डीजे के धमाकेदार संगीत से सजी शाम, सिर्फ 'चखने' के लिए प्लेटें भरते 'भरे पेट' लोग और नुमाइश बने ब्रांडेड कपड़े। एसेसरीज हर बार बहुत हद तक ऐसा ही तो होता है हमारी न्यू इयर पार्टी का स्वरूप। तो चलिए इस बार सजाएँ एक नया संकल्प। उनके लिए जिन्हें 'भूख' लगती है और जो हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जूठन तक को छप्पन भोग मान लेते हैं।वह एक टी-स्टॉल के बाहर सर्द गहराती दिसंबर की शाम थी। बैंचों पर बैठे तीन-चार युवाओं में गपशप चल रही थी। बातें चलती हुईं न्यू इयर रेजल्यूशन की ओर मुड़ गई। वे अपने-अपने संकल्प बताने लगे-इस वर्ष के अंत तक कार खरीदने का, गुटखे की आदत छोड़ने का, जल्दी उठकर जॉगिंग करने का और आय को पाँच अंकों तक पहुँचाने का। अचानक किसी ने न्यू इयर पार्टी की बात छेड़ दी। चूँकि वे सभी इस बात पर एकमत थे कि इस पार्टी का असली मजा तो कहीं होटल जाकर मनाने में ही है। इसलिए वे जगह का निर्णय करने लगे। तभी मेरा ध्यान चूल्हे के पास उँकडू बैठे बन्टू पर गया। वह कभी-कभार कॉलोनी में पुरानी बोतलें और प्लास्टिक खरीदने के लिए घूमता दिख जाता था। उसे बड़े गौर से वे बातें सुनते देख मैंने पूछा-'क्यों रे बन्टू, न्यू इयर पर तेरा क्या प्रोग्राम है?' मेरी बात सुनते ही वह एकदम से खिल उठा-'झकास मजा लूटते हैं साब अपन तो इस दिन की पार्टी का।'
'कैसा मजा?' मुझे उसकी बात कुछ पल्ले नहीं पड़ी थी।
'साब, अपन सुबह-सुबह नए साल में बोतल बीनने निकलते हैं। कसम से साब, जित्ती बोतलें साल भर में कभी नी मिली, उत्ती इस दिन मिल जाती हैं, वो भी फोकट...और कोल्ड्रिंग का मजा अलग', उसने चहकते हुए कहा।
ओह! तो यह था उसकी खुशी का राज।
सच है, जो गरीब चंद प्लास्टिक के टुकड़ों और बोतलों के लिए दिनभर गली-गली भटकता हो, उसके लिए वे ढेर सारी बोतलें और जूठा कोल्ड्रिंक यदि लॉटरी खुलने के समान हो तो इसमें आश्चर्य काहे का। लेकिन न्यू इयर का अर्थ किसी के लिए ऐसा भी हो सकता है,यह बात मुझे अंदर तक हिला गईं।
बन्टू का नजरिया जो भी हो, लेकिन समानता, दया और प्रगति की बातें करते किसी संवेदनायुक्त समाज के लिए यह बात खुशी की हर्गिज नहीं हो सकती कि उसका एक बड़ा व अभिन्न अंग इस तरह का जीवन जी रहा है। कब...आखिर कब तक वैभव की अंधी दौड़ में लगे लोगों में प्रगति का अर्थ सर्वांगीण विकास से न होकर 'स्व' की प्रगति पर केंद्रित रहेगा? और अपने अधिकारों और शक्ति से अनजान यह वर्ग इसी तरह दूसरों की जूठन को अपनी नियति मान खुश होता रहेगा?
अपने शरीर के अंग की तरह समाज से जुड़े ऐसे वर्गों की जागृति व उत्थान का जिम्मा हमने किन पर छोड़ रखा है-सामाजिक संस्थाओं पर, धार्मिक न्यासों पर या सरकारी और गैर सरकारी समाज सेवा विभागों आदि पर और हमारा काम क्या है? इनके कामों में मीन-मेख निकालने का? बुराइयों के लिए दूसरों को कोसना कितना आसान होता है-'फलाँ सिस्टम बेकार है' या 'इनका कुछ नहीं हो सकता' कहकर हम अपने फर्ज निभा देते हैं लेकिन ये भूल जाते हैं कि अपने स्तर पर हम अपने लोगों के लिए क्या कुछ कर सकते हैं।
जरूरत होती है एक निस्वार्थ सेवाभावना की, फिर चाहे उन्हें मुफ्त ट्यूशन पढ़ाना हो या प्रौढ़ शिक्षा कीबात हो, चाहे उन्हें करियर की मुफ्त सलाह देना हो या पेन, पुस्तकें, कॉपियाँ, पेंसिलें आदि भेंट करके उनके सशक्तीकरण की ओर कदम बढ़ाना हो। इन्हें करने के लिए शक्ति से ज्यादा जज्बे की जरूरत होती है।
समय की एक इकाई के रूप में नया वर्ष हमारे सामने है। क्या हम शामिल करेंगे इस बार अपनी नववर्ष के संकल्पों की सूची में एक संकल्प उनके लिए जो फटेहाल व बदहाल हैं। फिर चाहे वे शनि महाराज की गुहार लगाने वाले बच्चे हों या मोहल्लों में पन्नी बीनता शैशव हो, चाहे वह शादी-पार्टी के बाहर जूठन में कुछ खोजता झुंड हो या नालों के किनारे खुले में शौच हेतु जाते मासूम हों।
यह संकल्प हमें याद दिलाएगा-मानवता के फर्ज को और प्रेरित करेगा समाज के अन्य लोगों को, ताकि 'बन्टू' के जैसे लोगों के चेहरों पर आ सके सच्ची खुशियों की चमक...बगैर उन जूठी बोतलों के।