रतन टाटा : प्रोफाइल

रतन नवल टाटा भारत के जाने माने बिजनेसमैन, इंवेस्टर, फिलोंथ्रोपिस्ट (ऐसा इंसान जो बड़े दान देकर बड़े पैमाने पर सोशलवर्क करता है) और टाटा संस के अंतरिम चैयरमैन हैं। वे टाटा ग्रुप (मुंबई बेस्ड ग्लोबल बिजनेस कोंग्लोमेरेट) के 1991 से 2012 तक चैयरमैन रहे और 24 अक्टूबर 2016 को उन्होंने फिर इस पद को संभाल लिया। यह अंतरिम टर्म है और रतन टाटा इस ग्रुप के चैरिटेबल ट्र्स्ट के भी प्रमुख बने रहेंगे। रतन टाटा पद्मविभूूषण (साल 2008) और पद्मभूूषण (साल 2000) में नवाज़े जा चुके हैं।


 
 
बचपन और शिक्षा  :  28 दिसंबर 1937 को जन्मे रतन टाटा, नवल टाटा के सुपुत्र हैं। रतन टाटा के पिता नवल टाटा को जेएन पेटिट पारसी अनाथालय से नवाजबाई टाटा ने गोद लिया थ। रतन टाटा के पिता नवल और मां सोनू 1940 के मध्य में अलग हो गए। इस समय रतन टाटा की उम्र दस वर्ष थी और उनके छोटेे भाई, जिम्मी, सात वर्ष के थे। दोनों बच्चों की परवरिश उनकी दादी नवाजबाई टाटा ने की। 
 
रतन टाटा के एक हॉफ ब्रदर (एक पेरेंट कॉमन ) नोएल टाटा, नवल टाटा की दूसरी शादी (जो सिमोन टाटा के साथ हुई थी) से जन्मे थे। रतन टाटा की शिक्षा मुंबई के  कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल में हुई। उनके पास कॉर्नेल यूूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर में स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में बीएस डिग्री है। यह उन्होंने 1962 में प्राप्त की। एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम रतन टाटा ने 1975 में हार्वड बिजनेस स्कूल से पूरा किया। 
 
करियर  : रतन टाटा ने अपने करियर की शुरुआत टाटा ग्रुप के साथ 1961 में की। अपने करियर की शुरुआत में, रतन टाटा टाटा स्टील के शॉप फ्लोर पर लाइमस्टोन को हटाने और धमाके भट्टी को हैंडल करने का काम करते थे। टाटा ने नाल्को में हाई टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट बनाने की शुरुआत करने के लिए पैसा लगाने का सुझाव जेआरडी टाटा को दिया। अब तक इस कंपनी में सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक्स ही बनाए जाते थे और कंपनी काफी घाटे में चल रही थी। जेआरडी टाटा इस सलाह से बहुत खुश नहीं थे, परंतु उन्हें इस पर अमल किया और आगे चलकर कंपनी काफी फायदे में चलने लगी। 
 
1991 में जेआरडी टाटा ने टाटा संस का चैयरमैन पद छोड़ दिया और रतन टाटा को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। जब टाटा ने अपने नए ऑफिस को संभाला, कंपनी में उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। कई कंपनियों के प्रमुख, जिन्होंने कई दशक टाटा ग्रुप से जुड़कर खर्च किए थे, काफी ताकतवर और प्रभावी हो गए थे। 
 
रतन टाटा ने इन प्रमुखों को एक उम्र निर्धारित कर  (रिटायरमेंट एज) पद से हटाने की मुहिम शुरू की। इसके अलावा कई कंपनियों को ग्रुप के साथ जोडा, जिन्हें टाटा ग्रुप के ब्रांड का इस्तेमाल कर लाभ को टाटा ग्रुप के साथ शेयर करना था। टाटा ने नवीनता को प्रमुखता दी और युवा टैलेंट को अपने साथ जोडा और उन्हें जिम्मेदारियां दीं।  
 
उपलब्धियां :  अपने 21 साल के कार्यकाल में रतन टाटा ने टाटा ग्रुप की आमदनी को 40 गुना अधिक कर दिया और टाटा ग्रुप के लाभ को 50 गुना पहुंचा दिया। जब उन्होंने टाटा के ग्रुप की कमान संभाली थी, तब लाभ चीज़ें बेचकर होती थीं और जब टाटा ने ग्रुप छोड़ा, तब आमदनी का जरिया टाटा ब्रांड बन चुका था। 
 
रतन टाटा की कमान लेते ही टाटा ग्रुप ने टाटा टी ब्रांड के तले टीटले, टाटा मोटर्स के तले जगुआर लैंड रोवर और टाटा स्टील के तले कोरस खरीदे। इन खरीदियों के बाद टाटा ग्रुप भारत के बहुत बड़े ब्रांड से ग्लोबस बिज़नेस में दाखिल हुआ। इस ग्रुप का 65 प्रतिशत रैवेन्यू करीब 100 देशों में फैले बिजनेस से आने लगा। टाटा की नैनो कार, रतन टाटा की सोच का नतीजा है। रतन टाटा ने कहा भी है कि नैनो का कांसेप्ट क्रांतिकारी रहा। इसके भारतीय बाज़ार में आने से एवरेज इंडियन खरीदार के बजट के अनुसार कारों की कीमत रखी जाने लगी। 
 
75 साल के होने पर रतन टाटा ने टाटा ग्रुप के चेयरमैन का पद दिसंबर 2012 को त्याग दिया और 44 साल के साइरस मिस्त्री को टाटा संस का नया चेेयरमैन नियुक्त किया। साइरस मिस्त्री शापूरजी पलोंजी ग्रुप के मालिक पलोंजी मिस्त्री के सुपुत्र हैं। 24 अक्टूबर 2016 को साइरस मिस्त्री को उनके पद से हटा दिया गया और एक बार फिर रतन टाटा ने ग्रुप की बागडोर संभाल ली। 
 
नए फैसले  : हाल ही में रतन टाटा ने अपनी पर्सनल सैविंग स्नेपडील में डाली। स्नेपडील भारत की तेजी से बढ़ती हुई ई-कॉमर्स वेबसाइट है। 2016 में टाटा ने खुलासा न करते हुए, टीबॉक्स (एक ऑनलाइन सेलिंग स्टोर, जिसमें चाय की बिक्री होती है) में इंवेस्टमेंट किया। इसके अलावा कैशकरो.कॉम में भी टाटा ने पैसे लगाए हैं। 
 
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