ घेराबंदी का सामना किया। महाराणा प्रताप जैसे वीरों को इन घने जंगलों और दुर्गम रास्तों ने आश्रय दिया।
लेकिन अब इसका अस्तित्व एक सवाल बन चुका है—क्योंकि पहाड़ की परिभाषा बदल दी गई है। कभी-कभी किसी देश का भविष्य किसी बड़े राजनीतिक भाषण या बजट दस्तावेज़ में नहीं, बल्कि एक तकनीकी परिभाषा में तय हो जाता है। अरावली पर्वत श्रृंखला के साथ भी यही हो रहा है।

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में केंद्र सरकार की समिति की सिफारिश को स्वीकार करते हुए यह तय किया गया कि अब केवल वे भूमिरूप, जो अपने आसपास की भूमि से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचे हैं, “अरावली पहाड़ी” कहलाएंगे। दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां यदि 500 मीटर के दायरे में हों, तभी उन्हें “अरावली रेंज” माना जाएगा।

देखने में यह एक तटस्थ, वैज्ञानिक और प्रशासनिक निर्णय लगता है। लेकिन इसके परिणाम चौंकाने वाले हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ इस फैसले को अरावली के लिए “डेथ वारंट” बता रहे हैं।

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की एक आंतरिक रिपोर्ट बताती है कि अरावली में दर्ज 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048—यानी महज़ 8.7 प्रतिशत—ही इस नए मानक को पूरा करती हैं। इसका अर्थ है कि 90 प्रतिशत से अधिक अरावली कानूनी संरक्षण की परिधि से बाहर हो सकती है। 

यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
क्या पारिस्थितिकी को मीटरों में मापा जा सकता है?
पर्यावरण किसी इमारत की मंज़िल नहीं है, जिसे ऊंचाई से परिभाषित किया जा सके। अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियां—जो अब “पहाड़” नहीं मानी जाएंगी—वही हैं जो वर्षा जल को रोकती हैं, भूजल को रिचार्ज करती हैं, जैव विविधता को सहारा देती हैं और थार मरुस्थल को दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकती हैं।

अरावली उत्तर-पश्चिम भारत की पर्यावरणीय ढाल है। यह थार मरुस्थल की पूर्वी सीमा बनाकर रेत और धूल को आगे बढ़ने से रोकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में खनन और अतिक्रमण से करीब 35 प्रतिशत अरावली क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इसके परिणाम आज दिख रहे हैं—धूल भरी आंधियां, बढ़ता तापमान और गिरता भूजल।

दिल्ली-एनसीआर पहले ही दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में शामिल है। यदि अरावली की प्राकृतिक दीवार कमजोर हुई, तो थार की धूल और गर्म हवाएं बिना किसी अवरोध के यहां तक पहुंचेंगी। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं होगा, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा भी होगी।

अरावली की चट्टानें दरारदार हैं, जो बारिश के पानी को जमीन के भीतर पहुंचाकर एक्विफ़र्स को रिचार्ज करती हैं। अनुमान है कि यह प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लाख लीटर पानी रिचार्ज करने की क्षमता रखती है। चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों का जीवन इसी प्रणाली से जुड़ा है।

इसके जंगल तेंदुआ, हाइना, नीलगाय, मोर और सैकड़ों पक्षी प्रजातियों का घर हैं। यह क्षेत्र मानव और वन्यजीवों के सह-अस्तित्व का दुर्लभ उदाहरण रहा है। लेकिन खनन ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। राजस्थान में कई पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। हरियाणा के कुछ इलाकों में खनन ने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर दिया है। भूजल स्तर कई जगह 1000 से 2000 फीट तक गिर चुका है। स्टोन क्रशरों की धूल खेतों पर जमकर कृषि उत्पादकता को नुकसान पहुंचा रही है।

यह सब सुप्रीम कोर्ट की पुरानी रोक के बावजूद हुआ है।
विकास का कौन-सा मॉडल? सरकार का कहना है कि नई परिभाषा के बावजूद 90% क्षेत्र सुरक्षित रहेगा, क्योंकि नई खनन लीज़ पर रोक है और “सस्टेनेबल माइनिंग” Management Plan for Sustainable Mining (MPSM) की योजना बनाई जाएगी। लेकिन भारत का पर्यावरणीय इतिहास बताता है कि जब किसी क्षेत्र को परिभाषा के ज़रिए कमजोर किया जाता है, तो उसके दोहन के रास्ते खुल जाते हैं।

अरावली से परे: एक दोहराई जाती कहानी
यह कहानी केवल अरावली की नहीं है। नियामगिरि, हसदेव अरंड, गोवा और पश्चिमी घाट—हर जगह विकास और पर्यावरण के बीच यही टकराव दिखता है। हर बार तर्क वही होता है: आर्थिक विकास ज़रूरी है। और हर बार कीमत प्रकृति, आदिवासी समुदायों और भविष्य की पीढ़ियों को चुकानी पड़ती है। ओडिशा के नियामगिरि की पहाड़ियों में आदिवासी समुदायों ने खनन को रोककर दिखाया कि जन-सहमति प्रकृति को बचा सकती है। छत्तीसगढ़ के फेफड़े कहे जानेवाले हसदेव अरंड के जंगलों में कोयला खनन ने हाथी कॉरिडोर और आदिवासी जीवन को खतरे में डाल दिया। गोवा में अवैध खनन पर रोक से अर्थव्यवस्था को झटका लगा, लेकिन नदियां और जंगल फिर सांस लेने लगे। पश्चिमी घाट में वनों की कटाई और खनन ने भूस्खलन और बाढ़ जैसी त्रासदियों को जन्म दिया।

हर उदाहरण एक ही चेतावनी देता है— प्रकृति का नुकसान तुरंत नहीं, लेकिन लंबे समय तक भारी कीमत वसूलता है।

पहाड़ का होना क्यों मायने रखता है: अरावली सिर्फ पत्थरों की श्रृंखला नहीं है। यह पानी की स्मृति, हवा की ढाल, और जलवायु संतुलन की शर्त है। इसे अगर केवल 100 मीटर के पैमाने पर तौला गया, तो यह धीरे-धीरे नक्शों से मिट जाएगी—बिना किसी औपचारिक घोषणा के।

अरावली सिर्फ पत्थरों की श्रृंखला नहीं है। यह पानी की स्मृति, हवा की ढाल, जीवन का आधार और भविष्य की शर्त है। यदि हम इसे केवल मीटरों में मापेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इसे नक्शों पर नहीं, इतिहास की किताबों में खोजेंगी।

एक पहाड़ के होने या न होने से फर्क पड़ता है— पानी में, हवा में, जीवन में और हमारे भविष्य पर। यही अरावली की असली कहानी है। और यही चेतावनी भी।

अरावली का सवाल दरअसल यह पूछता है— क्या हम विकास को प्रकृति के बिना परिभाषित करना चाहते हैं? अगर जवाब हां है, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी।

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