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Magh Mela 2026: माघ मेले के संबंध में 10 दिलचस्प बातें

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WD Feature Desk

, शनिवार, 3 जनवरी 2026 (14:56 IST)
Magh Mela 2026: माघ मेला भारत के सबसे पवित्र और प्राचीन धार्मिक उत्सवों में से एक है, जो उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (संगम) में हर साल आयोजित होता है। प्रयागराज में 3 जनवरी 2026 से 15 फरवरी तक माघ मेले का आयोजन होगा। इस मेले का महत्व भी कुंभ मेले की तरह ही होता है। यहाँ माघ मेले से जुड़ी 10 दिलचस्प बातें दी गई हैं।
 
1. मिनी कुंभ का दर्जा: इसे 'मिनी कुंभ' भी कहा जाता है। जहाँ कुंभ मेला हर 12 साल में और अर्ध कुंभ हर 6 साल में आता है, वहीं माघ मेला हर साल आयोजित होता है।
2. कल्पवास की कठिन साधना: मेले की सबसे खास बात 'कल्पवास' है। हज़ारों श्रद्धालु (कल्पवासी) एक महीने तक संगम तट पर टेंटों में रहते हैं। वे दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करते हैं और जमीन पर सोते हैं।
 
3. तीन नदियों का संगम: यह मेला गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम स्थल पर आयोजित होता है। माना जाता है कि माघ के महीने में इन नदियों के जल में अमृत का प्रभाव होता है।
 
4. तपोभूमि और रेतीला शहर: मेले के दौरान प्रयागराज की रेती पर एक अस्थायी 'तम्बू का शहर' बस जाता है। यहाँ लाखों लोग एक साथ रहते हैं, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े अस्थायी शहरों में से एक बन जाता है।
5. ब्रह्मा जी का यज्ञ: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने इसी स्थान पर पहला 'अश्वमेध यज्ञ' किया था, इसलिए इस स्थान को 'प्रयाग' (यज्ञ का स्थान) कहा जाता है।
 
6. महत्वपूर्ण स्नान तिथियाँ: मेले के दौरान मुख्य रूप से 6 स्नान पर्व होते हैं- मकर संक्रांति, पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या (सबसे मुख्य स्नान), बसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि।
7. अक्षयवट के दर्शन: मेले में आने वाले श्रद्धालु 'अक्षयवट' (एक अमर बरगद का पेड़) के दर्शन जरूर करते हैं। माना जाता है कि प्रलय के समय भी इस वृक्ष का विनाश नहीं होता।
 
8. मोक्ष का द्वार: हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, माघ के महीने में संगम पर स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) मिलती है।
9. आर्थिक और सांस्कृतिक संगम: यहाँ न केवल धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, बल्कि यह देश भर के शिल्पकारों, साधुओं और कलाकारों का एक बड़ा सांस्कृतिक मंच भी बन जाता है।
 
10. खिचड़ी और दान का महत्व: मकर संक्रांति के दिन यहाँ खिचड़ी बनाने, खाने और दान करने का विशेष महत्व है। इसे 'खिचड़ी मेला' के नाम से भी जाना जाता है।

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