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आज भी जिंदा हूँ मैं

आखिर ये गुलामी कब तक ...

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हमारे समाज में भले ही स्त्रियों की स्थिति पहले से कई गुना बेहतर है परंतु आज भी कहीं न कहीं वह पुरुषों पर आश्रित है। अभी भी उसे स्वनिर्णय की आजादी नहीं है।

आज भी महिलाएँ पूर्णत: स्वतंत्र नहीं हैं। किसी भी कार्य की शुरुआत करने में उसे अपने पति, पिता या भाई की रजामंदी की आवश्यकता होती है।

किसी भी कार्य में थोड़ी सी भूल-चूक हो जाने पर उसे यह जुमला सुनाया जाता है- 'तुमने हाथ डाला और यह काम बिगड़ गया, तुम्हें क्या जरूरत थी अपनी अकल लगाने की'।

अधिकांश स्त्रियाँ दिन-रात अपने पति की जी-हजूरी में ही लगी होती हैं। पति के जूते साफ करने से लेकर उनके कपड़े इस्त्री करने तक का सभी कार्य वे अपना धर्म समझकर करती हैं। भले ही पति उसे अपनी पत्नी न समझकर सेवा करने वाली नौकरानी ही समझे।

औरत के इस भय के पीछे हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था जिम्मेदार है, जिसके ताने-बाने में औरत का 'स्व' कहीं गुम ही हो गया है। आज भी वह लोगों के सामने स्वतंत्रतापूर्वक अपनी राय रखने में झिझकती है। उसे डर लगता है कि कहीं कोई उसका उपहास न बनाएँ।
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पत्नी भले ही पति की सेवा में दिन-रात लगा दे परंतु अडि़यल पति का अहम् वैसा ही बरकरार रहता है। वह कभी भी पत्नी से उसकी ख्वाहिशें व राय नहीं पूछता। उसकी किसी भी गलती पर परिवारजनों के समक्ष उसे अपमानित करना जैसे पति की आदत-सी बन जाती है।

हम यह नहीं कहते कि ऐसा आपके घर में नहीं होता। हम आज उन ‍शिक्षित पुरुषों की बात कर रहे हैं, जो समझदार व उच्च पदों पर आसीन होते हुए भी अपने घर की स्त्रियों को डरा-धमकाकर रखते हैं और प्रता‍डि़त करते हैं।

किसी भी निर्णय की स्थिति में स्वयं को असमंजस में पाना महिलाओं का सामान्य स्वभाव है। ऐसी परिस्थितियों में उसके मन में यही कुछ चलता रहता है कि उसके किसी भी निर्णय पर परिवारजनों की क्या प्रतिक्रिया होगी, इस बात की कल्पना करते ही वह कुछ देर चुप्पी साधकर यह उत्तर देती है कि -'मैं उनसे पूछकर बताऊँगी'।

उस महिला की नजरें उस वक्त इधर-उधर घूमकर अपने परिवार के उस पुरुष को तलाशती है, जो आज उसके एवज में जवाब दे दे। ये महिलाएँ भी उसी का अनुसरण मात्र कर रही हैं, जो उनके परिवार की महिलाएँ सदियों से करती आ रही हैं और वह है- 'पुरुषों की गुलामी'। मन में उठते कई सवालों व इच्छाओं का गला घोंटकर महिलाओं का गूँगों की तरह जीवन जीना कहाँ तक उचित है?

घर में राशन खत्म हो गया हो या बच्चे को स्कूल जाना हो, अपने लिए नई साड़ी लेनी हो ... आदि कई फैसलों पर उसे पुरुषों की स्वीकारोक्ति की आवश्यकता होती है। स्पष्ट शब्दों में वह स्वतंत्र होते हुए भी गुलामी की बेडि़यों में जकड़ी है। उसका केवल एक ही कसूर है और वह है- स्त्री के रूप में जन्म लेना।

औरत के इस भय के पीछे हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था जिम्मेदार है, जिसके ताने-बाने में औरत का 'स्व' कहीं गुम ही हो गया है। आज भी वह लोगों के सामने स्वतंत्रतापूर्वक अपनी राय रखने में झिझकती है। उसे डर लगता है कि कहीं कोई उसका उपहास न बनाएँ।

स्त्रियों को यदि अपनी स्थिति को मजबूत करना है तो उसे अपने ही दम पर आगे बढ़ना सीखना होगा। आखिर उसने शादी की है कोई गुलामी तो नहीं? उसका हुनर और जोश अभी भी जिंदा है। बस जरूरत है अपने कदमों और सोच को सही दिशा में मोड़ने की।

पुरुषों के हाथ थामकर उन पर पूरी तरह आश्रित होकर वह कभी अपनी स्वतंत्र उड़ान नहीं भर सकती है। उसे जिस क्षेत्र में महारत हासिल है, उस क्षेत्र में उसे अपनी पकड़ मजबूत करके अपनी एक अलग पहचान बनानी होगी। जब वह कुछ अलग और बेहतर करके दिखाएगी, तब दुनिया खुद-ब-खुद उसे सलाम करेगी।

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