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एहसास है हमें...

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प्रवासी साहित्य
मंजिलें और कहीं, 
आसमां कहीं और सही, 
 
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जी लेते हैं जहां,
एहसास है हम वहां कुछ भी नहीं!

सांस ले लेते हैं हम,
और इसकी सजा किसी और को सही,
मुस्करा भी देते हैं तो,
दर्द आंखों का छिपाएं कैसे!

बीते लम्हों का भीतर में उठता है तूफान,
रूह तक साथ है टूटे अरमानों का सफर,
अश्कों से भरता है उदासी का समुंदर,
तट पर बैठे हैं वहां वीरानियों के साथ!

भूलना चाहें गुजारी यादों का सिलसिला,
होश भी खो चुके मदहोशी भी आती नहीं,
जीने और मरने का इरादा भी छोड़ चुके,
जो वादे लिए थे कभी, वो कसमें निभाते हैं अब!

साथी इस जन्म में न सही अगले जन्म में ही सही,
पर तेरे प्यार का अहसान चुकाएं कैसे,
इंतजार और इंतजार कई जन्मों का सही,
शुक्रिया-शुक्रिया बेनाम के हम दीवाने ही सही!

मंजिलें और कहीं,
आसमां कहीं और सही,
जी लेते हैं जहां,
एहसास है हम वहां कुछ भी नहीं।

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