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अक्षय तृतीया : एक नजर

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अक्षय तृतीया पर्व
आखातीज अर्थात् अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल पक्ष की परम पुण्यमती तिथि कहलाती है। कहा जाता है कि आज ही के दिन सतयुग प्रारंभ हुआ था इसलिए इसे युगादि तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। आज के दिन शादी-विवाह के लिए अबूझ मुहूर्त होता है, क्योंकि आज का दिन इतना पवित्र माना गया है।
 
अक्षय तृतीया के दिन भगवान बद्रीनारायण के कपाट खुलते हैं तथा उनको मिश्री तथा भीगे हुए चने की दाल का भोग लगाया जाता है। इस दिन भगवान परशुराम का जन्म भी हुआ था इसलिए इसी दिन भगवान परशुराम की जयंती मनाई जाती है।
 
श्री भविष्य पुराण के अनुसार अन्य तिथियों के महात्म्यों को सुनने-सुनाने से क्या लाभ होगा, मात्र अक्षय तृतीया का माहात्म्य सुन लेना ही पर्याप्त है। यह तिथि योग, मोक्ष तथा आरोग्य प्रदान करने वाली है। आज के दिन दिया हुआ कोई भी दान, कोई भी पुण्य का क्षय (नष्ट) नहीं होता अर्थात सदा-सदा के लिए वह दान-पुण्य अक्षय हो जाता है।
 
इस दिन गंगा स्नान का भी भारी महत्व है।हयग्रीव का अवतार भी अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। मुख्यतः यह तिथि दान-प्रधान तिथि है। आज के दिन सत्तू अवश्य ग्रहण करना चाहिए।
 
अक्षय तृतीया के दिन श्री विष्णु भगवान का लक्ष्मीजी के साथ पूजन किया जाता है। श्री मत्स्य पुराण के 55वें अध्याय में लिखा है कि अक्षय तृतीया के दिन अक्षत (चावल) से भगवान विष्णु की पूजा करने से वे बहुत प्रसन्न होते हैं तथा उस मनुष्य की संतति भी अक्षय बनी रहती है। वैसे तो सामान्यतया अक्षत द्वारा भगवान विष्णुजी का पूजन निषिद्ध है, पर मात्र अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु की पूजा अक्षत से होती है। अन्य दिनों में अक्षत के स्थान पर सफेद तिल का विधान है।
 
अक्षय तृतीया का मुख्य महात्म्य यह है कि इस व्रत के करने से कभी पुण्यों का क्षय नहीं होता है तथा मनुष्य पाप-कर्म की ओर नहीं बढ़ता। मुख्यतः इस दिन जल से भरे मिट्टी के घड़े, घी, चीनी, दाल-चावल, नमक, इमली तथा वस्त्रादि का दान किया जाता है। घड़े का जल शरीर को शीतलता प्रदान करता है।
 
चीनी एवं सत्तू जल में डालकर पीने से भी शीतलता प्राप्त होती है। चावल व दाल अत्याधिक पाचनशील अनाज है। घी से शरीर को बल मिलता है। इस पर्व से यह जानकारी प्राप्त होती है कि गर्मी में कौन-से आहार सुपाच्य हैं।

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