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लेखन श्रृंखला 3 : 'सुधा'

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pravasi sahitya
कई दिनों से कई कविताएं और कहानियां मन के भीतर हिंडोले खाती दिमाग का द्वार बार-बार खटखटाती भीतर से बाहर आने को व्याकुल थीं। मेरी एक कहानी डॉ. सुधा ओम ढींगरा के मार्गदर्शन में छपी और दिमाग सातवें आसमान पर। 

लेखन तो भगवान की दी हुई खूबसूरत और बेशकीमती सौगात है, जो हर किसी के नसीब में नहीं होती। अपने आसपास के वातावरण को, लोगों को, प्रकृति को, खूबसूरती को, माहौल को (राजनीतिक, सामाजिक), इतिहास, वर्तमान, शिक्षा, विकास, परिवर्तन सभी के प्रेषक बनकर सबको अपने भीतर आत्मसात करके फिर अपनी कल्पनाओं से मिलवाकर क्रिया करवाकर एक कहानी का सृजन कर उसमें भावनाओं की धड़कन जगाकर उसे निखारना, सजाना और संवारकर प्रेक्षित करने की इस संपूर्ण प्रक्रिया के बाद एक कहानी बनती है। 
 
एक कहानी छपने के बाद डॉ. सुधा ने मुझे सलाह दी कि अब पहले दूसरे लेखकों को खूब पढ़ो, समझो, थोड़ा वक्त दो फिर बात करना। मैंने सोचा जब सब कुछ भीतर से अपने आप प्रवाहित होता है और वक्त की कहां मिलता है, जो अब फिर से पढ़ो। खैर, ठीक है जब वक्त मिलेगा, पढ़ लेंगे। वक्त कभी मिलता नहीं, जीवन का पहिया अपनी रफ्तार से चलता रहता है और हमें वक्त निकालना पड़ता है। 
 
कई दिन नहीं, कुछ वर्ष बीत गए। इसी बीच मेरी तरह कई नए लेखकों को सुधाजी प्रोत्साहित और मार्गदर्शित करती रहीं। इनकी कई नई किताबें भी छपती रहीं। जब भी उनसे बात होती, वे बतातीं अब मेरी यह कहानी, किताब, संग्रह आने वाला है, उस पर काम कर रही हूं। वे अक्सर बतातीं कि प्रतिदिन कितने घंटों वे कड़ी मेहनत करती हैं। कई दिनों, कई महीनों की तपस्या के बाद आत्मसंतुष्टि मिलने पर वे एक कहानी को रचती हैं और मैं उनसे हास्य करती आप मानव लेखक नहीं, पूरी रोबोट बन गई हूं। कैसे इतना समय निकालकर इतना कुछ रच लेती हूं। और वे अपनी सरल-सी हंसी में ठहाका लगाकर हंस पड़तीं।
 
कहते हैं न जब-जब जो भी होता है, अच्छे के लिए ही होता है। ज्ञानगंगा पास ही बह रही थी और मैंने कभी उसकी सुध नहीं ली। परंतु मेरे लिए जब सही समय आया डॉ. सुधाजी की पुस्तकें फिर मेरे हाथ में आ गईं।
 
शुरुआत हुई 'कौन-सी जमीन अपनी' से। जैसे-जैसे मैं पढ़ती जाती, लगता मैं कहानियों और लेखक से गहरे से जुड़ती जा रही हूं। एक नई सुधा से परिचय हो रहा है। पढ़कर अनुभूति होने लगी ‍क‍ि जो कुछ भी कहानियों में घट रहा है, वह वास्तविक है। सरल-कोमल लेखनी, नए-नए शब्दों से परिचय, धाराप्रवाह बहाव और सटीकता। कहीं कोई भटकाव नहीं।
 
'कौन-सी जमीन अपनी', 'संदली दरवाजा'- यहां उन्होंने गजब की भावनाएं, हकीकत और कल्पनाओं का अद्धभुत संगम किया है। नारी और पुरुष दोनों ही के हृदय की भावनाओं की स्थिति, द्वंद्व का बेहद बारीकी से खूबसूरत चित्रण किया है।
 
मैंने कुछ बदलाव के लिए मेरी अध्ययन की इस यात्रा में अगला पड़ाव किया डॉ. हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला' में जिसकी कुछ पक्तियां 'कौन बनेगा करोड़पति' में अमिताभजी को गुनगुनाते हुए सुना था। 'मधुशाला' पढ़कर मन धन्य हो गया। 
 
 

मैंने फैसला लिया ‍कि अब कुछ और कहानीकारों को भी पढ़ा जाए। अगली पुस्तक 'कहानियां अमेरिका से' पढ़ना शुरू की। यहां मेरा ऐसा मानना था कि डॉ. सुधाजी को मैं निजी तौर पर जानती हूं और थोड़ा बदलाव जरूरी है। दूसरे लेखकों को पढ़ना जरूरी है। मेरा अपना ही डर था कि लगातार सुधाजी को पढ़कर कहीं मैं एक ही राय न बना लूं?
 
