Publish Date: Tue, 24 Mar 2020 (10:39 IST)
Updated Date: Tue, 24 Mar 2020 (10:44 IST)
चैत्र नवरात्रि 25 मार्च से प्रारंभ हो रही है। चैत्र माह से ही भारतीय नववर्ष का प्रारंभ भी होता है। यह माह कैलेंडर का पहला माह है। वनदुर्गा नाम से एक उपनिषद, एक पाठ, एक मंत्र, साधना, अनुष्ठान विधि, स्त्रोत आदि सभी कुछ है। आओ जानते हैं कि माता वनदुर्गा कौन हैं।
षठप्रहरिणी असुरमर्दिनी माता दुर्गा का एक रूप है वनदुर्गा। उन्हें जंगलों की देवी, बनशंकरी अथवा शाकम्भरी भी कहते हैं। मूलत: वह आद्या शक्ति का अवतार है। आद्या शक्ति को दुर्गा कहते हैं। झारखंड के रांची जिला में पूरब हरदी गांव में मां वनदुर्गा का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है।
कहते हैं कि शाकम्भरी मां समस्त भुमंडल की अधीश्वरी भुवनेश्वरी ही है। ये मां ही वैष्णो, चामुंडा, कांगड़ा वाली, ज्वाला, चिंतापुरणी, कामाख्या, चंडी, बाला सुंदरी, मनसा, नैना, शताक्षी देवी, रक्तदंतिका, छिन्नमस्तिका, भीमा, भ्रामरी और श्री दुर्गा कहलाती हैं। मां श्री शाकंभरी के देश में अनेक सिद्धपीठ है। जिनममें सकरायपीठ और सांभर पीठ राजस्थान में और सहारनपुर पीठ उत्तर प्रदेश में हैं।
भारत के वनक्षेत्रों में वनवासी और आदिवासी सामाज की देवी मां वनदुर्गा वनों की पीड़ा सुनकर उनमें आश्रय लेने वाले दानवों का वध करने और वनों की रक्षा करने हेतु अवतरित हुई एक शक्ति है। वनों की पुत्री देवी मारिषा के पोषण हेतु वनदुर्गा का यह अवतार सभी मातृकाओं में श्रेष्ठ माना जाता है।