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अब डायबिटीज के मरीज भी खा सकेंगे चावल

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Diabetes
रायपुर। यह उन मधुमेह रोगियों के लिए अच्छी खबर हो सकती है जिन्हें इस बीमारी के कारण चावल से परहेज करना पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने चावल की ऐसी प्रजाति के बारे में पता लगाया है जिसे मधुमेह रोगी भी आसानी से खा सकते हैं।
 
विश्वविद्यालय के प्लांट मॉलिक्युलर एंड बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्राध्यापक गिरीश चंदेल ने बताया कि उनकी टीम ने धान की ऐसी प्रजाति के बारे में पता लगाया है जिसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम है। 
 
मधुमेह रोगी या जिन्हें इस बीमारी का खतरा है, वे लोग इसका सेवन कर सकते हैं। इसके अलावा यह चावल आम लोगों के लिए ‘हेल्दी डाइट' भी है। चंदेल ने बताया कि उनकी टीम पिछले कुछ समय से धान की ऐसी प्रजाति के बारे में पता लगाने या नई प्रजाति बनाने के बारे में खोज कर रही थी जिसे मधुमेह रोगी भी आसानी से खा सकें। 
 
लंबे समय तक खोज के बाद अब विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने चपटी गुरमटिया धान में से एक अन्य प्रजाति के बारे में पता लगाया है। धान की इस प्रजाति में ऐसे तत्व पाए गए हैं जिसे मधुमेह रोगी भी आसानी से खा सकते हैं। 
विश्वविद्यालय के प्लांट मॉलिक्युलर एंड बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्राध्यापक गिरीश चंदेल ने बताया कि वैज्ञानिकों ने जिस चावल की खोज की है उसमें ग्लासेमिक इंडेक्स 55 है जो मधुमेह रोगियों के लिए उचित है, इसलिए वैज्ञानिकों ने इसका नाम मधुराज 55 रखने का फैसला किया है। इस चावल को खाने के बाद यह शर्करा को धीरे विभाजित करता है, जिससे रक्त में शर्करा की मात्रा उचित स्तर पर रहती है। 
 
चंदेल कहते हैं कि भारत एक ऐसा देश है जहां साढ़े छ: करोड़ से ज्यादा लोग मधुमेह रोग से पीड़ित हैं। ऐसे में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला चावल इस बीमारी से लड़ने में महत्वपूर्ण अस्त्र साबित हो सकता है।
वैज्ञानिक ने बताया कि चपटी गुरमटिया को राज्य में मोटा चावल के नाम से भी जाना जाता है। पहले इसे बड़े पैमाने पर उगाया जाता था।

हांलकि इसका उपयोग मजदूर और गरीब वर्ग के लोग ही करते थे। अभी जिस धान के बारे में पता लगाया गया है उसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम है, लेकिन इसके स्वाद में कोई अंतर नहीं पाया गया है। छत्तीसगढ़ में इस धान की प्रजाति के बारे में पता लगाने के बाद अब जल्द ही इसे किसानों को उपलब्ध कराया जाएगा।
 
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति एस के पाटिल ने बताया कि अगले माह धान की इस प्रजाति को राज्य स्तरीय समिति से जारी किया जाएगा। जिससे खरीफ के मौसम में किसान इसकी फसल ले सकें। पाटिल ने बताया कि कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले इस धान की प्रजाति को बाजार उपलब्ध कराने के लिए भी बेहतर प्रयास किए जा रहे हैं।
 
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ को धान के कटोरे के रूप में जाना जाता है और यहां की अधिसंख्य जनसंख्या चावल खाती है। ऐसे में मधुमेह रोगी भी चावल नहीं छोड़ पाते हैं। अधिक ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले चावल खाने से मधुमेह रोगियों की तकलीफ बढ़ सकती है। ऐसे रोगियों के लिए चपटी गुरमटिया की यह प्रजाति फायदेमंद साबित हो सकता है।
 
वैज्ञानिक ने बताया कि धान की इस प्रजाति को लेकर छत्तीसगढ़ काउंसिंल आफ साइंस एंड टेक्नोलाजी विभाग ने चूहों पर प्रयोग किया है। चूहों में किए गए प्रयोग के उत्साहजनक नतीजे आए हैं। वैज्ञानिकों ने एक मधुमेह रोगी चूहे पर इस धान का प्रयोग किया था तथा अन्य चूहे पर मधुमेह नियंत्रण वाली दवाई का प्रयोग किया था। दोनों के नतीजे समान आए हैं।  (भाषा)

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