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गायत्री शर्मा
टूटा ऐनक, फटी-पुरानी किताबें, धुँधली तस्वीरें, क्या यही पहचान है बुजुर्गों की? कल तक हमारी उँगली थामे हमें चलना सिखाने वाले हमारे माँ-बाप आज अपने लड़खड़ाते कदमों से बार-बार गिरकर संभलना/चलना सीख रहे हैं। बुढ़ापा जिंदगी का एक ऐसा कड़वा सच है जिसे ज़हर का घूँट समझकर आज के बुजुर्ग पी रहे हैं। अपनों की अनदेखी से परेशान बुजुर्ग आज तिरस्कृत व अपमानित होकर जीने को विवश हैं। घरों से वृद्धाश्रमों की ओर पलायन करते ये लोग ज़िंदगी के एक कड़वे सच को उजागर करते हैं। कहते हैं 'जिस माँ ने हमको जनम दिया उसका दिल दुखाना ना चाहिए.... !लेकिन ये बातें आज केवल किस्सों-कहानियों तक ही सीमित है। संयुक्त परिवार से एकल परिवारों में पदार्पण करते युवा आज किस तरह जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं, यह तो जगजाहिर ही है।छोटे बच्चे के डरने से उसे झट से सीने से लगाने वाले, अपने आँचल से उसके आँसूओं को पोंछने वाले, खुद भूखे-प्यासे रहकर अपने बच्चों का पेट पालने वाले बुजुर्ग आज अपने ही घर में अपनी पहचान ढूँढते नजर आते हैं। आज इस देश में हर 12 भारतीय के पीछे एक बुजुर्ग है जिनमें से 7 करोड़ की उम्र 60 साल से ज्यादा है। उनमें से भी 2.7 करोड़ बुजुर्ग किसी न किसी बीमारी का शिकार हैं। |
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छोटे बच्चे के डरने से उसे झट से सीने से लगाने वाले, अपने आँचल से उसके आँसूओं को पोंछने वाले, खुद भूखे-प्यासे रहकर अपने बच्चों का पेट पालने वाले बुजुर्ग आज अपने ही घर में अपनी पहचान ढूँढते नजर आते हैं... |
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अपने बुजुर्गों की यह अनदेखी युवाओं के भविष्य को कितना अंधकारमय बनाएगी, यह तो हम सभी जानते हैं। कल तक जिनकी एक आवाज पर घर का हर सदस्य काँप जाता था। आज उन्हें 'पागल' कहकर संबोधित किया जाता है। अब उनकी आवाज घर के सदस्यों तक के सदस्यों तक नहीं बल्कि सूनी दीवारों, खिड़कियों और दरवाजों से टकराकर खुद उन्हीं तक पहुँचती है।
कुछ ऐसा करना होगा जिससे हमारा वर्तमान व भविष्य सुधरे न कि कुछ ऐसा जिससे हमें अपने भविष्य से मुँह छुपाना पड़े। बुजुर्ग कोई कूड़ा-करकट नहीं बल्कि हमारे घर-आँगन की शोभा हैं जिन्हें हमारे प्यार, देखभाल व अपनेपन की जरूरत है। वे आँगन की घनी छाया देते
पेड़ हैं ,वे रिश्तों की मजबूत डोर हैं उन्हें थामें रखे।