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अपनों से तो पराये भले

स्नेह सिंचित रिश्ते

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रिश्ता
- प्रिया सुधीर शुक्ला

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पिछले हफ्ते एक शाम फोन आया। बोलने वाले सज्जन कह रहे थे- 'माधवी बोल रही हो? अब तो तुम्हारा नाम भी बदल गया है। पत्रिका नए नाम से ही भेजूँगा, पहचाना?' मैं बिलकुल भी आवाज को पहचान नहीं पा रही थी। फिर वे बोले, बेटा 'चौहान सर' बोल रहा हूँ, मैं तुरंत अपने विज्ञान शिक्षक को पहचान गई और उन्हें फोन पर अभिवादन करके तुरंत क्षमा भी माँग ली कि मैंने उनको नहीं पहचाना।

वे आगे बताने लगे, जबसे गाँव छोड़ा तुम सबकी, तुम्हारे परिवार की (मेरी माँ उनके बच्चों को पढ़ाती थी) बहुत याद आती थी। तुम्हारी शादी का भी पता चला था। इधर-उधर तबादले होते रहे। अब पिछले साल इंदौर शिफ्ट हो गया हूँ। तुम्हारा पता व फोन नंबर एक परिचित मित्र से मिल गया था। इसलिए आज फोन लगाया।

मैं भावुक हो उठी। मैंने तुरंत सर से पूछा गगन, तपन, वर्षा (सर के बच्चे) तीनों कैसे हैं? क्योंकि गाँव में मैंने उन्हें बहुत ही छोटा देखा था। सर ने बताया गगन केनेड़ा में साइंटिस्ट है। तपन बेंगलुरू में जॉब में है तथा वर्षा इंदौर से एमबीए कर रही है। फिर बोले- तुम्हारी मम्मी की मेहनत और आशीर्वाद का ही परिणाम है कि बच्चे होनहार निकले।

गगन के विवाह पर न बुला सका, अब तपन का विवाह है। तुम्हें पति और बच्चों के साथ शामिल होना है। कार्ड घर तक पहुँच जाएगा। फोन की इस लंबी बात ने मेरी 25 साल पूर्व की कई स्मृतियाँ (स्कूल की) ताजा कर दीं और मुझे रह-रहकर यह लग रहा था कि उन्होंने एक पुराना रिश्ता दुबारा ढूँढने की सफल कोशिश की। बाद में उनकी बेटी घर आकर साग्रह कार्ड देकर निमंत्रण भी दे गई।

आज की डाक से मिला एक और निमंत्रण पत्र (अति आधुनिक) मेरे सामने रखा है। मेरी बुआ के बेटे विलास भैया के इकलौते बेटे 'विराज'की शादी के रिसेप्शन का कार्ड जिसमें भावी जीवनसाथी व दोनों के फोटो संक्षिप्त परिचय के साथ हैं। मुझे याद आया विलास भैया ने अंतरजातीय विवाह किया था।

हमारे परिवार में सभी ने विरोध किया, पर पापा हम दोनों बहनों को लेकर बुआ के सम्मान के लिए उस विवाह समारोह में शामिल हुए थे। कुछ साल भारत में रहने के बाद वे (विलास भैया) नौकरी के लिए अबूधाबी चले गए। पहले पत्र व्यवहार करते थे, फिर धीरे-धीरे बंद हो गया। न मेरी शादी पर आए, न बहन की, न किसी समारोह में। बुआजी के स्वर्गवास के बाद तो रहा-सहा रिश्ते का सेतु भी बह गया।

पिछले बीस सालों में यदि एक-दो मुलाकातें (औपचारिक) छोड़ दें तो रिश्ते का निर्वाह था ही नहीं। आज मैं सोचे जा रही हूँ कि गाँव में शुरू हुआ एक औपचारिक-सा रिश्ता जो मेरे शिक्षक के असीम स्नेह के कारण आत्मा का रिश्ता बन गया। और मेरी बुआ से हमारा रक्त का संबंध है, पर बीस साल बाद विलास भैया के उस कार्ड को देखकर न तो मेरे आँसू छलके हैं, न मैं खुश हुई हूँ।

एक औपचारिक शुष्क आमंत्रण। पर मुझे चौहान सर के बेटे के विवाह समारोह का बेसब्री से इंतजार है। जहाँ मैं अपने पति, बच्चों को उन सबसे मिलवाऊँगी। उस समारोह में मेरे सम्माननीय शिक्षकों को भी आमंत्रित किया है, जो आत्मीय रिश्तों को सँजोने में विश्वास रखते हैं। रिश्ते रक्तों से नहीं, स्नेह से सींचने पड़ते हैं, मैं खुद को समझा रही हूँ।

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