इरा प्रसाद द्वारा लिखी कहानी 'वह स्त्री' पढ़कर लगा कि कहानी हकीकत बनकर दृश्यपटल पर सामने चल रही है। अलग-अलग लेखक, नई कल्पनाएं, नई कहानियां, भिन्न-भिन्न शैली जानने का अवसर मिला। सभी बहुत रुचिकर था। यह विचार भी सुधाजी का ही था कि थोड़ी विविधता जरूर रखो पढ़ने में। 
 
अब मेरा जोश चरम सीमा पर पहुंच चुका था, पढ़ने में मजा आ रहा था। एक दिन बैठकर मैंने 25 से ज्यादा अलग-अलग लेखकों की कहानियां ऑनलाइन ढूंढकर निकालीं, प्रिंट किया और लगी पढ़ने। जहां कहीं भी जाती, मेरे साथ कहानियों का बंडल भी जाता था। सुबह की चाय से शुरुआत होती और रात को बिस्तर पर जब तक नींद न आ जाए, मैं पढ़ती।
 
अलग-अलग कहानियों को पढ़ते मैंने अनुभव किया कि कई कहानियां पढ़कर खत्म भी हो जातीं, उनसे जुड़ाव तो दूर की बात है। उल्टा मैं बोरियत महसूस करती और कहानी से, लेखक से सहमत नहीं हो पाती। यह भी कोई कहानी है, कहां शुरू हुई, कहां खत्म, दिल की गवाही सुन दिमाग बोल उठता?
 
'छोटे मुंह बड़ी बात', पर इस वक्त मैं पाठक की तरह पढ़ रही थी। मेरे भीतर का लेखक तो कहीं अंदर छूट गया था, दब गया था, परंतु अनुभव लेने के लिए पुकार-पुकारकर मुझे याद दिला रहा था क‍ि सभी कहानियां जो तुमने चुनी हैं, वे पढ़ो- विविधता के लिए, अनुभव के लिए, जानकारी और ज्ञान के लिए। कई कहानियां बोझिल मन से पढ़कर पढ़ना समाप्त किया।
 
दिमाग का एक हिस्सा कुलबुलाने लगा। फिर से सुधाजी की नई पुस्तक पढ़ना शुरू करो। दूसरे हिस्से ने मन का साथ दिया, 'देश-देशांतर की लघुकथा' पढ़ना शुरू की। लघु कहानियां हैं, शीघ्रता से पढ़ना भी हो जाएगा, कहानी पसंद नहीं आई तो पन्ना पलटकर अगली कहानी पढ़ना शुरू कर देंगे। दिमाग का तर्क काम कर गया। 
 
एक-से-एक खूबसूरत कहानियां, पर मेरी प्यास बुझ नहीं रही थी लघु कहानियों से। वे मेरे अध्ययन की दिशा को बदल रही थीं। लघुकथाएं व कहानियां अलग, उनके गठन का तरीका अलग, उनकी शैली अलग। मैंने उन्हें विश्राम दिया कुछ समय के लिए और फिर कुछ दिन पढ़ना बंद कर गर्मी की छुट्टियां मनाने में व्यस्त-मस्त हो गई। 
 
छुट्टियों के बाद तरोताजा दिल-दिमाग के साथ डॉ. सुधा ओम ढींगरा की अगली किताब पढ़ना शुरू की 'कमरा नंबर 103'। पहले पन्ने पर लिखा था- 'कहानियों की भीड़ से अलग कहानियां'। पंकज सुबीरजी व उनके विचार भी वही गवाही दे रहे थे, जो अब तक मेरा मस्तिष्क दे रहा था। मेरे पास लिखने को पंकज सुबीरजी की तरह कई रचनाकार शब्द नहीं थे, पर भाव वही थे।
 
'आग में गर्मी कम क्यों है' ज्वलंत विषय पर रची गई एक असाधारण रचना। सुधाजी जब लिखती हैं तो प्रकृति के साथ-साथ मानव मन की थाह, जगह का संक्षिप्त में विस्तृत वर्णन, गहराई, अमेरिकी देश की जीवनशैली, सभ्यता, सामाजिक परंपराएं, सोच, लोगों की मनोवैज्ञानिक सोच, मन:स्थिति और यहां बसे भारतीयों की जीवनशैली, संघर्ष, अकेलापन, भारत के लिए तड़प, अपनों के लिए तड़प, बिछोह, समझौते, परिवर्तन, बच्चों का बदलता व्यवहार- इन सभी का ताना-बाना इतनी खूबसूरती से बुनती हैं कि पाठक को लगता है मानो वह उन्हीं का मन टटोलकर शब्दों में ढाल रही हैं। पाठक लेखक से गहरा जुड़ाव महसूस करता है, भीतर तक जुड़ जाता है। 
 
'कहानी कमरा नंबर 103' कई घर की कहानी है। कई बार हम अपने स्वार्थी स्वभाव को पहचान नहीं पाते और इसे जीवन का एक चक्र मानकर इस पहिए के घुमाव में अपने माता-पिता की भावनाओं को कुचल देते हैं। माता-पिता का फर्ज तो याद रख लेते हैं, परंतु अपना भूल जाते है। 
 
