हम सभी को बचपन में अनुशासनप्रियता व सख्ती के चलते पिता हमें क्रूर नजर आते हैं। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और हम जीवन की कठिन डगर पर चलने की तैयारी करने लगते हैं, हमें अनुभव होता है कि पिता की वो डांट और सख्ती हमारे भले के लिए ही थी।
उनकी हर एक सीख जब हमें अपनी मंजिल की ओर बढ़ने में मदद करती है, तब हमें मालूम पड़ता है कि पिता हमारे लिए कितने खास थे और हैं।
एक शोध के मुताबिक आज भी दुनिया भर में बच्चे सर्वप्रथम आदर्श के रूप में अपने पिता को ही देखते हैं। मां उनकी पहली पाठशाला है तो पिता पहला आदर्श। वे अपने पिता से ही सीखते हैं और उनके जैसा ही बनना चाहते हैं। इसलिए जीवन में जीतना मां महत्व होता है, उतना ही पिता का भी है।
नरेश कहते हैं कि उन्हें आज भी दशहरे पर अपने पिता की याद सबसे ज्यादा आती है। उन्हें याद आता है कि हर वर्ष किस तरह वे अपने कांधे पर बिठाकर रावण दहन दिखाने के लिए ले जाया करते थे। वे कहते हैं कितने सुनहरे दिन थे, जब पिता उंगली पकड़कर मेला घुमाया करते थे और हर जिद बड़ी आसानी से पूरी कर दिया करते थे।
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वे गर्व कहते हैं कि पिता ने अपने हिस्से की सारी जिम्मेदारियां पूरी कीं। उनकी सीख आज भी जीवन के हर कदम पर मार्गदर्शन प्रदान करती है।
परेश कहते हैं कि संसार में सभी को उनके जैसे ही पिता मिलें। पिता सख्त व अनुशासनप्रिय जरूर थे लेकिन ऐसा कभी भी महसूस नहीं हुआ कि वे बेवजह सख्ती कर रहे हों। उन्होंने जो कुछ पाया मेहनत करके पाया और अपने बच्चों को भी हमेशा ईमानदार बने रहने की सीख ही दी। उन्हें याद आता है कि एक बार गलत आदतों के कारण पिता ने घर से निकाल दिया था।
इस एक झटके ने उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बना दिया और जीवन की कड़वी सच्चाईयों से भी रूबरू करवा दिया। बाद में उन्हें अहसास हुआ कि पिता ने कड़ा कदम क्यों कर उठाया। आज वे अगर कुछ कर पाए तो वो सिर्फ अपने पिता की वजह से।