लबों पर आ गए अल्फ़ाज़ दरिया की मौजें देखकर ख़याल थे विशाल समंदर की गहराइयों की तरह ऐसा लगा कि पहुंच गए हम अगले जनम तक और लम्बी गुफ्तगू करते रहे हम आपसे लगाव में जैसे लहरें बातें करते आईं हैं किनारों से आज तक दिवा स्वप्न था...