मेडिकल इंश्योरेंस बहुत महंगा है और कई बार उसमें मेडिकल के बहुत सारे खर्चे भी बीमा कंपनियां वहन नहीं करतीं, यह जानते हुए भी या अनजाने में कई भारतीय मजबूरी या खुशी में माता-पिता के स्वास्थ्य का जोखिम उठाकर भी उन्हें अमेरिका बुला लेते हैं, सोचते हैं कुछ नहीं होगा और वक्त आने पर संभाल नहीं पाते। 
 
कहानी 'कमरा नंबर 103' में कोमा में भी इंसान का मस्तिष्क काम कर किस तरह नई दिशा पाता है, यह बताया गया है। मूक रहकर भी कहानी की मुख्य नायिका के मन की व्यथा, नर्सों की उसके प्रति करुणा, दया का भाव और मुख्य किरदार के दर्द को मानवता के नाते करीब से महसूस करना, इस कहानी को पढ़कर दर्द, गुस्सा, करुणा, दया अपने आप भीतर तक प्रवाहित होती है, आप कहानी में गहरे खो जाते हो, लेखक ने जो महान कहानी रची है, कहानी पढ़कर चरम अनुभव हुआ।
 
'वह कोई और थी' एक पुरुष के मन की वेदना, दर्द, परिवार की स्थिति को सुधारने की चाहत के साथ ही अपने से जुड़े रिश्तों के सम्मान की खातिर अपमान सहते हुए भी प्यार की चाहत में भारतीय सोच, सहनशीलता और सज्जनता का अनूठा उदाहरण, एक अनूठी कहानी तो दूसरी ओर 'सूरज क्यों निकलता है', 'टॉरनेडो' अमेरिकी समाज की दीवारों को दीमक की तरह खोखला करती भीतरी बीमारियां, मन का द्वंद्व, कचोट, दर्द बहुत ही शानदार और दमदार तरीके से लिखा गया है।
 
कहानी 'दृश्य भ्रम' कल्पनाओं से उतरकर हकीकत से टकराती हुई परीलोक में खत्म होती है और पाठक डॉ. जशन के लिए गहरी सहानुभूति और राहत महसूस करता है। यह लेखक की कलम की ताकत को दर्शाता है।
 
डॉ. सुधाजी की हर कहानी में मनोवैज्ञानिक आधार, मनोचिकित्सा, वैज्ञानिक आधार, इतिहास, भारतीय और अमेरिकी समाज की गहरी पहचान, वेद-पुराणों की समझ, उनसे हमारी सोच, व्यवहार और परवरिश पर प्रभाव सभी कुछ बहुत ही सूझ-बूझ और गहराई से रचा गया है। लेखक की पकड़, बुद्धिमत्ता, उलझनों के पीछे छिपे कारणों और उनको सुलझाने का तरीका, हर कहानी के अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण सुधाजी को कई-कई लेखकों से एक बहुत ही अलग और विशिष्ट पहचान दिलाता है।
 
अंत में एक और महत्वपूर्ण बात, जो बहुत कम लोग जानते हैं। सुधाजी न सिर्फ हिन्दी भाषा की सेवा में आजीवन लगी हुई हैं, भाषा और नए-नए लेखकों को निःस्वार्थ प्रोत्साहित कर रही हैं, हिन्दी साहित्य को नए आयाम, नए प्रयोग, नई दिशाएं, नए अन्वेषण अपनी लेखनी से दे रही हैं, वरन मानवता की सेवा में खासकर पीड़ित महिलाओं की सेवा में भी निःस्वार्थ भाव से लगी हुई हैं। वे अपने आप में एक असाधारण उदाहरण हैं, आदर्श हैं। 

 

इन पर कुछ पंक्तियां हैं, जो महिला दिवस पर मैंने इस हिन्दी साहित्य की एक सशक्त, विशिष्ट, बेजोड़ लेखक और समाज के लिए एक अनुपम भेंट सुधाजी को समर्पित की थीं- 
 
'आज महिला दिवस है, नारी शक्ति का दिन है, 
 
शक्ति जो दुनिया को आप में दिखाई देती है, 
मेरी नजर से देखें तो मुझे आप में दिखाई देता है समर्पण, 
 
समर्पण प्यार का, समर्पण दुलार का, समर्पण सेवा का, 
करुणा, दया, संरक्षण, परवाह, सादगी दूजे नाम हैं आपके, 
 
आपका स्पर्श जीवन में विश्वास जगाता है, 
मन को चंदन और कर्म को पानी बनाता है, 
 
आपका वेग तपते मन को ठंडी बौछारों से भिगोता है, 
कठिन राह से थकी रगों में नया रक्त दौड़ने लगता है, 
 
अंधेरों में सिमटी जिंदगियों को आप योद्धा बनाते हैं, 
नई राहें दिखाते हैं, सींचते हैं, निखारते हैं, 
 
हम ऋणी हैं आपके प्यार के, 
हम कर्जदार हैं आपके दुलार के, 
 
हम आभारी हैं आपके समर्पण के, 
आज नारी शक्ति का दिन है, 
 
धन्यवाद है आपका।' 

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