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सरल नही है, पैरेंटिंग की कला

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पैरेंटिंग
प्रीति सोनी  
बच्चों के लिए एक अच्छा अभि‍भावक बनना हमेशा से पालकों के लिए महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन वर्तमान समय के बदलते परिवेश में माता-पिता के लिए ये चुनौतीपूर्ण कार्य है। शायद इसीलिए अब पालक भी 1 ही संतान पर विशेष बल देते हैं बजाए पहले की तरह 3 से 4 या उससे भी अधि‍क बच्चों के साथ परिवार बढ़ाने के। इससे साबित होता है कि पैरेंटिंग पहले की अपेक्षा एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो चला है।


 
पैरेंटिंग एक कला है, जो किसी बगीचे को तैयार करने वाले माली की तरह है। माली जितनी मेहनत, तन्मयता और समर्पित भाव से बगीचे में खाद-पानी डालता है, उसे उतने ही महकते परिणाम प्राप्त होते हैं। ठीक वैसी ही जैसी माता-पिता बच्चों को परवरिश देते हैं, उसी तरह की संतान को वे पाकर अभिभूत होते हैं। संतान में गुणों का रोपण कर, उसे संस्कारों से परिपूर्ण बनाना वर्षों की साधना है, जो पालकों के प्रयासों के परिणाम से ही सफल होती है।
 
पहले और अब के पैरेंटिंग के तौर-तरीकों में जमीन-आसमान का परिवर्तन हो चला है। कहा जाता है कि पहले बच्चे पल जाया करते थे, लेकिन अब उन्हें पालना पालकों की प्राथमिकता में शामि‍ल हो चला है, क्योंकि अब बच्चों की योग्यता ही उनका और पालकों का भविष्य निर्धारित करेगी।

पहले की तरह संकोचभरा और आरामदायक जीवन अब नहीं रहा। अब बच्चों के स्कूल में एडमिशन लेने के साथ ही माता-पिता का संघर्ष भी शुरू हो जाता है। उनके सामने होती है एक चुनौती बच्चे को अच्छी शिक्षा और बेहतर परवरिश देने की। ऐसे में मां के साथ-सा‍थ पिता की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है, जो कि बेहद अहम है, क्योंकि समय के साथ-साथ महंगाई तो लगातार बढ़ रही है, लेकिन आय अपेक्षाकृत कम ही है जिसमें घर और परिवार की तमाम जरूरतों के अलावा बच्चे की पढ़ाई और बेहतर परवरिश का सपना झिलमिलाता है और पिता उस सपने को और भी सुंदर और सच बनाने के लिए जीवनभर प्रयास करता है।

सालोंसाल मेहनत की खाद और प्रेम की सिंचाई के बाद महकता है एक बाग बच्चे की योग्यता, सक्षमता, समझदारी, स्वास्थ्य और गुणों के रूप में। लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं है पालकों के लिए। बच्चा तो हमेशा से नया है सब कुछ सीखने, जानने और समझने के लिए, लेकिन पालकों के लिए बच्चों के प्रति परंपरागत तरीकों में बदलाव करना और उनके अनुसार ढलना आसान नहीं होता।
 

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समय के साथ-साथ बच्चों के प्रति पालकों को अपना रवैया बदलना होता है। अब वे अपने बच्चों के साथ वैसा व्यवहार नहीं रख सकते, जैसा उनके माता-पिता उनके साथ रखते थे। अब माता-पिता को एक आदर्श छवि से बाहर निकलकर बच्चों के साथ दोस्ताना रवैया रखना जरूरी है ताकि वे अपने बच्चे को समझ सकें और बच्चा भी मन से डर और संकोच हटाकर माता-पिता के सामने खुद को खुलकर प्रकट कर सके। 
 
वर्तमान दौर में यही सब देखने को मिलता है। आज के पालक अपने बच्चों के साथ दोस्ती करते हैं और हर विषय पर खुलकर बात करते हैं। वे बच्चों पर संकोच, झिझक और दब्बूपन नहीं लादते। यही वजह है कि पहले की तुलना में आज का बच्चा ज्यादा खुले दिमाग का, नि:संकोच, बड़बोला और समझदार होता है। बड़ों के प्रति सम्मान के अलावा किसी अन्य बोध से ग्रस्त नहीं होता। 
 
पहले जहां बेटियां पिता से अधिक प्रेम होते हुए भी मां के अधिक करीब हुआ करती थीं, आज मां से बेहतर पिता के साथ अपने मन की बात रख पाती हैं और जहां बाप और बेटे में संवाद न के बराबर था वहीं आज बेटा पिता से हर विषय पर खुलकर बात कर सकता है।

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